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विश्व शांति के लिए आत्मिक शांति अनिवार्य : होसबाले
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धर्म सम्मेलन के दौरान आपस में बातचीत करते आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और तिब्बती धर
धर्मशाला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि विश्व में शांति स्थापित करने के लिए मनुष्य के भीतर आत्मिक शांति का होना सबसे पहली शर्त है। उन्होंने यह बात शनिवार को धर्मशाला के कोतवाली बाजार स्थित सामुदायिक भवन में आयोजित धर्म सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर के द्वंद्व और संघर्ष को शांत नहीं करेगा, तब तक बाहरी दुनिया के युद्धों को समाप्त करना संभव नहीं है। यह आयोजन देव भूमि मैत्री संघ द्वारा तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा के 90वें जन्मवर्ष और आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में किया गया।
होसबाले ने भगवान बुद्ध के वचनों ‘एषः धर्म सनातनः’ का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन धर्म की जड़ें प्रकृति में हैं और मानव सेवा ही इसका मूल स्वरूप है। उन्होंने कहा कि कोई भी समाज मजबूत नैतिक मूल्यों और धर्म की रक्षा के बिना टिक नहीं सकता। उन्होंने गुरु तेग बहादुर के बलिदान और दलाई लामा के शांति संदेश को एक ही कड़ी का हिस्सा बताया, जिसका उद्देश्य धर्म की स्थापना और मानवता की रक्षा है।
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अपने संबोधन में सरकार्यवाह ने तिब्बती समुदाय के अपनी पहचान और स्वतंत्रता के लिए किए जा रहे प्रयासों की खुलकर सराहना की। सम्मेलन में किन्नौर, लाहौल-स्पीति और कांगड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए बौद्ध अनुयायियों की उपस्थिति में उन्होंने कहा कि समाज में संवेदना, एकता और सहयोग की भावना ही अशांति का अंतिम समाधान है।
इस मौके पर प्रांत संघचालक डॉ. वीर सिंह रांगड़ा, क्षेत्र कार्यवाह रोशन यादव, डॉ. किस्मत कुमार, भूषण रैना, गेशे लॉगजाग, कार्यक्रम संयोजक डॉ. थूकतन नेगी और सह-संयोजक सुनील शर्मा सहित कई प्रबुद्ध नागरिक और बौद्ध भिक्षु मौजूद रहे। इससे पूर्व होसबाले ने सुबह मैक्लोडगंज जाकर दलाई लामा से शिष्टाचार भेंट की और निर्वासित तिब्बती संसद का भी दौरा किया।
भारत विश्व को दिशा दिखाने में सक्षम : लिंग रिंपोछे
सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सातवें लिंग रिंपोछे ने संघ के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि समाज में समरसता और सद्भाव बढ़ाने में संगठन की भूमिका अहम है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और अहिंसा को विश्व शांति का आधार बताते हुए कहा कि भारत में वह क्षमता है कि वह पूरी दुनिया को सही राह दिखा सके।
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उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर के द्वंद्व और संघर्ष को शांत नहीं करेगा, तब तक बाहरी दुनिया के युद्धों को समाप्त करना संभव नहीं है। यह आयोजन देव भूमि मैत्री संघ द्वारा तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा के 90वें जन्मवर्ष और आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में किया गया।
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होसबाले ने भगवान बुद्ध के वचनों ‘एषः धर्म सनातनः’ का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन धर्म की जड़ें प्रकृति में हैं और मानव सेवा ही इसका मूल स्वरूप है। उन्होंने कहा कि कोई भी समाज मजबूत नैतिक मूल्यों और धर्म की रक्षा के बिना टिक नहीं सकता। उन्होंने गुरु तेग बहादुर के बलिदान और दलाई लामा के शांति संदेश को एक ही कड़ी का हिस्सा बताया, जिसका उद्देश्य धर्म की स्थापना और मानवता की रक्षा है।
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अपने संबोधन में सरकार्यवाह ने तिब्बती समुदाय के अपनी पहचान और स्वतंत्रता के लिए किए जा रहे प्रयासों की खुलकर सराहना की। सम्मेलन में किन्नौर, लाहौल-स्पीति और कांगड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए बौद्ध अनुयायियों की उपस्थिति में उन्होंने कहा कि समाज में संवेदना, एकता और सहयोग की भावना ही अशांति का अंतिम समाधान है।
इस मौके पर प्रांत संघचालक डॉ. वीर सिंह रांगड़ा, क्षेत्र कार्यवाह रोशन यादव, डॉ. किस्मत कुमार, भूषण रैना, गेशे लॉगजाग, कार्यक्रम संयोजक डॉ. थूकतन नेगी और सह-संयोजक सुनील शर्मा सहित कई प्रबुद्ध नागरिक और बौद्ध भिक्षु मौजूद रहे। इससे पूर्व होसबाले ने सुबह मैक्लोडगंज जाकर दलाई लामा से शिष्टाचार भेंट की और निर्वासित तिब्बती संसद का भी दौरा किया।
भारत विश्व को दिशा दिखाने में सक्षम : लिंग रिंपोछे
सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सातवें लिंग रिंपोछे ने संघ के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि समाज में समरसता और सद्भाव बढ़ाने में संगठन की भूमिका अहम है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और अहिंसा को विश्व शांति का आधार बताते हुए कहा कि भारत में वह क्षमता है कि वह पूरी दुनिया को सही राह दिखा सके।

धर्म सम्मेलन के दौरान आपस में बातचीत करते आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और तिब्बती धर

धर्म सम्मेलन के दौरान आपस में बातचीत करते आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और तिब्बती धर