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Kangra News: बीमा क्लेम में देरी पर देने होंगे 15.13 लाख रुपये
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धर्मशाला। चोरी मामले के बीमा क्लेम को लंबे समय तक लंबित रखने पर इंश्योरेंस कंपनी को 9 फीसदी ब्याज के साथ 15 लाख 13 हजार 800 रुपये क्लेम राशि चुकानी होगी। साथ ही 50 हजार रुपये मुआवजा और 15 हजार रुपये मुकद्दमा खर्च भी उपभोक्ता को देना होगा। जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष हेमांशु मिश्रा, सदस्य आरती सूद और नारायण ठाकुर की अदालत ने द न्यू एश्योरेंस कंपनी को यह आदेश दिए हैं।
आयोग के समक्ष बीरिंदर
सिंह निवासी ओल्ड चड़ी रोड, धर्मशाला ने शिकायत दर्ज करवाई थी। उन्होंने कहा था कि कोतवाली बाजार में मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकान है। दुकान का स्टॉक, फर्नीचर और फिक्सचर बीमा कंपनी से बीमित था। 16 जनवरी, 2024 को दुकान में चोरी हो गई। इसके बाद पुलिस थाना धर्मशाला में एफआईआर दर्ज करवाई। बीमा कंपनी को भी तुरंत सूचना दी गई और सर्वेयर ने मौके का निरीक्षण किया।
शिकायतकर्ता ने आयोग को बताया कि सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद बीमा कंपनी ने क्लेम का निपटारा नहीं किया। कंपनी का तर्क था कि पुलिस ने कुछ चोरी हुआ सामान बरामद किया है और मामला अदालत में विचाराधीन है। इसलिए अंतिम फैसला आने तक क्लेम नहीं दिया जा सकता। आयोग ने कहा कि चोरी साबित करने के लिए एफआईआर और जांच जरूरी है लेकिन आपराधिक मामले का अंतिम फैसला आने तक बीमा क्लेम रोकना उचित नहीं है।
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आयोग ने माना कि सर्वेयर ने नुकसान का आकलन 13.56 लाख रुपये किया था लेकिन जीएसटी राशि को गलत तरीके से घटाया गया। चोरी हुए सामान पर इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं लिया जा सकता इसलिए जीएसटी भी वास्तविक नुकसान का हिस्सा माना जाएगा। पुलिस ने केवल 6 मोबाइल फोन बरामद किए थे जिनकी कीमत करीब 1.04 लाख रुपये थी। इसके बावजूद बीमा कंपनी पूरे क्लेम को ''''नॉन-ट्रेसेबल रिपोर्ट'''' के नाम पर लंबित रखा जो सेवा में कमी मानी गई। इन सभी तथ्यों को जांचने के बाद आयोग ने उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है।
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आयोग के समक्ष बीरिंदर
सिंह निवासी ओल्ड चड़ी रोड, धर्मशाला ने शिकायत दर्ज करवाई थी। उन्होंने कहा था कि कोतवाली बाजार में मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकान है। दुकान का स्टॉक, फर्नीचर और फिक्सचर बीमा कंपनी से बीमित था। 16 जनवरी, 2024 को दुकान में चोरी हो गई। इसके बाद पुलिस थाना धर्मशाला में एफआईआर दर्ज करवाई। बीमा कंपनी को भी तुरंत सूचना दी गई और सर्वेयर ने मौके का निरीक्षण किया।
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शिकायतकर्ता ने आयोग को बताया कि सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने के बावजूद बीमा कंपनी ने क्लेम का निपटारा नहीं किया। कंपनी का तर्क था कि पुलिस ने कुछ चोरी हुआ सामान बरामद किया है और मामला अदालत में विचाराधीन है। इसलिए अंतिम फैसला आने तक क्लेम नहीं दिया जा सकता। आयोग ने कहा कि चोरी साबित करने के लिए एफआईआर और जांच जरूरी है लेकिन आपराधिक मामले का अंतिम फैसला आने तक बीमा क्लेम रोकना उचित नहीं है।
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आयोग ने माना कि सर्वेयर ने नुकसान का आकलन 13.56 लाख रुपये किया था लेकिन जीएसटी राशि को गलत तरीके से घटाया गया। चोरी हुए सामान पर इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं लिया जा सकता इसलिए जीएसटी भी वास्तविक नुकसान का हिस्सा माना जाएगा। पुलिस ने केवल 6 मोबाइल फोन बरामद किए थे जिनकी कीमत करीब 1.04 लाख रुपये थी। इसके बावजूद बीमा कंपनी पूरे क्लेम को ''''नॉन-ट्रेसेबल रिपोर्ट'''' के नाम पर लंबित रखा जो सेवा में कमी मानी गई। इन सभी तथ्यों को जांचने के बाद आयोग ने उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है।