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Kangra News: चीड़ की पत्तियों में बुना हुनर, अब राखी बन सजेंगी भाई की कलाई पर
Mon, 24 Aug 2026 08:06 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Mon, 24 Aug 2026 08:06 AM IST
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लदवाड़ा की मनीषा के ग्रुप में तैयार की राखियां। जागरूक पाठक
- फोटो : Archive
धर्मशाला। जिले के लदवाड़ा गांव के स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने मेहनत और कलात्मक हुनर के दम पर चीड़ की पत्तियों से 300 आकर्षक राखियां तैयार की हैं। समूह को मिले 300 हस्तनिर्मित राखियों के ऑर्डर को पांच महिलाओं ने समय पर पूरा किया। पर्यावरण अनुकूल सामग्री, रंग-बिरंगे धागों और सजावटी पैटर्न से तैयार इन राखियों की कीमत बाजार में 40 से 60 रुपये तक तय की गई है।
पारंपरिक शिल्पकला और आधुनिक डिजाइनों के संगम से तैयार इन राखियों को समूह की सदस्य मनीषा, मानसी, रिया, रिवानी, ज्योति और माया ने मिलकर बनाया। महिलाओं ने बताया कि इस प्रकार के थोक ऑर्डर मिलने से उनके स्थानीय हुनर को बाजार में नई पहचान मिल रही है। घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ उनकी आजीविका व नियमित आमदनी में भी इजाफा हो रहा है।
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लॉकडाउन में दोस्त की सलाह से शुरू हुआ था सफर
लदवाड़ा की मनीषा ने कोरोना लॉकडाउन के दौरान वर्ष 2021 में एक मित्र की सलाह पर इस स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की थी। मनीषा ने बताया कि जंगलों में आग लगने का मुख्य कारण बनने वाली चीड़ की सूखी पत्तियों को एकत्र कर वे पर्यावरण संरक्षण में योगदान देना चाहती थीं। इसी सोच के साथ उन्होंने चीड़ की पत्तियों से विभिन्न उपयोगी व सजावटी उत्पाद बनाने शुरू किए। वर्तमान में समूह के साथ 16 से 17 महिलाएं जुड़कर कार्य कर रही हैं। बाजार में महंगी व प्लास्टिक युक्त राखियों के विकल्प के रूप में पर्यावरण हितैषी (ईको-फ्रेंडली) हस्तनिर्मित राखियों की मांग लगातार बढ़ रही है।
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पारंपरिक शिल्पकला और आधुनिक डिजाइनों के संगम से तैयार इन राखियों को समूह की सदस्य मनीषा, मानसी, रिया, रिवानी, ज्योति और माया ने मिलकर बनाया। महिलाओं ने बताया कि इस प्रकार के थोक ऑर्डर मिलने से उनके स्थानीय हुनर को बाजार में नई पहचान मिल रही है। घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ उनकी आजीविका व नियमित आमदनी में भी इजाफा हो रहा है।
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लॉकडाउन में दोस्त की सलाह से शुरू हुआ था सफर
लदवाड़ा की मनीषा ने कोरोना लॉकडाउन के दौरान वर्ष 2021 में एक मित्र की सलाह पर इस स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की थी। मनीषा ने बताया कि जंगलों में आग लगने का मुख्य कारण बनने वाली चीड़ की सूखी पत्तियों को एकत्र कर वे पर्यावरण संरक्षण में योगदान देना चाहती थीं। इसी सोच के साथ उन्होंने चीड़ की पत्तियों से विभिन्न उपयोगी व सजावटी उत्पाद बनाने शुरू किए। वर्तमान में समूह के साथ 16 से 17 महिलाएं जुड़कर कार्य कर रही हैं। बाजार में महंगी व प्लास्टिक युक्त राखियों के विकल्प के रूप में पर्यावरण हितैषी (ईको-फ्रेंडली) हस्तनिर्मित राखियों की मांग लगातार बढ़ रही है।

लदवाड़ा की मनीषा के ग्रुप में तैयार की राखियां। जागरूक पाठक- फोटो : Archive

लदवाड़ा की मनीषा के ग्रुप में तैयार की राखियां। जागरूक पाठक- फोटो : Archive

लदवाड़ा की मनीषा के ग्रुप में तैयार की राखियां। जागरूक पाठक- फोटो : Archive

लदवाड़ा की मनीषा के ग्रुप में तैयार की राखियां। जागरूक पाठक- फोटो : Archive
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