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Kangra News: जमीन रजिस्ट्री के धोखाधड़ी मामले में अपील खारिज
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धर्मशाला। जमीन रजिस्ट्री में धोखाधड़ी और निर्धारित मूल्य से कम भुगतान करने के आरोप को लेकर न्यायालय ने अपील को खारिज किया है। न्यायालय में प्रतिवादी की ओर से रजिस्ट्री और भुगतान संबंधी ठोस साक्ष्य पेश किए, जबकि शिकायतकर्ता इसमें विफल रहा। वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश डॉ. हकीकत ढांडा की अदालत ने फैसला सुनाते हुए अपील को खारिज करते हुए फैसला सुनाया।
धर्मशाला उपमंडल क्षेत्र के ही एक व्यक्ति ने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि उसने वर्ष 2011 में अपनी भूमि की रजिस्ट्री की थी। इसमें आरोप लगाया था कि यह रजिस्ट्री धोखे, गलत प्रस्तुतीकरण और अनुचित प्रभाव के तहत करवाई गई।
यह भी कहा था कि जमीन के बदले तय की गई लगभग 25 लाख रुपये की राशि उसे नहीं दी गई। इस आधार पर वादी ने रजिस्ट्री और उससे संबंधित म्यूटेशन को अवैध घोषित करने और प्रतिवादी को जमीन में हस्तक्षेप से रोकने की मांग की थी।
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प्रतिवादी ने अदालत में सभी आरोपों को नकारते हुए कहा कि रजिस्ट्री विधि अनुसार और आपसी सहमति से की गई थी। अदालत ने मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और दलीलों का अवलोकन करने के बाद पाया कि वादी अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाया।
अदालत ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर रजिस्ट्री को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक होते हैं। इस पर अदालत ने मुकदमा को निरस्त कर दिया और प्रतिवादी का अधिकार बरकरार रखा।
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धर्मशाला उपमंडल क्षेत्र के ही एक व्यक्ति ने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि उसने वर्ष 2011 में अपनी भूमि की रजिस्ट्री की थी। इसमें आरोप लगाया था कि यह रजिस्ट्री धोखे, गलत प्रस्तुतीकरण और अनुचित प्रभाव के तहत करवाई गई।
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यह भी कहा था कि जमीन के बदले तय की गई लगभग 25 लाख रुपये की राशि उसे नहीं दी गई। इस आधार पर वादी ने रजिस्ट्री और उससे संबंधित म्यूटेशन को अवैध घोषित करने और प्रतिवादी को जमीन में हस्तक्षेप से रोकने की मांग की थी।
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प्रतिवादी ने अदालत में सभी आरोपों को नकारते हुए कहा कि रजिस्ट्री विधि अनुसार और आपसी सहमति से की गई थी। अदालत ने मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और दलीलों का अवलोकन करने के बाद पाया कि वादी अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाया।
अदालत ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर रजिस्ट्री को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए ठोस साक्ष्य आवश्यक होते हैं। इस पर अदालत ने मुकदमा को निरस्त कर दिया और प्रतिवादी का अधिकार बरकरार रखा।