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बैजनाथ शिव मंदिर में कल होगी अखरोटों की बारिश
Updated Wed, 01 Nov 2017 12:10 AM IST
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राजकुमार सूद
बैजनाथ (कांगड़ा)। बैकुंठ चतुर्दशी पर ऐतिहासिक शिव मंदिर में वीरवार दो नवंबर को अखरोटों की बारिश होगी। शिव मंदिर में मनाया जाने वाला यह त्योहार अपने आप में अलग है। माना जाता है कि इस प्रकार का त्योहार मात्र इसी शिव मंदिर में मनाए जाने की परंपरा है।
मंदिर के पुजारी सुरिंद्र आचार्य ने बताया कि शंखासुर राक्षस ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली और उनका राजपाठ छीन कर वहां स्वयं राज करने लगा। देवता युद्ध में हारने के बाद गुफाओं और जंगलों में रहने लगे। देव मंत्र देवताओं के पास होने के कारण वे हार के बाद भी शक्तिशाली थे। यह सब देखकर राक्षस ने वेदमंत्रों को अपने कब्जे में लेने के प्रयास शुरू कर दिए। यह देख कर ब्राह्मण भगवान विष्णु का पास गए और वेदमंत्रों की रक्षा करने का आग्रह किया।
भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया और कश्यप ऋषि की अंजलि में समा गए और बाद में चोटी नदियों से होते हुए समुद्र में प्रवेश कर गए। उन्होंने वेदमंत्रों को अपने कब्जे में ले लिया और प्रयागराज ले गए। इसी खुशी में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश पर इस प्रकार की बारिश का आयोजन किए जाने की प्रथा है। देवशायनी एकादशी के बाद समस्त शुभ कार्यों को किए जाने का रास्ता खुल जाता है। वीरवार शाम को होने वाली आरती के बाद आयोजित होने वाले इस आयोजन से पूर्व मंदिर के दाएं तरफ स्थित पीतांवरी होलिका की मूर्ति की पूजा की जाएगी। पूजा के बाद मंदिर पुजारी मंदिर के ऊपरी भाग से अखरोटों की बारिश करेंगे। इन अखरोटों को नीचे प्रांगण में स्थित सैकडों लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। मंदिर ट्रस्टी घनश्याम अवस्थी ने बताया कि इस बार करीब 10 हजार अखरोटों का प्रयोग बारिश के रूप में किया जाएगा।
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बैजनाथ (कांगड़ा)। बैकुंठ चतुर्दशी पर ऐतिहासिक शिव मंदिर में वीरवार दो नवंबर को अखरोटों की बारिश होगी। शिव मंदिर में मनाया जाने वाला यह त्योहार अपने आप में अलग है। माना जाता है कि इस प्रकार का त्योहार मात्र इसी शिव मंदिर में मनाए जाने की परंपरा है।
मंदिर के पुजारी सुरिंद्र आचार्य ने बताया कि शंखासुर राक्षस ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली और उनका राजपाठ छीन कर वहां स्वयं राज करने लगा। देवता युद्ध में हारने के बाद गुफाओं और जंगलों में रहने लगे। देव मंत्र देवताओं के पास होने के कारण वे हार के बाद भी शक्तिशाली थे। यह सब देखकर राक्षस ने वेदमंत्रों को अपने कब्जे में लेने के प्रयास शुरू कर दिए। यह देख कर ब्राह्मण भगवान विष्णु का पास गए और वेदमंत्रों की रक्षा करने का आग्रह किया।
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भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया और कश्यप ऋषि की अंजलि में समा गए और बाद में चोटी नदियों से होते हुए समुद्र में प्रवेश कर गए। उन्होंने वेदमंत्रों को अपने कब्जे में ले लिया और प्रयागराज ले गए। इसी खुशी में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश पर इस प्रकार की बारिश का आयोजन किए जाने की प्रथा है। देवशायनी एकादशी के बाद समस्त शुभ कार्यों को किए जाने का रास्ता खुल जाता है। वीरवार शाम को होने वाली आरती के बाद आयोजित होने वाले इस आयोजन से पूर्व मंदिर के दाएं तरफ स्थित पीतांवरी होलिका की मूर्ति की पूजा की जाएगी। पूजा के बाद मंदिर पुजारी मंदिर के ऊपरी भाग से अखरोटों की बारिश करेंगे। इन अखरोटों को नीचे प्रांगण में स्थित सैकडों लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। मंदिर ट्रस्टी घनश्याम अवस्थी ने बताया कि इस बार करीब 10 हजार अखरोटों का प्रयोग बारिश के रूप में किया जाएगा।
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