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नूरपुर की जनता ने भी बदला जनादेश
Updated Wed, 20 Dec 2017 12:26 AM IST
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रितेश महाजन
नूरपुर(कांगड़ा)। इस बार भी प्रदेश में सत्ता के साथ अपना जनादेश बदलने की परंपरा के नूरपुर हलके की जनता ने कायम रखा है। नूरपुर क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी एवं निवर्तमान विधायक अजय महाजन भी जनता के बारी-बारी सत्ता की कुंजी सौंपने के सियासी मिथक को तोड़ नहीं पाए।
नूरपुर विस क्षेत्र के सियासी इतिहास पर गौर फरमाएं तो बेशक प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही नूरपुर से विधायक भी बदलते रहे हैं।
1977 में जनता पार्टी की लहर के बावजूद पहली मर्तबा कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा पहुंचे सत महाजन को करीब ढाई साल के लिए विपक्ष में बैठना पड़ा था, लेकिन 1980 में शांता कुमार की सरकार टूटने के बाद आज तक नूरपुर का कोई भी विधायक विपक्ष में नहीं बैठा है। ठाकुर रामलाल की सरकार में सत महाजन को पहली मर्तबा राजस्व और पर्यटन मंत्री के पद से नवाजा गया। इससे पहले 1972 के चुनाव में बतौर आजाद उम्मीदवार केवल सिंह पठानिया ने सत महाजन को हराया। इस चुनाव में कांग्रेस ने केवल सिंह का टिकट काट कर सत महाजन को थमा दिया था। जबकि उससे पहले 1967 के चुनाव में यहां से केवल सिंह पठानिया के पिता वजीर करतार सिंह पठानिया ने कांग्रेस की टिकट पर जीत का परचम लहराया था। इसके बाद राजपूत बाहुल्य नूरपुर हलके में 1977, 1982 और 1985 में जीत की हैट्रिक बनाने वाले कांग्रेस के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले स्व. सत महाजन की जीत में जातीय समीकरणों के बजाय दलीय राजनीति हावी रही। 1990 में एक बार फिर से केवल सिंह पठानिया जनता दल की टिकट पर कांग्रेस प्रत्याशी सत महाजन को हराकर शांता कुमार की सरकार में विधायक बने। इसके बाद 1993 के मध्यावधि चुनाव में एक समझौते के तहत केवल सिंह पठानिया कांग्रेस में शामिल हो गए और ज्वालामुखी हलके से चुनाव जीतकर वीरभद्र सरकार में परिवहन मंत्री का पद हासिल किया। जबकि नूरपुर सीट से कांग्रेस टिकट पर सत महाजन भाजपा के मेघराज अवस्थी को हराकर वीरभद्र सरकार में विधायक चुने गए। 1998 के चुनाव में भाजपा का कमल खिलाने वाले राकेश पठानिया को पर्यटन निगम के चेयरमैन पद का तोहफा मिला। तो वहीं, 2003 में नूरपुर सीट से पांचवीं बार जीते सत महाजन को ग्रामीण विकास एवं राजस्व मंत्री बनने का मौका मिला। 2007 के चुनाव में भाजपा के कुनबे से छिटके बतौर आजाद उम्मीदवार जीतने के बाद राकेश पठानिया ने एसोसिएट विधायक बनने के बाद सत्ता का सुख भोगा, जबकि 2012 के विस चुनाव में प्रदेेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही कांग्रेस टिकट पर पहली मर्तबा विधायक बनने वाले अजय महाजन को नूरपुर हलके की नुमाइंदगी करने का मौका मिला था।
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नूरपुर(कांगड़ा)। इस बार भी प्रदेश में सत्ता के साथ अपना जनादेश बदलने की परंपरा के नूरपुर हलके की जनता ने कायम रखा है। नूरपुर क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी एवं निवर्तमान विधायक अजय महाजन भी जनता के बारी-बारी सत्ता की कुंजी सौंपने के सियासी मिथक को तोड़ नहीं पाए।
नूरपुर विस क्षेत्र के सियासी इतिहास पर गौर फरमाएं तो बेशक प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही नूरपुर से विधायक भी बदलते रहे हैं।
1977 में जनता पार्टी की लहर के बावजूद पहली मर्तबा कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा पहुंचे सत महाजन को करीब ढाई साल के लिए विपक्ष में बैठना पड़ा था, लेकिन 1980 में शांता कुमार की सरकार टूटने के बाद आज तक नूरपुर का कोई भी विधायक विपक्ष में नहीं बैठा है। ठाकुर रामलाल की सरकार में सत महाजन को पहली मर्तबा राजस्व और पर्यटन मंत्री के पद से नवाजा गया। इससे पहले 1972 के चुनाव में बतौर आजाद उम्मीदवार केवल सिंह पठानिया ने सत महाजन को हराया। इस चुनाव में कांग्रेस ने केवल सिंह का टिकट काट कर सत महाजन को थमा दिया था। जबकि उससे पहले 1967 के चुनाव में यहां से केवल सिंह पठानिया के पिता वजीर करतार सिंह पठानिया ने कांग्रेस की टिकट पर जीत का परचम लहराया था। इसके बाद राजपूत बाहुल्य नूरपुर हलके में 1977, 1982 और 1985 में जीत की हैट्रिक बनाने वाले कांग्रेस के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले स्व. सत महाजन की जीत में जातीय समीकरणों के बजाय दलीय राजनीति हावी रही। 1990 में एक बार फिर से केवल सिंह पठानिया जनता दल की टिकट पर कांग्रेस प्रत्याशी सत महाजन को हराकर शांता कुमार की सरकार में विधायक बने। इसके बाद 1993 के मध्यावधि चुनाव में एक समझौते के तहत केवल सिंह पठानिया कांग्रेस में शामिल हो गए और ज्वालामुखी हलके से चुनाव जीतकर वीरभद्र सरकार में परिवहन मंत्री का पद हासिल किया। जबकि नूरपुर सीट से कांग्रेस टिकट पर सत महाजन भाजपा के मेघराज अवस्थी को हराकर वीरभद्र सरकार में विधायक चुने गए। 1998 के चुनाव में भाजपा का कमल खिलाने वाले राकेश पठानिया को पर्यटन निगम के चेयरमैन पद का तोहफा मिला। तो वहीं, 2003 में नूरपुर सीट से पांचवीं बार जीते सत महाजन को ग्रामीण विकास एवं राजस्व मंत्री बनने का मौका मिला। 2007 के चुनाव में भाजपा के कुनबे से छिटके बतौर आजाद उम्मीदवार जीतने के बाद राकेश पठानिया ने एसोसिएट विधायक बनने के बाद सत्ता का सुख भोगा, जबकि 2012 के विस चुनाव में प्रदेेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही कांग्रेस टिकट पर पहली मर्तबा विधायक बनने वाले अजय महाजन को नूरपुर हलके की नुमाइंदगी करने का मौका मिला था।
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