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हिमालय दिवस विशेष: वैज्ञानिकों की चेतावनी, पहाड़ की वहन क्षमता के मुताबिक विकास नहीं हुआ तो बढ़ेंगे खतरे

Wed, 09 Sep 2026 03:32 AM IST
Krishan Singh विश्वास भारद्वाज, शिमला।
विश्वास भारद्वाज, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 09 Sep 2026 03:32 AM IST
सार

 हिमालयी क्षेत्र अब सिर्फ बर्फ पिघलने की चुनौती ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित निर्माण, भूस्खलन, जंगलों में कमी और बढ़ते मानवीय दबाव से जूझ रहा है। अगस्त 2026 में प्रकाशित कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने तापमान वृद्धि, बर्फबारी में कमी, भूस्खलन, वन क्षेत्र और कार्बन भंडार में गिरावट की गंभीर तस्वीर सामने रखी है।

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Himalaya Day Special: Scientists warn of rising risks if development does not align with the mountains' carryi
हिमालय पर बढ़ रहा दबाव। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

 हिमाचल प्रदेश का हिमालयी क्षेत्र अब सिर्फ बर्फ पिघलने की चुनौती ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित निर्माण, भूस्खलन, जंगलों में कमी और बढ़ते मानवीय दबाव से जूझ रहा है। इस दबाव का असर बर्फ, जल स्रोत, नदियों, जंगलों और जैव विविधता पर साफ दिखाई देने लगा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में सामने आया है कि ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से बर्फबारी घट रही है और बारिश का हिस्सा बढ़ रहा है। वहीं, भूमि उपयोग में बदलाव और निर्माण गतिविधियां ढलानों को कमजोर कर रही हैं। अगस्त 2026 में प्रकाशित कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने तापमान वृद्धि, बर्फबारी में कमी, भूस्खलन, वन क्षेत्र और कार्बन भंडार में गिरावट की गंभीर तस्वीर सामने रखी है। 

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चंद्रा बेसिन में तापमान औसतन 0.15 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक बढ़ा 
चंद्रा बेसिन के 1950 से 2024 तक के आंकड़ों के अध्ययन के अनुसार यहां तापमान औसतन 0.15 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक बढ़ा है। सालाना बारिश बढ़ी, जबकि बर्फबारी में करीब तीन सेंटीमीटर प्रति वर्ष की कमी दर्ज हुई। मानसून से पहले बर्फ की औसत गहराई भी घटने के संकेत मिले हैं। यानी हिमालय के इस क्षेत्र में बर्फ की जगह बारिश का हिस्सा बढ़ रहा है। इससे हिमनदों और नदियों में पानी पहुंचने के समय और मात्रा पर असर पड़ सकता है। सोलन-शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए अध्ययन में भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों को चिह्नित किया गया है। यहां अंधाधुंध खोदाई की वजह से ऐसे क्षेत्र बढ़े हैं। वहीं, आईआईटी मंडी से जुड़े अध्ययन में ऊहल बेसिन में सड़क, नदियों और भूगर्भीय दरारों को भूस्खलन के प्रमुख कारकों में पाया गया।

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2035 तक वन क्षेत्र 25.94 फीसदी तक सिमट सकता है: अध्ययन
एक अन्य अध्ययन के अनुसार 1985 में हिमाचल के कुल क्षेत्रफल में वन क्षेत्र की हिस्सेदारी उस रफ्तार से नहीं बढ़ पा रही है, जैसी अपेक्षित रही है। मौजूदा भूमि उपयोग बदलाव जारी रहने पर 2035 तक यह क्षेत्र 25.94 फीसदी तक सिमट सकता है। शिमला, कुल्लू और सोलन को भूमि उपयोग बदलाव से अधिक प्रभावित क्षेत्र बताया गया है। हिमाचल में शिवालिक, मध्य हिमालय, उच्च हिमालय और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र आते हैं। धौलाधार, पीर पंजाल, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जैसे विविध भूभाग जलवायु परिवर्तन के अलग-अलग प्रभाव झेल रहे हैं। इसलिए विशेषज्ञों के सामने चुनौती केवल आपदा प्रबंधन की नहीं, बल्कि विकास की सीमा और पहाड़ की वहन क्षमता तय करने की भी है। नए अध्ययनों का संकेत है कि हिमालय को बचाने के लिए संवेदनशील ढलानों में निर्माण नियमन, वैज्ञानिक भूस्खलन मानचित्रण, जंगल और कार्बन भंडार संरक्षण, हिमनद व बर्फ की लगातार निगरानी तथा जलवायु अनुकूल सड़क और पर्यटन नीति जरूरी है।
 

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बदलते मौसम से हिमालय पर दबाव : रंधावा
जलवायु परिवर्तन से हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियरों के द्रव्यमान में कमी और उनके पिघलने की प्रक्रिया तेज हो रही है। ग्लेशियर झीलों के विस्तार और अस्थिरता से ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ का जोखिम बढ़ रहा है, जबकि बदलते वर्षा पैटर्न अत्यधिक वर्षा और बादल फटने जैसी घटनाओं के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए हिमाचल में विकास योजनाओं को हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी, जल सुरक्षा और आपदा जोखिम को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक आधार पर तैयार करना जरूरी है। - डाॅ. एसएस रंधावा, पर्यावरण वैज्ञानिक

बर्फबारी सिमटी, अब फरवरी-मार्च में गिर रही बर्फ
हिमाचल में जलवायु परिवर्तन का असर बर्फबारी के क्रम पर भी पड़ा है। 80 और 90 के दशक में नवंबर से जनवरी के बीच नियमित और भारी हिमपात होता था, लेकिन अब बर्फबारी के दिन घट रहे हैं। वर्ष 2020 में 69.4 सेंटीमीटर बर्फ दर्ज हुई थी, 2021-22 में अच्छा हिमपात हुआ लेकिन 2023 से 2025 के बीच दिसंबर-जनवरी में बर्फबारी बेहद कम रही। साल 2025 में 33 सेंटीमीटर हिमपात दर्ज किया गया। जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर पश्चिमी विक्षोभ को इसका कारण माना जा रहा है। बर्फबारी का दौर पारंपरिक दिसंबर-जनवरी के बजाय फरवरी और मार्च के शुरुआती हफ्तों की ओर बढ़ गया है।

जलवायु परिवर्तन से सेब उत्पादन में भारी उतार-चढ़ाव
हिमाचल में छह साल में सेब उत्पादन के आंकड़ों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वर्ष 2020-21 में 2.40 करोड़ पेटियां उत्पादन हुआ था, जो 2022-23 में बढ़कर 3.36 करोड़ और 2025-26 में 3.49 करोड़ पेटियों तक पहुंचा। हालांकि, इस साल प्रतिकूल मौसम के चलते उत्पादन करीब 2.15 करोड़ पेटियों तक सिमटने का अनुमान है। सर्दियों में पर्याप्त बर्फबारी न होना, कम चिलिंग आवर्स, बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और तापमान में उतार-चढ़ाव ने बागवानों की चिंता बढ़ाई है।

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