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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Himachal High Court rules divorce deed invalid without court approval; a mere stamp paper is not enough.

हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- बिना कोर्ट की मंजूरी तलाकनामा अमान्य, महज स्टांप पेपर पर्याप्त नहीं

Sat, 12 Sep 2026 10:36 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Sat, 12 Sep 2026 10:36 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत बिना अदालत की मंजूरी या बिना पुख्ता रूप से सिद्ध की गई परंपरा के स्टांप पेपर पर लिखा गया तलाकनामा कानूनी रूप से मान्य नहीं है। 

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Himachal High Court rules divorce deed invalid without court approval; a mere stamp paper is not enough.
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत बिना अदालत की मंजूरी या बिना पुख्ता रूप से सिद्ध की गई परंपरा के स्टांप पेपर पर लिखा गया तलाकनामा कानूनी रूप से मान्य नहीं है। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने चंबा जिले से जुड़े एक पुराने भूमि विवाद मामले को लेकर दायर अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने इसके साथ ही मृतक की ओर से निष्पादित की गई पंजीकृत वसीयत को वैध माना है। अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म में विवाह को एक संस्कार माना गया है।

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कानूनन, प्रथागत तलाक को तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसे अदालत के समक्ष ठोस गवाहों और साक्ष्यों के साथ साबित न किया जाए। इस मामले में पारंपरिक तलाक का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला। यह विवाद श्रीधर नाम के व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनकी भूमि के मालिकाना हक को लेकर शुरू हुआ था। वादी भिंद्रो ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर कहा था कि श्रीधर ने 11 सितंबर 1997 को उनके पक्ष में एक पंजीकृत वसीयत की थी।
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उन्होंने दावा किया कि श्रीधर ने अपनी पहली पत्नी कांतो को 21 मई 1976 को ही तलाक दे दिया था, जिसके बाद कांतो ने शिव राम नामक व्यक्ति से दूसरी शादी कर ली थी। दूसरी तरफ कांतो ने खुद को श्रीधर की कानूनी विधवा और अपनी बेटी को उनकी वारिस बताते हुए वसीयत को फर्जी और संदेहास्पद करार दिया था।अदालत ने पाया कि वसीयत पूरी तरह कानूनी नियमों (भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63) के तहत लिखी और पंजीकृत की गई थी। गवाहों की मौजूदगी में श्रीधर ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। सिर्फ लाभार्थी की उपस्थिति मात्र से वसीयत को संदेहास्पद नहीं माना जा सकता।

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