हाईकोर्ट का आदेश: फंड की कमी का बहाना नहीं चलेगा, ठेकेदार को 64.58 लाख तीन माह में दे सरकार
अदालत ने जनहित और ठेकेदारों को होने वाली वित्तीय परेशानी को ध्यान में रखते हुए एक ठेकेदार के 64,58,414 रुपये की बकाया राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर करने का अंतिम आदेश दिया है।
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने निर्माण कार्यों का भुगतान लटकाने और फंड की कमी का बहाना बनाने पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने जनहित और ठेकेदारों को होने वाली वित्तीय परेशानी को ध्यान में रखते हुए एक ठेकेदार के 64,58,414 रुपये की बकाया राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर करने का अंतिम आदेश दिया है। यदि सरकार इस समय-सीमा के भीतर भुगतान नहीं करती है, तो उसे बकाया राशि पर 6 फीसदी सालाना की दर से ब्याज भी देना होगा। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने क्लास-ए ठेकेदार फर्म एनडीएन कंस्ट्रक्शंस की ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह फैसला दिया।
लोक निर्माण विभाग ने 26 फरवरी 2021 को मंडी जिले के सिविल अस्पताल सुंदरनगर में विभिन्न श्रेणियों के कुल 40 सरकारी क्वार्टरों के निर्माण का ठेका एनडीएन कंस्ट्रक्शंस को दिया था। इस पूरे निर्माण कार्य की कुल लागत 5,55,55,500 रुपये तय की गई थी। ठेकेदार ने काम के दौरान 11 रनिंग बिल पेश किए। विभाग ने 3,94,38,255 रुपये के कुल बिलों में से 3,29,79,841 रुपये का भुगतान तो कर दिया, लेकिन 11वें रनिंग बिल की 64,58,414 रुपये की राशि साल 2024 से नहीं दी थी। सुनवाई के दौरान सरकार ने स्वीकार किया था कि ठेकेदार का बिल बिल्कुल सही और स्वीकृत है, लेकिन सरकार के पास पर्याप्त बजट (फंड) न होने के कारण यह भुगतान नहीं किया जा सका। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि विभाग ने अगस्त 2025 में बजट की मांग की थी, लेकिन सरकार ने एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पैसा जारी नहीं किया।
सरकार की दलील खारिज
अदालत ने कहा कि सरकार की इस लापरवाही के कारण ठेकेदार वित्तीय संकट में आ गया है, क्योंकि उसने काम के लिए बैंक से लोन लिया हुआ है जिस पर लगातार भारी ब्याज बढ़ रहा है। सरकार ने दलील दी थी कि अनुबंध के तहत किसी भी विवाद की स्थिति में मामला मध्यस्थ के पास जाना चाहिए। इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले एबीएल इंटरनेशनल लिमिटेड बनाम एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब राज्य सरकार खुद अपनी देनदारी को स्वीकार कर रही हो और मामले में कोई तथ्यात्मक विवाद न हो, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को सीधे भुगतान का आदेश देने का पूरा अधिकार है।