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सही शोध से ही सामने आएंगे इतिहास के वास्तविक तथ्य : अग्निहोत्री
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ठाकुर रामसिंह इतिहास शोध संस्थान नेरी मेंआयोजित कार्यशाला में उपस्थित शोधार्थीव अन्य। स्रोत
रंगस (हमीरपुर)। ठाकुर रामसिंह इतिहास शोध संस्थान नेरी में सामाजिक विज्ञान में अनुसंधान पद्धति, सिद्धांत और व्यवहार विषय पर आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का रविवार को समापन हो गया। कार्यशाला का आयोजन ठाकुर रामसिंह इतिहास शोध संस्थान, सरदार पटेल विश्वविद्यालय और एसजेवीएन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
समापन सत्र में आचार्य कुलदीप चंद अग्निहोत्री मुख्यातिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ प्रो. नारायण सिंह राव और डॉ. सूरत ठाकुर भी मौजूद रहे। इस अवसर पर शोध और इतिहास लेखन के विभिन्न आयामों पर विस्तृत चर्चा की गई।
आचार्य कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि इतिहास में दृष्टिकोण अक्सर शक्तिशाली वर्गों द्वारा गढ़े जाते हैं और सही शोध के माध्यम से ही उनका तथ्यपरक प्रतिकार संभव है। उन्होंने शोधार्थियों का आह्वान किया कि वे अपने शोध कार्यों में प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर भारतीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखते हुए इतिहास और समाज की व्याख्या करें।
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प्रो. नारायण सिंह राव ने कहा कि शोध कार्य केवल पुस्तकीय अध्ययन तक सीमित नहीं होना चाहिए। तथ्यों का संकलन जमीनी स्तर पर जाकर किया जाना चाहिए तथा उनके विश्लेषण में स्थानीय मान्यताओं, संस्कृति और क्षेत्रीय इतिहास की समझ भी शामिल होनी चाहिए।
कार्यशाला संयोजक प्रो. कंवर चंद्रदीप ने बताया कि कार्यशाला में गुजरात, ग्वालियर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, जम्मू और हिमाचल प्रदेश सहित देश के 13 विश्वविद्यालयों तथा सात महाविद्यालयों के आचार्यों और शोधार्थियों ने भाग लिया।
उन्होंने बताया कि तीन दिनों तक चले इस आयोजन में 10 तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें भारतीय शोध पद्धति, भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय इतिहास, तथ्य संकलन और अनुसंधान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेषज्ञों ने शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया।
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समापन सत्र में आचार्य कुलदीप चंद अग्निहोत्री मुख्यातिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ प्रो. नारायण सिंह राव और डॉ. सूरत ठाकुर भी मौजूद रहे। इस अवसर पर शोध और इतिहास लेखन के विभिन्न आयामों पर विस्तृत चर्चा की गई।
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आचार्य कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि इतिहास में दृष्टिकोण अक्सर शक्तिशाली वर्गों द्वारा गढ़े जाते हैं और सही शोध के माध्यम से ही उनका तथ्यपरक प्रतिकार संभव है। उन्होंने शोधार्थियों का आह्वान किया कि वे अपने शोध कार्यों में प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर भारतीय दृष्टिकोण को केंद्र में रखते हुए इतिहास और समाज की व्याख्या करें।
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प्रो. नारायण सिंह राव ने कहा कि शोध कार्य केवल पुस्तकीय अध्ययन तक सीमित नहीं होना चाहिए। तथ्यों का संकलन जमीनी स्तर पर जाकर किया जाना चाहिए तथा उनके विश्लेषण में स्थानीय मान्यताओं, संस्कृति और क्षेत्रीय इतिहास की समझ भी शामिल होनी चाहिए।
कार्यशाला संयोजक प्रो. कंवर चंद्रदीप ने बताया कि कार्यशाला में गुजरात, ग्वालियर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, जम्मू और हिमाचल प्रदेश सहित देश के 13 विश्वविद्यालयों तथा सात महाविद्यालयों के आचार्यों और शोधार्थियों ने भाग लिया।
उन्होंने बताया कि तीन दिनों तक चले इस आयोजन में 10 तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें भारतीय शोध पद्धति, भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय इतिहास, तथ्य संकलन और अनुसंधान के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेषज्ञों ने शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया।