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CPS Appointment Case: हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले की अलग-अलग व्याख्या, विशेषज्ञ भी एकमत नहीं; जानें पूरा मामला
Fri, 15 Nov 2024 12:42 PM IST
अंकेश डोगरा
भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Fri, 15 Nov 2024 12:42 PM IST
सार
हिमाचल प्रदेश में मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले की अलग-अलग तरीके से व्याख्या की जा रही है। विशेषज्ञ भी इसको लेकर एकमत नहीं है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से 18 वर्ष पुराने सीपीसी कानून 2006 को असांविधानिक घोषित करने के बाद छह कांग्रेस विधायकों की सदस्यता को लेकर संशय बन गया है। हाईकोर्ट के फैसले की अलग-अलग तरीके से व्याख्या की जा रही है। विशेषज्ञ भी इसको लेकर एकमत नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव के पद पर ऐसी नियुक्ति को दिए गए संरक्षण को अवैध करार दिया है। अदालत ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा सदस्य अयोग्यता अधिनियम 1971 की धारा 3 (डी) को भी असांविधानिक करार दिया है। इसके तहत सीपीएस पद को सरंक्षण दिया गया था। अदालत में सीपीएस की नियुक्तियों के कानूनी दर्जे को चुनौती दी गई थी।
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याचिका में कहा गया था कि हिमाचल सरकार ने सीपीएस का जो कानून 2006 में बनाया है, वह संविधान के खिलाफ है। हिमाचल विधानसभा को सीपीएस पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 164(1) ए के तहत विधानसभा की कुल मंत्रिपरिषद की संख्या 15 फीसदी से अधिक और 12 फीसदी से कम नहीं होनी चाहिए। प्रदेश सरकार ने इस कानून की वैधता पर अपनी दलीलें दी। सरकार ने कहा था कि मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव का पद 70 वर्षों से भारत में और 18 वर्षों से हिमाचल में लागू है। हिमाचल ने गुड गवर्नेंस और जनहित के कार्यों के लिए सीपीएस नियुक्त किए थे। सीपीएस के पद को मुख्यमंत्री के कार्य को कम करने के लिए नियुक्त किया गया था।
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सरकार ने दलीलों में कहा था कि सीपीएस के पद को 1950 की कन्वेंशन के तहत भारत में भी लागू किया गया। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश विपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के बिम्लांक्षु राय बनाम असम सरकार फैसले के तहत ही हिमाचल के सीपीएस कानून 2006 को भी निरस्त व असांविधानिक करार दिया। बता दें कि सबसे पहले असम राज्य ने वर्ष 2004 में सीपीएस पद को मान्यता देने के लिए कानून बनाया था। सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को चुनौती दी गई। शीर्ष अदालत ने इस कानून को निरस्त कर विधायकों की सदस्यता बरकरार रखी थी। इसी तरह मणिपुर राज्य में भी सीपीएस बनाए गए विधायकों की सदस्यता बरकरार रखी थी।
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कानून अवैध घोषित होने के बाद भी रही है सदस्यता : अनूप
महाधिवक्ता अनूप रतन ने कहा है कि सरकार से विचार-विमर्श करने के बाद जल्द इस मामले में फैसला लिया जाएगा। कहा कि हाईकोर्ट की पूरी जजमेंट बिम्लांक्षु राय बनाम असम सरकार (2018) पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट ने जब असम कानून को अवैध घोषित किया, उसके बाद भी शीर्ष अदालत ने विधायकों की सदस्यता बरकरार रखी थी।
कोर्ट ने पहले दिन से अवैध मानी हैं नियुक्तियां : रजनीश
पीपल फॉर रिस्पोंसिबल के वरिष्ठ अधिवक्ता रजनीश मनीकटाला ने कहा कि मुख्य संसदीय सचिव कानून पर फैसला आने के बाद छह विधायकों की सदस्यता जा सकती है। अदालत ने अपने फैसले में सीपीएस की नियुक्तियों को पहले दिन से ही अवैध और असांविधानिक माना है।
महाधिवक्ता अनूप रतन ने कहा है कि सरकार से विचार-विमर्श करने के बाद जल्द इस मामले में फैसला लिया जाएगा। कहा कि हाईकोर्ट की पूरी जजमेंट बिम्लांक्षु राय बनाम असम सरकार (2018) पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट ने जब असम कानून को अवैध घोषित किया, उसके बाद भी शीर्ष अदालत ने विधायकों की सदस्यता बरकरार रखी थी।
कोर्ट ने पहले दिन से अवैध मानी हैं नियुक्तियां : रजनीश
पीपल फॉर रिस्पोंसिबल के वरिष्ठ अधिवक्ता रजनीश मनीकटाला ने कहा कि मुख्य संसदीय सचिव कानून पर फैसला आने के बाद छह विधायकों की सदस्यता जा सकती है। अदालत ने अपने फैसले में सीपीएस की नियुक्तियों को पहले दिन से ही अवैध और असांविधानिक माना है।
विधायकों की सदस्यता पर मंडरा रहा खतरा : अंकित
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अंकित धीमान ने बताया कि हाईकोर्ट के फैसले आने के बाद विधायकों की सदस्यता पर खतरा मंडरा रहा है और इनकी सदस्यता भी जा सकती है।
नहीं जाएगी विधायकों की सदस्यता : राजेंद्र
विश्वविद्यालय के राजनीतिक शास्त्र विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर राजेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि सीपीएस कानून के निरस्त होने के बाद छह विधायकों की सदस्यता नहीं जाएगी। संविधान के अनुच्छेद 191 के तहत विधायकों की अयोग्यता को परिभाषित किया है कि कब-कब विधायकों की सदस्यता को अयोग्य करार दिया जाएगा। सरकार अगर लाभ के पद पर कानून बनाती है तो वह अयोग्य घोषित नहीं होंगे।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अंकित धीमान ने बताया कि हाईकोर्ट के फैसले आने के बाद विधायकों की सदस्यता पर खतरा मंडरा रहा है और इनकी सदस्यता भी जा सकती है।
नहीं जाएगी विधायकों की सदस्यता : राजेंद्र
विश्वविद्यालय के राजनीतिक शास्त्र विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर राजेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि सीपीएस कानून के निरस्त होने के बाद छह विधायकों की सदस्यता नहीं जाएगी। संविधान के अनुच्छेद 191 के तहत विधायकों की अयोग्यता को परिभाषित किया है कि कब-कब विधायकों की सदस्यता को अयोग्य करार दिया जाएगा। सरकार अगर लाभ के पद पर कानून बनाती है तो वह अयोग्य घोषित नहीं होंगे।