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दंगल पर रोक, कोरोना काल में दिहाड़ी लगा रहे पहलवान

Sun, 20 Jun 2021 07:36 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 20 Jun 2021 07:36 PM IST
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wrestlers doing daily wages during Corona period, Wrestling not done for two years in global pandemic, now it's time to raise a family, chamba news
चंबा। उत्तर भारत में अपने दाव-पेच से विरोधियों को चारों खाने चित कर देने वाले पहलवान अब दिहाड़ी और खेतीबाड़ी कर परिवार का भरण-पोषण करने को मजबूर हैं। दो वर्षों से दंगल-कुश्तियों पर रोक है। इससे पूर्व पड़ोसी राज्यों, प्रदेश व जिला स्तर पर होने वाली दंगल प्रतियोगिताओं में अपना दमखम दिखाकर तीन से पांच लाख कमाने वाले पहलवान अब 400 रुपये में दिहाड़ी लगाने को विवश हैं। कोरोना काल में फ्रंट लाइन वर्करों सहित अन्य के लिए भी राहत प्रदान करने वाली प्रदेश सरकार द्वारा पहलवानों को कोई राहत न देने का मलाल है। रविवार को अमर उजाला ने जिला के नामी पहलवानों से बात कर उनकी प्रतिक्रिया जानी।
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दिहाड़ी लगा कर परिवार पाल रहे : रमेश
पड़ोसी राज्य जम्मू-कश्मीर और हिमाचल में अपनी पहलवानी का डंका बजाने वाले चुराह विधानसभा क्षेत्र के बघेईगढ़ निवासी रमेश पहलवान कोरोना काल में दिहाड़ी लगा कर परिवार पाल रहे हैं। रमेश कुमार ने बताया कि बचपन से ही पहलवानों को कुश्तियां करते देख अपने खेतों में दोस्तों संग कुश्ती के दाव पेच लड़ाते रहते थे। छह वर्ष की आयु में पिता भगत राम का देहांत हो जाने पर परिवार की जिम्मेवारियां उनकी माता के कंधों पर आ गई। वर्ष 1997 से अब तक कई दंगल प्रतियोगिताओं में अपना दमखम दिखा चुके हैं। लेकिन 24 वर्ष में पहली बार उन्होंने कोरोना का बुरा दौर देखा है। वर्तमान समय में वह डाइट भी सही से नहीं खरीद पा रहे हैं। उनका बेटा सुमित ठाकुर रेस्लिंग में दो बार राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा ले चुका है। जो रेस्लिंग हॉस्टल ऊना में रहता है। उनकी बेटी चंपा ठाकुर कबड्डी प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीत चुकी है। उनके बच्चे अभी घर पर ही हैं। कोरोना काल से पहले जून माह से नवंबर तक जिला स्तर पर ही पांच लाख तक कमाई कर लेते थे। अब परिवार पालने के लिए मेहनत-मजदूरी करने को मजबूर हैं।
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दो सालों से खेतीबाड़ी कर रहे पहलवान साहब सिंह
हिमाचल केसरी और मिंजर केसरी का खिताब अपने नाम करने वाले पहलवान साहब सिंह खेतीबाड़ी कर घर खर्च चला रहे हैं। उत्तर भारत में आयोजित होने वाली हरेक कुश्ती में उन्होंने अपना जौहर दिखाया है। अब दो सालों से घर रह कर खेतीबाड़ी करने को मजबूर हैं।
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कोरोना में अखाड़ा भी बंद पड़ा : लक्की
पहलवान लक्की बाथरी ने कहा कि उन्होंने अखाड़ा चलाया हुआ है लेकिन कोरोना में अखाड़ा भी बंद ही पड़ा हुआ है। ऐसे में परिवार का पालन-पोषण करने के लिए मेहनत-मजदूरी कर ही गुजर-बसर कर रहे हैं।

सरकार को पहलवानों के बारे में भी सोचना चाहिए : राजू
पहलवान राजू बाथरी ने कहा कि कुश्तियां न होने से घर खर्च व परिवार का पालन पोषण करने के लिए वह मेहनत-मजदूरी करने को मजबूर हैं। सरकार की नजरें इनायत न होना पहलवानों की मुसीबतें बढ़ा रही है। सरकार को पहलवानों के बारे में भी सोचना चाहिए।
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