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Bilaspur News: ठप्पर में बनाए जा रहे दीये बड़ी कंपनियों के दीयों को दे रहे मात
Sun, 27 Oct 2024 11:15 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sun, 27 Oct 2024 11:15 PM IST
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बिलासपुर के ठप्पर गांव में करीब 10 घंटे तक जलने वाले बनाए गए दिए । संवाद
- उच्च गुणवत्ता के मोम से बने यह दिए 8 से 10 घंटे तक जलते हैं
- दिवाली पर करीब तीन लाख रुपये के कारोबार की उम्मीद
संवाद न्यूज एजेंसी
भराड़ी(बिलासपुर)। उपमंडल झंडूता के तहत ठप्पर गांव में बनाए जा रहे मिट्टी के दीये बड़ी कंपनियों के आर्टिफिशियल दियों को मात दे रहे हैं। बिना केमिकल और उच्च गुणवत्ता के मोम से तैयार किए जा रहे यह दिये आठ से दस घंटे लगातार जलते हैं। इन दियों की मांग बढ़ती जा रही है। हाथों से निर्मित यह मिट्टी के दिए सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रहे हैं।
मांग को पूरा करने के लिए दिन-रात दीये तैयार किए जा रहे हैं। हाथों से निर्मित इन दीयों के कार्यों में दर्जन भर स्थानीय महिलाओं को रोजगार भी उपलब्ध है। दिवाली के मौके पर इन दीयों का तीन लाख रुपये से ज्यादा का कारोबार हो जाता है। दिवाली से करीब छह माह पहले यह दिए बनाने का कार्य शुरू कर दिया जाता है। खास बात यह है कि मिट्टी से भरे दियों में जब मोम खत्म हो जाता है तो यह खाली दिये रंगोली भरने के काम में आते हैं। करीब तीन साल पहले शुरू किए इन दीयों का परीक्षण किया गया था, जिसमें यह आठ से दस घंटे तक लगातार जले थे। उसके बाद बाजार में उपलब्ध हो चुके यह दिए अब लगातार अपनी साख बनाए हुए हैं। ठप्पर गांव के रोशन लाल ने बताया कि वह 40 साल से मिट्टी के खाली दिए बनाने का काम करते आ रहे हैं। वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने के लिए उन्होंने तीन साल पहले बिना केमिकल का मोम डालकर यह दिये तैयार किए। खास तकनीक से मोम के नीचे बत्ती रखकर दिये बनाने से वह घंटों तक जलते हैं। इसके बाद लोग इनमें तेल या घी भरकर भी उपयोग में ला सकते हैं। अन्य दीयों के मुकाबले इन दीयों का दाम भी सस्ता है, जिस कारण दीयों की मांग बढ़ती जा रही है।
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- दिवाली पर करीब तीन लाख रुपये के कारोबार की उम्मीद
संवाद न्यूज एजेंसी
भराड़ी(बिलासपुर)। उपमंडल झंडूता के तहत ठप्पर गांव में बनाए जा रहे मिट्टी के दीये बड़ी कंपनियों के आर्टिफिशियल दियों को मात दे रहे हैं। बिना केमिकल और उच्च गुणवत्ता के मोम से तैयार किए जा रहे यह दिये आठ से दस घंटे लगातार जलते हैं। इन दियों की मांग बढ़ती जा रही है। हाथों से निर्मित यह मिट्टी के दिए सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रहे हैं।
मांग को पूरा करने के लिए दिन-रात दीये तैयार किए जा रहे हैं। हाथों से निर्मित इन दीयों के कार्यों में दर्जन भर स्थानीय महिलाओं को रोजगार भी उपलब्ध है। दिवाली के मौके पर इन दीयों का तीन लाख रुपये से ज्यादा का कारोबार हो जाता है। दिवाली से करीब छह माह पहले यह दिए बनाने का कार्य शुरू कर दिया जाता है। खास बात यह है कि मिट्टी से भरे दियों में जब मोम खत्म हो जाता है तो यह खाली दिये रंगोली भरने के काम में आते हैं। करीब तीन साल पहले शुरू किए इन दीयों का परीक्षण किया गया था, जिसमें यह आठ से दस घंटे तक लगातार जले थे। उसके बाद बाजार में उपलब्ध हो चुके यह दिए अब लगातार अपनी साख बनाए हुए हैं। ठप्पर गांव के रोशन लाल ने बताया कि वह 40 साल से मिट्टी के खाली दिए बनाने का काम करते आ रहे हैं। वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने के लिए उन्होंने तीन साल पहले बिना केमिकल का मोम डालकर यह दिये तैयार किए। खास तकनीक से मोम के नीचे बत्ती रखकर दिये बनाने से वह घंटों तक जलते हैं। इसके बाद लोग इनमें तेल या घी भरकर भी उपयोग में ला सकते हैं। अन्य दीयों के मुकाबले इन दीयों का दाम भी सस्ता है, जिस कारण दीयों की मांग बढ़ती जा रही है।
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