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Bilaspur News: हरा सोना उगलने लगी है निचले हिमाचल की बंजर और सूखी जमीन
Sat, 22 Nov 2025 11:29 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sat, 22 Nov 2025 11:29 PM IST
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एचपी शिवा परियोजना के तहत तैयार क्लस्टर में लगे फल। संवाद
खास खबर
बारिश पर निर्भर खेती को बदलकर आधुनिक बागवानी बनी संजीवनी
मीठा संतरा, लीची, अनार, पिकानट, आम के पौधे जमीन में डाल रहे नई जान
जल संरक्षण तकनीक से बारिश के बिना भी आर्थिकी सुदृढ़ कर रहे हैं बागवान
अनिल ठाकुर
बिलासपुर। निचले हिमाचल की बंजर और बेकार मानी जाने वाली जमीन अब हरा सोना उगलने लगी है। विशेष रूप से निचले हिमाचल के किसान और बागवान अब बारिश पर पूरी तरह निर्भर नहीं हैं। जहां सिंचाई की सुविधा नहीं थी, वहां की भूमि पहले बंजर थी, लेकिन अब वही जमीन बागवानों की आर्थिकी को सुदृढ़ कर रही है।
नई बागवानी से तैयार फसल सीधे बाजार में बिक रही है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं। पहले बंजर मानी जाने वाली भूमि अब बेशकीमती बन चुकी है और हमारे लिए स्थायी आय का स्रोत बन गई है। शिवा परियोजना के तहत प्रदेश में बागवानी को नई पहचान मिली है और किसानों की आय बढ़ाने में यह अहम भूमिका निभा रही है। 2024 में विधिवत शुरू हुई इस परियोजना का लक्ष्य 2028 तक 60 लाख फलदार पौधे लगाना है। अब तक 25 लाख पौधे रोपित हो चुके हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। परियोजना के तहत बिलासपुर, हमीरपुर, मंडी, कांगड़ा, सोलन, सिरमौर और ऊना के 28 ब्लॉकों में 6000 हेक्टेयर भूमि में से 2200 हेक्टेयर भूमि पर फलदार पौधे रोपित किए जा चुके हैं। मीठा संतरा, अरूमद, लीची, अनार, पिकानट, आम, जापानी फल और प्लम जैसे उच्च गुणवत्ता वाले पौधे किसानों की जमीन में नई जान डाल रहे हैं। खास बात यह है कि जिस 80 प्रतिशत भूमि को पहले बंजर माना जाता था, वहां अब किसान स्थायी आय का स्रोत विकसित कर चुके हैं। किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण और आधुनिक बागवानी पद्धतियों से लैस किया जा रहा है। विशेषज्ञ लगातार फसल की गुणवत्ता सुधारने, पौधों की वृद्धि और रोग-मुक्त उत्पादन के तरीकों पर मार्गदर्शन दे रहे हैं। पौधों की बेहतर बढ़वार सुनिश्चित करने के लिए जल संरक्षण तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इससे किसानों की खेती बिना वर्षा के भी खूब फलफूल रही। शिवा परियोजना ने निचले हिमाचल के किसानों की सोच, जीवन शैली और आर्थिक स्थिति में स्थायी बदलाव ला दिया है। अब बंजर भूमि बेशकीमती बन चुकी है। तकनीकी प्रशिक्षण और आधुनिक बागवानी पद्धतियों ने किसानों को नई उम्मीद और आत्मनिर्भरता दी है।
इनसेट
युवाओं में बढ़ी रुचि, बागवानी बनी रोजगार का नया जरिया
युवाओं को बागवानी में रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। कई युवाओं ने अपने बागवानी क्लस्टर विकसित किए हैं, जिससे उत्पादन बढ़ा और बाजार तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित हुई। परियोजना से जुड़े युवा अशोक ने बताया कि बागवानी अब केवल आय का जरिया नहीं, बल्कि रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम भी बन चुकी है। इससे हमारे परिवार को भी लाभ हो रहा है।
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इनसेट
मॉडल बागवानी से मिली नई पहचान
बंजर पहाड़ियों में हरियाली लाने का यह सफल प्रयोग अब मॉडल बन चुका है। परियोजना के तहत फल उत्पादन में 30-40 प्रतिशत की संभावित बढ़ोतरी का अनुमान है। हजारों किसान सीधे लाभान्वित हो रहे हैं और उनके लिए बंजर भूमि सोने में बदल गई है। नए पौधों से तैयार हो रहे फल क्लस्टर से बेहतर मार्केट लिंकिंग भी सुनिश्चित हो रही है।
डॉ. रमल अंगारिया, सह परियोजना निदेशक, एचपी शिवा
संवाद
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बारिश पर निर्भर खेती को बदलकर आधुनिक बागवानी बनी संजीवनी
मीठा संतरा, लीची, अनार, पिकानट, आम के पौधे जमीन में डाल रहे नई जान
जल संरक्षण तकनीक से बारिश के बिना भी आर्थिकी सुदृढ़ कर रहे हैं बागवान
अनिल ठाकुर
बिलासपुर। निचले हिमाचल की बंजर और बेकार मानी जाने वाली जमीन अब हरा सोना उगलने लगी है। विशेष रूप से निचले हिमाचल के किसान और बागवान अब बारिश पर पूरी तरह निर्भर नहीं हैं। जहां सिंचाई की सुविधा नहीं थी, वहां की भूमि पहले बंजर थी, लेकिन अब वही जमीन बागवानों की आर्थिकी को सुदृढ़ कर रही है।
नई बागवानी से तैयार फसल सीधे बाजार में बिक रही है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं। पहले बंजर मानी जाने वाली भूमि अब बेशकीमती बन चुकी है और हमारे लिए स्थायी आय का स्रोत बन गई है। शिवा परियोजना के तहत प्रदेश में बागवानी को नई पहचान मिली है और किसानों की आय बढ़ाने में यह अहम भूमिका निभा रही है। 2024 में विधिवत शुरू हुई इस परियोजना का लक्ष्य 2028 तक 60 लाख फलदार पौधे लगाना है। अब तक 25 लाख पौधे रोपित हो चुके हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। परियोजना के तहत बिलासपुर, हमीरपुर, मंडी, कांगड़ा, सोलन, सिरमौर और ऊना के 28 ब्लॉकों में 6000 हेक्टेयर भूमि में से 2200 हेक्टेयर भूमि पर फलदार पौधे रोपित किए जा चुके हैं। मीठा संतरा, अरूमद, लीची, अनार, पिकानट, आम, जापानी फल और प्लम जैसे उच्च गुणवत्ता वाले पौधे किसानों की जमीन में नई जान डाल रहे हैं। खास बात यह है कि जिस 80 प्रतिशत भूमि को पहले बंजर माना जाता था, वहां अब किसान स्थायी आय का स्रोत विकसित कर चुके हैं। किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण और आधुनिक बागवानी पद्धतियों से लैस किया जा रहा है। विशेषज्ञ लगातार फसल की गुणवत्ता सुधारने, पौधों की वृद्धि और रोग-मुक्त उत्पादन के तरीकों पर मार्गदर्शन दे रहे हैं। पौधों की बेहतर बढ़वार सुनिश्चित करने के लिए जल संरक्षण तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इससे किसानों की खेती बिना वर्षा के भी खूब फलफूल रही। शिवा परियोजना ने निचले हिमाचल के किसानों की सोच, जीवन शैली और आर्थिक स्थिति में स्थायी बदलाव ला दिया है। अब बंजर भूमि बेशकीमती बन चुकी है। तकनीकी प्रशिक्षण और आधुनिक बागवानी पद्धतियों ने किसानों को नई उम्मीद और आत्मनिर्भरता दी है।
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युवाओं में बढ़ी रुचि, बागवानी बनी रोजगार का नया जरिया
युवाओं को बागवानी में रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। कई युवाओं ने अपने बागवानी क्लस्टर विकसित किए हैं, जिससे उत्पादन बढ़ा और बाजार तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित हुई। परियोजना से जुड़े युवा अशोक ने बताया कि बागवानी अब केवल आय का जरिया नहीं, बल्कि रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम भी बन चुकी है। इससे हमारे परिवार को भी लाभ हो रहा है।
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मॉडल बागवानी से मिली नई पहचान
बंजर पहाड़ियों में हरियाली लाने का यह सफल प्रयोग अब मॉडल बन चुका है। परियोजना के तहत फल उत्पादन में 30-40 प्रतिशत की संभावित बढ़ोतरी का अनुमान है। हजारों किसान सीधे लाभान्वित हो रहे हैं और उनके लिए बंजर भूमि सोने में बदल गई है। नए पौधों से तैयार हो रहे फल क्लस्टर से बेहतर मार्केट लिंकिंग भी सुनिश्चित हो रही है।
डॉ. रमल अंगारिया, सह परियोजना निदेशक, एचपी शिवा
संवाद