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झंडूता के गुजरेहड़ा गांव में राजेंद्र कुमार को मिली गुच्छी
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ंडूता के तहत ग्राम पंचायत घंडीर के गांव गुजरेहड़ा के राजेंद्र कुमार खेतों के पास मिली गुच्छी को द
- फोटो : BILASPUR
बरठीं (बिलासपुर)। पिछले चार-पांच सालों से बिलासपुर, हमीरपुर जैसे गर्म इलाकों में भी गुच्छी पाई जाने लगी है। यह इतनी ज्यादा तो नहीं होती पर इसका मिलना इस बात का प्रमाण है कि यहां भी इस गुच्छी की पैदावार को बढ़ावा दिया जा सकता है। यदि सरकार और कृषि विभाग इस पर कुछ शोध करे तो किसानों को इसका भरपूर लाभ मिल सकता है।
विकासखंड झंडूता के तहत ग्राम पंचायत घंडीर के गांव गुजरेहड़ा के राजेंद्र कुमार को यह गुच्छी घर के नजदीक खेतों में काम करते हुए मिली है। राजेंद्र ने बताया कि खेतों को साफ करने का काम कर रहे थे कि इस दौरान इन्हें यह गुच्छी दिखाई दी। उन्होंने बताया करीब एक किलोग्राम की गुच्छी है, जिसे वे खेतों से घर ले आए हैं। उन्होंने सरकार और विभाग से मांग की है कि उनकी भूमि गुच्छी की पैदावार के लिए उपयुक्त है। सरकार व संबंधित विभाग को इस पर शोध कर किसानों को गुच्छी के प्रति जागरूक करना चाहिए ताकि किसानों की आय में भी इजाफा हो।
उधर, कृषि विज्ञान केंद्र बरठीं के प्रभारी डा. सुमन कुमार ने बताया कि गुच्छी औषधीय गुणों से भरपूर होती है। गुच्छी स्वाद में बेजोड़ होती है। स्थानीय भाषा में इसे छतरी, टटमोर और डुंघरू कहा जाता है। उन्होंने बताया कि गुच्छी चंबा, कुल्लू, शिमला, मनाली सहित प्रदेश के कई जिलों के जंगलों में पाई जाती है। बिलासपुर में भी कुछ जगह पर ये मिली है। फिलहाल विभाग ने सफलतापूर्वक गुच्छी के छोटे आकार पर शोध कर लिया है। अब विभाग का गुच्छी के बड़े आकार को लेकर शोध चल रहा है। जो जल्द ही किसानों की आमदनी का स्रोत बनेगी।
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विकासखंड झंडूता के तहत ग्राम पंचायत घंडीर के गांव गुजरेहड़ा के राजेंद्र कुमार को यह गुच्छी घर के नजदीक खेतों में काम करते हुए मिली है। राजेंद्र ने बताया कि खेतों को साफ करने का काम कर रहे थे कि इस दौरान इन्हें यह गुच्छी दिखाई दी। उन्होंने बताया करीब एक किलोग्राम की गुच्छी है, जिसे वे खेतों से घर ले आए हैं। उन्होंने सरकार और विभाग से मांग की है कि उनकी भूमि गुच्छी की पैदावार के लिए उपयुक्त है। सरकार व संबंधित विभाग को इस पर शोध कर किसानों को गुच्छी के प्रति जागरूक करना चाहिए ताकि किसानों की आय में भी इजाफा हो।
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उधर, कृषि विज्ञान केंद्र बरठीं के प्रभारी डा. सुमन कुमार ने बताया कि गुच्छी औषधीय गुणों से भरपूर होती है। गुच्छी स्वाद में बेजोड़ होती है। स्थानीय भाषा में इसे छतरी, टटमोर और डुंघरू कहा जाता है। उन्होंने बताया कि गुच्छी चंबा, कुल्लू, शिमला, मनाली सहित प्रदेश के कई जिलों के जंगलों में पाई जाती है। बिलासपुर में भी कुछ जगह पर ये मिली है। फिलहाल विभाग ने सफलतापूर्वक गुच्छी के छोटे आकार पर शोध कर लिया है। अब विभाग का गुच्छी के बड़े आकार को लेकर शोध चल रहा है। जो जल्द ही किसानों की आमदनी का स्रोत बनेगी।
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