{"_id":"662e4a46a477e444f204512a","slug":"lord-shiva-is-not-worshiped-with-conch-water-suresh-bilaspur-news-c-92-1-bls1002-116556-2024-04-28","type":"story","status":"publish","title_hn":"शंख जल से नहीं होती भगवान शिव की पूजा : सुरेश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शंख जल से नहीं होती भगवान शिव की पूजा : सुरेश
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
- समोह में श्री शिव महापुराण कथा आयोजित
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। झंडूता विधानसभा क्षेत्र के समोह में चल रही श्री शिव महापुराण कथा में पंडित सुरेश भारद्वाज ने कहा कि शंख जल से शिव की अर्चना नहीं की जाती।
उन्होंने बताया कि पूर्व काल में महा पराक्रमी शंखचूड़ नामक एक दैत्य हुआ, जो किसी से मर नहीं रहा था। यही नहीं अपनी अभिमानी सोच के कारण वह दिन-प्रतिदिन अत्याचारी हो रहा था। उन्होंने बताया कि शंखचूड़ ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शंकर के हाथों ही होगा। कालांतर परिवर्तन के बाद शंखचूड़ और भगवान शंकर की शत्रुता बढ़ती गई। भगवान शंकर ने युद्ध में शंखचूड़ दैत्य का वध कर दिया। यही कारण है कि त्रिपुरारी को शंखचूड़ की हड्डियों से निर्मित जल तक मान्य नहीं है। उन्होंने बताया कि शंखचूड़ की हड्डियों से शंख नाम जाति उत्पन्न हुई। बाद में शंखचूड़ तुलसी का पति कहलाया। भगवान विष्णु को तुलसी अति प्रिय है। इसलिए तुलसी के पति की हड्डियों से निर्मित शंख से विष्णु भगवान का पूजन विशेष फलदाई माना जाता है, जबकि शिव को यह ग्राहय नहीं है। उन्होंने बताया कि शंख से स्पर्श की गई वस्तुओं से भी भगवान शिव की पूजा न करें। यही कारण है कि भगवान शिव की पूजा में शंख नहीं बजता है। कथा समापन के बाद महिलाओं ने भोले के सुंदर भजन गाए और प्रसाद वितरित किया।
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। झंडूता विधानसभा क्षेत्र के समोह में चल रही श्री शिव महापुराण कथा में पंडित सुरेश भारद्वाज ने कहा कि शंख जल से शिव की अर्चना नहीं की जाती।
उन्होंने बताया कि पूर्व काल में महा पराक्रमी शंखचूड़ नामक एक दैत्य हुआ, जो किसी से मर नहीं रहा था। यही नहीं अपनी अभिमानी सोच के कारण वह दिन-प्रतिदिन अत्याचारी हो रहा था। उन्होंने बताया कि शंखचूड़ ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल भगवान शंकर के हाथों ही होगा। कालांतर परिवर्तन के बाद शंखचूड़ और भगवान शंकर की शत्रुता बढ़ती गई। भगवान शंकर ने युद्ध में शंखचूड़ दैत्य का वध कर दिया। यही कारण है कि त्रिपुरारी को शंखचूड़ की हड्डियों से निर्मित जल तक मान्य नहीं है। उन्होंने बताया कि शंखचूड़ की हड्डियों से शंख नाम जाति उत्पन्न हुई। बाद में शंखचूड़ तुलसी का पति कहलाया। भगवान विष्णु को तुलसी अति प्रिय है। इसलिए तुलसी के पति की हड्डियों से निर्मित शंख से विष्णु भगवान का पूजन विशेष फलदाई माना जाता है, जबकि शिव को यह ग्राहय नहीं है। उन्होंने बताया कि शंख से स्पर्श की गई वस्तुओं से भी भगवान शिव की पूजा न करें। यही कारण है कि भगवान शिव की पूजा में शंख नहीं बजता है। कथा समापन के बाद महिलाओं ने भोले के सुंदर भजन गाए और प्रसाद वितरित किया।