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चार साल तक आजादी के लिए कुआलालंपुर की जेल रहे कैद
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स्वतंत्रता सेनानी कर्म सिंह
- फोटो : BILASPUR
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भराड़ी(बिलासपुर)। भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी दिलाने के लिए बिलासपुर के कई सेनानियों ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। इनमें से एक ऐसे योद्धा भी थे, जो अपना सबकुछ छोड़कर आजाद हिंद फौज में शामिल हुए और करीब चार साल तक इसी लड़ाई के चलते मलयेशिया के कुआलालंपुर की जेल में कैद रहे।
उन चार सालों में परिजनों ने उनके जिंदा वापस लौटने की उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन वे अपनी सजा काट कर वापस आए और अपनी बाकी की जिंदगी बड़े सम्मान के साथ गुजारी।
हम बात कर रहे हैं घुमारवीं उपमंडल के भब्बा गांव के स्वतंत्रता सेनानी कर्म सिंह की। भारत को आजाद करवाने के लिए आजाद हिंद सेना का जो ऐतिहासिक योगदान रहा है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। वहीं, आजाद हिंद फौज में बिलासपुर जिले के भब्बा गांव के कर्म सिंह का विशेष योगदान रहा है।
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हजारों मुश्किलें सामने थी, लेकिन आजाद हिंद फौज के इस सूरमा ने हर मुश्किल का डटकर मुकाबला करते हुए देश के तिरंगे के लिए अपनी जिंदगी के कई वर्ष जेल में काट दिए। कर्म सिंह के पोते आंचल कहते हैं कि उन्होंने अपने दादा की जुबानी आजादी की लड़ाई की कई कहानियां सुनी हैं। बताया कि दादा कहा करते थे कि वे चार वर्ष तक जेल में रहे। उस समय घर में कोई खबर नहीं थी कि वह कहां हैं। घर वाले बेचैन थे, लेकिन चार वर्ष बाद लौटकर आए तो परिजनों ने खुद को संभाला। परिजनों के अनुसार कर्म सिंह बताया करते थे कि आजाद हिंद सेना ने सुभाष चंद बोस के नेतृत्व में वर्मा के रास्ते मणिपुर के मयरंग नामक स्थान पर अंग्रेज सेना पर हमला कर जीत का परचम लहराया था, उस समय वह वहां मौजूद थे। आंचल ने बताया कि उनके दादा उन्हें बताते थे कि 1942 में वे आजाद हिंद फौज में शामिल हुए थे। वहीं, उनकी गतिविधियों का केंद्र सिंगापुर था।
भब्बा गांव के कर्म सिंह को उनकी वीरता के लिए वर्ष 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से ताम्र पत्र से पुरस्कृत किया गया था। आज भी बिलासपुर जिले के इस सूरमा की आजाद हिंद फौज के दौरान अदम्य साहस के किस्से किताबों में दर्ज हैं। 30 जून 1922 में जन्मे कर्म सिंह का 31 जनवरी 2003 को निधन हो गया है, लेकिन परिवार आज भी गर्व से उनके साहस के किस्से लोगों को सुनाता है।
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उन चार सालों में परिजनों ने उनके जिंदा वापस लौटने की उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन वे अपनी सजा काट कर वापस आए और अपनी बाकी की जिंदगी बड़े सम्मान के साथ गुजारी।
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हम बात कर रहे हैं घुमारवीं उपमंडल के भब्बा गांव के स्वतंत्रता सेनानी कर्म सिंह की। भारत को आजाद करवाने के लिए आजाद हिंद सेना का जो ऐतिहासिक योगदान रहा है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। वहीं, आजाद हिंद फौज में बिलासपुर जिले के भब्बा गांव के कर्म सिंह का विशेष योगदान रहा है।
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हजारों मुश्किलें सामने थी, लेकिन आजाद हिंद फौज के इस सूरमा ने हर मुश्किल का डटकर मुकाबला करते हुए देश के तिरंगे के लिए अपनी जिंदगी के कई वर्ष जेल में काट दिए। कर्म सिंह के पोते आंचल कहते हैं कि उन्होंने अपने दादा की जुबानी आजादी की लड़ाई की कई कहानियां सुनी हैं। बताया कि दादा कहा करते थे कि वे चार वर्ष तक जेल में रहे। उस समय घर में कोई खबर नहीं थी कि वह कहां हैं। घर वाले बेचैन थे, लेकिन चार वर्ष बाद लौटकर आए तो परिजनों ने खुद को संभाला। परिजनों के अनुसार कर्म सिंह बताया करते थे कि आजाद हिंद सेना ने सुभाष चंद बोस के नेतृत्व में वर्मा के रास्ते मणिपुर के मयरंग नामक स्थान पर अंग्रेज सेना पर हमला कर जीत का परचम लहराया था, उस समय वह वहां मौजूद थे। आंचल ने बताया कि उनके दादा उन्हें बताते थे कि 1942 में वे आजाद हिंद फौज में शामिल हुए थे। वहीं, उनकी गतिविधियों का केंद्र सिंगापुर था।
भब्बा गांव के कर्म सिंह को उनकी वीरता के लिए वर्ष 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से ताम्र पत्र से पुरस्कृत किया गया था। आज भी बिलासपुर जिले के इस सूरमा की आजाद हिंद फौज के दौरान अदम्य साहस के किस्से किताबों में दर्ज हैं। 30 जून 1922 में जन्मे कर्म सिंह का 31 जनवरी 2003 को निधन हो गया है, लेकिन परिवार आज भी गर्व से उनके साहस के किस्से लोगों को सुनाता है।