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जीवन की महान सच्चाई मौत, इससे कोई नहीं बचा : हंसराज
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- श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में हवन के साथ हुआ श्रीमद्भागवत कथा समापन
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। बिलासपुर के श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का शनिवार को समापन हो गया। कथा के अंतिम दिन प्रवचनों की अमृत वर्षा करते हुए पंडित हंसराज शर्मा ने बताया कि जीवन की महान सच्चाई मौत है, कोई भी जीव इससे बच नहीं सका है।
उन्होंने कहा कि संसार में जो भी जीव आता है उसे संसार छोड़कर अवश्य जाना पड़ता है, आवागमन ही संसार की रीत है। उन्होंने कहा कि जिस काम के लिए जीव धरती पर आया है वह उस काम को करना ही भूल गया है। भगवान का स्मरण ही एक ऐसा उपाय उपाय है जिससे जीव मनुष्य प्रभु चरणों में बिना कष्ट के चला जाता है। मृत्यु सबके सिर पर सवार है। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि यह मौत सभी को अपने साथ लेकर जाएगी। उन्होंने कहा कि जीव 84 के चक्कर में उलझा रहता है। जिस प्रकार जीवन जिया जाता है, उसी प्रकार मृत्यु को सुधारना आवश्यक है। इसे सत्संग से और भगवान की शरण में जाकर ही सुधारा जा सकता है, ताकि जीवात्मा मुक्त होकर परमात्मा के चरणों को प्राप्त कर सके। इस दौरान उन्होंने कई रोचक प्रसंग सुनाए। कहा कि सुधरी हुई मौत अमरता के शिखर पर चढ़ने की सीढ़ी है। कथा के समापन पर पूर्णाहुति के बाद अटूट भंडारे का आयोजन किया गया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। बिलासपुर के श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का शनिवार को समापन हो गया। कथा के अंतिम दिन प्रवचनों की अमृत वर्षा करते हुए पंडित हंसराज शर्मा ने बताया कि जीवन की महान सच्चाई मौत है, कोई भी जीव इससे बच नहीं सका है।
उन्होंने कहा कि संसार में जो भी जीव आता है उसे संसार छोड़कर अवश्य जाना पड़ता है, आवागमन ही संसार की रीत है। उन्होंने कहा कि जिस काम के लिए जीव धरती पर आया है वह उस काम को करना ही भूल गया है। भगवान का स्मरण ही एक ऐसा उपाय उपाय है जिससे जीव मनुष्य प्रभु चरणों में बिना कष्ट के चला जाता है। मृत्यु सबके सिर पर सवार है। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि यह मौत सभी को अपने साथ लेकर जाएगी। उन्होंने कहा कि जीव 84 के चक्कर में उलझा रहता है। जिस प्रकार जीवन जिया जाता है, उसी प्रकार मृत्यु को सुधारना आवश्यक है। इसे सत्संग से और भगवान की शरण में जाकर ही सुधारा जा सकता है, ताकि जीवात्मा मुक्त होकर परमात्मा के चरणों को प्राप्त कर सके। इस दौरान उन्होंने कई रोचक प्रसंग सुनाए। कहा कि सुधरी हुई मौत अमरता के शिखर पर चढ़ने की सीढ़ी है। कथा के समापन पर पूर्णाहुति के बाद अटूट भंडारे का आयोजन किया गया।
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