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Bilaspur News: कथा में दिया धर्म और कर्तव्य का संदेश

Tue, 07 Apr 2026 11:55 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Tue, 07 Apr 2026 11:55 PM IST
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cultural news bilaspur
बिलासपुर। श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर परिसर में श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन भक्तजन आध्यात्मिक वातावरण में डूबे रहे। कथावाचक संदीपन वशिष्ठ ने धर्म, कर्तव्य और भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यता का जीवनोपयोगी संदेश दिया। बताया कि महाभारत के युद्ध में द्रौपदी को जब यह समाचार मिला कि उसके पांचों पुत्रों की हत्या अश्वत्थामा ने कर दी है, तो उसने आमरण अनशन करने का निश्चय किया। द्रौपदी ने कहा कि वह अनशन तभी तोड़ेगी जब अश्वत्थामा के मस्तक पर सदैव बनी रहने वाली मणि उसे प्राप्त होगी। इसके बाद अर्जुन अश्वत्थामा को पकड़ने के लिए निकल पड़े और दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। अश्वत्थामा ने पांडवों को जड़-मूल से नष्ट करने के लिए अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा पर ब्रह्मास्त्र का प्रहार किया। इस संकट के समय भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में प्रवेश कर उसे सुरक्षित किया। श्रीकृष्ण का वह ज्योतिर्मय सूक्ष्म रूप अंगूठे के आकार का था, जिसमें चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण थे, कानों में कुंडल और रक्तवर्ण आंखें थीं। हाथ में जलती हुई गदा लेकर उन्होंने गर्भ में बालक के चारों ओर घूमते हुए ब्रह्मास्त्र की अग्नि को शांत किया। दस माह पश्चात जब बालक का जन्म हुआ, तो जन्म लेते ही बालक मृत अवस्था में था। इसके बाद माताओं और परिवार में गहरी शोक की लहर दौड़ गई। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अमृतमयी दृष्टि से बालक को जीवित किया और उसे परीक्षित नाम दिया। इसका विशेष अर्थ है कि यह बालक कुरुकुल के नाश (परीक्षा) के समय उत्पन्न हुआ। कथावाचक ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि यदि मैंने कभी झूठ नहीं बोला, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया, युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई और अधर्म नहीं किया, तो यह बालक जीवित होगा। श्रीकृष्ण की कृपा से अभिमन्यु का यह बालक जीवित हुआ और उसकी प्रसूति के साथ ही मंदिर परिसर में भक्तों ने हर्षोल्लास में प्रसाद ग्रहण किया।
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