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Bilaspur News: संयुक्त भूमि पर निर्माण रोकने का आदेश अदालत ने किया रद्द, एडीजे ने सुनाया अहम फैसला
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कहा- सह-स्वामी को केवल संयुक्त मालिक होने के आधार पर नहीं रुक सकता निर्माण
अधिकारों के हनन का प्रथम दृष्टया साक्ष्य जरूरी
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। उपमंडल घुमारवीं के गालियां गांव में संयुक्त भूमि विवाद से जुड़े मामले में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, घुमारवीं की अदालत ने निचली अदालत के यथास्थिति (स्टेटस-क्वो) बनाए रखने के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सह-स्वामी होने के आधार पर किसी दूसरे सह-स्वामी को संयुक्त भूमि पर निर्माण कार्य करने से नहीं रोका जा सकता। इसके लिए यह प्रथम दृष्टया साबित होना आवश्यक है कि निर्माण कार्य से दूसरे पक्ष के अधिकारों का वास्तविक हनन हो रहा है या हिस्सेदारी से अधिक भूमि पर कब्जा किया जा रहा है।
वादी ने सिविल अदालत में वाद दायर कर आरोप लगाया था कि प्रतिवादी बिना राजस्व विभाग से बंटवारा कराए संयुक्त भूमि पर खोदाई और निर्माण कर रहे हैं। उनका तर्क था कि भूमि संयुक्त होने के कारण किसी भी सह-स्वामी को एकतरफा निर्माण का अधिकार नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने स्थायी निषेधाज्ञा के साथ अंतरिम राहत की मांग की थी। निचली अदालत ने दोनों पक्षों को भूमि की प्रकृति, कब्जे और निर्माण की स्थिति यथावत बनाए रखने के निर्देश दिए थे, जिसे अपील में चुनौती दी गई।
सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि सभी पक्ष वर्षों से अपने-अपने हिस्सों पर अलग-अलग कब्जे में हैं और निर्माण उसी हिस्से में किया जा रहा है। अदालत ने रिकॉर्ड और दलीलों पर विचार करते हुए पाया कि भूमि भले ही राजस्व अभिलेखों में संयुक्त दर्ज है, लेकिन अपीलकर्ताओं की भी उसमें पर्याप्त हिस्सेदारी है। अदालत ने कहा कि वादी ऐसा कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि निर्माण कार्य से उसकी कानूनी हिस्सेदारी या भूमि की उपयोगिता प्रभावित हो रही है।
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हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि निर्माण से किसी सह-स्वामी के अधिकारों को वास्तविक क्षति नहीं पहुंचती, तो केवल संयुक्त स्वामित्व के आधार पर निर्माण पर रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने यह भी माना कि वादी स्वयं पहले से संयुक्त भूमि पर निर्माण कर चुका है। इसी आधार पर अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने स्टेटस-क्वो का आदेश निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि मुख्य सिविल वाद का अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से करेगा।
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अधिकारों के हनन का प्रथम दृष्टया साक्ष्य जरूरी
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। उपमंडल घुमारवीं के गालियां गांव में संयुक्त भूमि विवाद से जुड़े मामले में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, घुमारवीं की अदालत ने निचली अदालत के यथास्थिति (स्टेटस-क्वो) बनाए रखने के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सह-स्वामी होने के आधार पर किसी दूसरे सह-स्वामी को संयुक्त भूमि पर निर्माण कार्य करने से नहीं रोका जा सकता। इसके लिए यह प्रथम दृष्टया साबित होना आवश्यक है कि निर्माण कार्य से दूसरे पक्ष के अधिकारों का वास्तविक हनन हो रहा है या हिस्सेदारी से अधिक भूमि पर कब्जा किया जा रहा है।
वादी ने सिविल अदालत में वाद दायर कर आरोप लगाया था कि प्रतिवादी बिना राजस्व विभाग से बंटवारा कराए संयुक्त भूमि पर खोदाई और निर्माण कर रहे हैं। उनका तर्क था कि भूमि संयुक्त होने के कारण किसी भी सह-स्वामी को एकतरफा निर्माण का अधिकार नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने स्थायी निषेधाज्ञा के साथ अंतरिम राहत की मांग की थी। निचली अदालत ने दोनों पक्षों को भूमि की प्रकृति, कब्जे और निर्माण की स्थिति यथावत बनाए रखने के निर्देश दिए थे, जिसे अपील में चुनौती दी गई।
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सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि सभी पक्ष वर्षों से अपने-अपने हिस्सों पर अलग-अलग कब्जे में हैं और निर्माण उसी हिस्से में किया जा रहा है। अदालत ने रिकॉर्ड और दलीलों पर विचार करते हुए पाया कि भूमि भले ही राजस्व अभिलेखों में संयुक्त दर्ज है, लेकिन अपीलकर्ताओं की भी उसमें पर्याप्त हिस्सेदारी है। अदालत ने कहा कि वादी ऐसा कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि निर्माण कार्य से उसकी कानूनी हिस्सेदारी या भूमि की उपयोगिता प्रभावित हो रही है।
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हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि निर्माण से किसी सह-स्वामी के अधिकारों को वास्तविक क्षति नहीं पहुंचती, तो केवल संयुक्त स्वामित्व के आधार पर निर्माण पर रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने यह भी माना कि वादी स्वयं पहले से संयुक्त भूमि पर निर्माण कर चुका है। इसी आधार पर अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने स्टेटस-क्वो का आदेश निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि मुख्य सिविल वाद का अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से करेगा।