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Bilaspur News: बिना पंजीकृत अदला-बदली दस्तावेज पर भूमि के स्वामित्व का दावा नहीं माना

Wed, 18 Feb 2026 10:28 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Wed, 18 Feb 2026 10:28 PM IST
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Claim of ownership of land on unregistered exchange document not accepted
अदालत से
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0-16 बीघा भूमि विवाद में निचली अदालत की डिक्री रद्द
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश घुमारवीं ने दोनों सिविल अपीलें स्वीकार की

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। घुमारवीं स्थित अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत ने झंडूता उपमंडल के एक गांव में भूमि स्वामित्व को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के निर्णय और डिक्री को निरस्त कर दिया। अदालत ने वर्ष 2022 में सिविल जज द्वारा पारित फैसले को कानून की दृष्टि से अस्थिर मानते हुए दोनों सिविल अपीलों को स्वीकार कर लिया और अपीलकर्ता के पक्ष में राहत प्रदान की।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया गया, प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों की अनदेखी की गई, जिसके कारण पारित निर्णय टिकाऊ नहीं है। मामले के अनुसार विवादित भूमि खसरा नंबर 218 मिन, खेवट नंबर 52 मिन, खतौनी नंबर 108 मिन, रकबा 0-16 बीघा, स्थित गांव बरठीं, परगना सुन्हाणी, तहसील झंडूता बताई गई। एक पक्ष ने उक्त भूमि पर अपना स्वामित्व व कब्जा होने का दावा करते हुए दूसरे पक्ष पर हस्तक्षेप करने और कब्जा करने की कोशिश के आरोप लगाए थे। दूसरी ओर प्रतिवादी पक्ष का कहना था कि वर्ष 1985 में जमीन की अदला-बदली (एक्सचेंज) हुई थी और उसी आधार पर भूमि के करीब 0-1 बीघा हिस्से पर उनका अधिकार बनता है। एक पक्ष ने स्थायी निषेधाज्ञा (परमानेंट इंजंक्शन) का मुकदमा दायर किया था, जबकि दूसरे पक्ष ने कथित एक्सचेंज डीड के आधार पर भूमि के लगभग 0-1 बीघा हिस्से का स्वामित्व घोषित करने तथा हस्तक्षेप रोकने की मांग करते हुए अलग सिविल सूट दाखिल किया था। बाद में दोनों मुकदमों को एक साथ सुनवाई के लिए क्लब कर दिया गया। सिविल जज अदालत ने एक मुकदमा खारिज करते हुए दूसरे पक्ष के दावे को स्वीकार कर लिया था। भूमि के करीब 0-1 बीघा हिस्से पर स्वामित्व घोषित करते हुए स्थायी निषेधाज्ञा प्रदान की थी। इसी निर्णय को अपील में चुनौती दी गई थी। अपील अदालत ने पाया कि जिस एक्सचेंज डीड पर दावा आधारित था, वह मूल दस्तावेज नहीं बल्कि कार्बन कॉपी थी। अदालत ने यह भी गौर किया कि जिस स्टांप पेपर पर दस्तावेज लिखा बताया गया, उसकी जारी होने की तारीख कथित निष्पादन तिथि से बाद की थी, जिससे दस्तावेज की प्रामाणिकता पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि 100 रुपये से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति के लेन-देन के लिए कानून के अनुसार पंजीकृत दस्तावेज आवश्यक होता है। चूंकि कथित एक्सचेंज डीड पंजीकृत नहीं थी, इसलिए उसे स्वामित्व का वैध प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि जिस व्यक्ति के नाम पर स्वामित्व का दावा किया गया, वह स्वयं गवाही के लिए अदालत में उपस्थित नहीं हुआ, जिससे उसके दावे पर प्रतिकूल अनुमान बनता है। साथ ही राजस्व रिकॉर्ड में भी भूमि स्वामित्व में कोई परिवर्तन दर्ज नहीं पाया गया। कहा कि उपलब्ध जमाबंदी रिकॉर्ड के अनुसार भूमि का मालिक और कब्जाधारी अपीलकर्ता ही दर्ज था। ऐसे में उसे अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए मुकदमा दायर करने का पूरा अधिकार था। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और कानून के प्रावधानों की अनदेखी की। इसी आधार पर दोनों अपीलें स्वीकार करते हुए निचली अदालत का फैसला और डिक्री रद्द कर दी गई तथा अपीलकर्ता के पक्ष में राहत प्रदान की गई।
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