फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Yamuna Nagar News ›   try to decrease in area, farmer in not satisfiled

रकबा कम करने के हो रहे सरकारी प्रयास, किसानों को नहीं आ रहे रास

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 18 Jun 2021 02:09 AM IST
विज्ञापन
try to decrease in area, farmer in not satisfiled
प्रदेश सरकार ने धान की खेती को कम करने के लिए हरियाणा राज्य अधोभूमि जल संरक्षण अधिनियम बेशक लागू कर दिया है, लेकिन प्रदेश में धान का रकबा कम करना किसी चुनौती से कम नहीं है। वहीं मेरा पानी-मेरी विरासत योजना के अंतर्गत धान छोड़कर अन्य खेती करने वाले किसानों को 7 हजार रुपये प्रोत्साहन राशि भी दी जाएगी। इसके बावजूद यमुनानगर में धान का रकबा कम नहीं हो रहा है।
विज्ञापन

आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच साल की बात करें तो साल दर साल धान का रकबा कम होने की बजाय बढ़ रहा है। साल 2020-21 में जहां 87.6 हजार हेक्टेयर में धान लगाया गया था। वहीं इस बार इसमें 10 हजार हेक्टेयर की कमी यानि करीब 77 हजार हेक्टेयर में धान लगाने का लक्ष्य रखा गया है। जबकि जिले के किसान धान की खेती छोड़कर दूसरे फसल अपनाने को तैयार नहीं हैं। किसानों का कहना है कि अन्य फसलों की बिक्री में दिक्कत आती है और भाव भी पूरा नहीं मिलता।
विज्ञापन

बॉक्स
जिले में धान का एरिया
साल धान का एरिया
1999-2000 55 हजार हेक्टेयर
2012-13 70 हजार हेक्टेयर
2015-16 64 हजार हेक्टेयर
2018-19 78 हजार हेक्टेयर
2019-20 84.5 हजार हेक्टेयर
2020-21 87.6 हजार हेक्टेयर
2021-22 का लक्ष्य 77 हजार हेक्टेयर
बॉक्स
श्रमिकों का टोटा, खुद पौध लगा रहे किसान
-कोरोना संक्रमण और लॉक डाउन के चलते दो सीजन से किसानों को श्रमिक नहीं मिल रहे। ऐसे में अब किसान परिवार के सदस्यों समेत धान की पौध लगा रहे हैं। किसान विक्रम, संजू, शिव कुमार, नरसिंह, रामबीर, मंदीप आदि का कहना है कि लोकल श्रमिकों से काम नहीं चलता। पिछली बार भी परिवार के लोगों ने ही कई एकड़ में पौध लगाई थी। इस बार भी कुछ लोकल श्रमिकों के साथ परिवार के सदस्य धान लगा रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

कोट्स
-रादौर के किसान सुक्खा का कहना है कि अगर किसानों का दाल, मक्का और दूसरी फसल एमएसपी पर बिके तो किसान धान की खेती करना छोड़ सकता है। सरकार ने पिछले वर्ष किसानों को प्रोत्साहन राशि देने का वादा किया था, वह अब तक नहीं मिला है और मक्का की खेती करने वाले किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिला। 800-900 प्रति क्विंटल मक्का पिछले साल बिका था, जिससे किसानों को नुकसान हुआ है। मैं पांच एकड़ में टमाटर भी उगाता हूं, लेकिन किसानों को भावांतर का लाभ नहीं मिला रहा।
-राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित किसान धर्मबीर कांबोज का कहना है कि निसंदेह दहलन व औषधीय पौधों की खेती फायदेमंद होती है, लेकिन इस तरह की फसलों को बेचने में कठिनाई आती है। वहीं धान को सरकार एमएसपी पर खरीदती है और किसानों को फसल बिकने की गारंटी होती है, इसलिए किसानों का रुझान गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों की तरफ ज्यादा रहता है।
फतेहगढ़ के किसान सोमनाथ का कहना है कि मक्का को सरकार 1850 रुपये एमएसपी पर खरीदने की बात कहती है, लेकिन हकीकत इससे दूर है। पिछले साल मक्का 800-900 रुपये के बीच बिका था। धान को खुले मार्केट में बेचने का विकल्प होता है, लेकिन मक्का तो बहुत मुश्किल से बिकता है।
-भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष व धान उत्पादक किसान सुभाष गुर्जर का कहना है कि धान की खेती मजबूरी है। दूसरी फसलों से किसानों को फायदा नहीं होता है, अगर धान नहीं लगाएंगे तो किसानों को भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। पानी किसान की प्राथमिकता है, लेकिन सरकारी नीति की दिशा सही नहीं है। जल संकट के लिए केवल धान की फसल जिम्मेदार नहीं है।

वर्जन
-किसानों को मेरा पानी मेरी विरासत योजना के तहत प्रोत्साहन राशि को लेकर जागरूक किया जा रहा है। इसके लिए प्रत्येक ब्लॉक में दो-दो टीमें उतारी गई हैं, जो किसानों को अन्य फसलों के बारे में जानकारी दे रही हैं। उम्मीद है इस बार निर्धारित लक्ष्य को पूरा किया जाएगा ताकि जल स्तर को ऊंचा उठाया जाए। -डॉ. जसविंदर सिंह, कृषि उप निदेशक
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed