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Yamuna Nagar News: इस बार 75 फीट ऊंचे दशानन के पुतला का होगा दहन
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यमुनानगर। मॉडल टाउन के दशहरा ग्राउंड में इस बार विजयदशमी पर 75 फीट ऊंचा दशानन का पुतले का दहन किया जाएगा। जो गत वर्ष से पांच फीट अधिक ऊंचा रहेगा। दशहरा ग्राउंड में दहन के लिए दशानन सहित मेघनाथ व कुंभकरण के पुतले मॉडल टाउन के श्री सनातन धर्म मंदिर में तैयार हो रहे हैं, जिन्हें मंदिर सभा की ओर से मॉडल कॉलोनी के मनचंदा परिवार द्वारा बनवाया जा रहा हैं। बता दें कि मनचंदा परिवार की यह तीसरी पीढ़ी है, जो रावण, मेघनाथ व कुंभकरण के पुतले तैयार कर रही है। परिवार की लगातार तीसरी पीढ़ी पूर्वजों से मिली पुतले बनाने की कला को बरकरार रखे हुए हैं। परिवार के महेंद्र मनचंदा, उनके बेटे पंकज मनचंदा इस बार 75 फीट के दशानन व 65-65 फीट के मेघनाद व कुंभकरण के पुतले तैयार कर रहे हैं। जिनका इस बार विजय दशमी पर 24 अक्तूबर को दशहरा ग्राउंड में दहन होगा। तीनों ही पुतले गत वर्षों से पांच फीट ऊंचे बनाए जा रहे हैं।
विरासत में मिली कला को आगे बढ़ाने का प्रयास
मनचंदा परिवार के पूर्वज पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में विजयदशमी के मौके पर पुतले बनाने का कार्य करते थे। इसी परिवार से मॉडल कॉलोनी निवासी महेंद्र कुमार मनचंदा ने बताया कि वह 40 वर्षों रावण का पुतला बनाते आ रहे हैं। उनके चाचा विश्वनाथ पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में पुतले बनाने का ही कार्य करते थे। उनको यह कला विरासत में मिली। अब वे स्वयं, उनके बेटे पंकज मनचंदा और भतीजा इस कला बरकरार रखने का प्रयास कर रहे हैं। यह उनकी तीसरी पीढ़ी है, जो लगातार विजयदशमी के अवसर पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बना रही है। महेंद्र कुमार मनचंदा ने बताया कि वर्ष-2006 में विजयदशमी पर विदेशी पर्यटक भी उनकी इस कलाकृति को देखने के लिए आए थे। तब विदेशी पर्यटकों ने उनकी कला को सराहा और पुतलाें को बनाने की विधि को जाना। आज भी उनको हर वर्ष आसपास के जिलों से सहित दूसरे प्रदेशाें से भी पुतले बनाने की पेशकश आती है, लेकिन वे भारी-भरकम पेशकश से समझौता कभी नहीं करेंगे। उनकी केवल यही ख्वाहिश है कि इस कला को जीवित रख अगली पीढ़ी को इसे सुरक्षित सौंप दिया जाए।
विरासत में मिली कला को आगे बढ़ाने का प्रयास
मनचंदा परिवार के पूर्वज पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में विजयदशमी के मौके पर पुतले बनाने का कार्य करते थे। इसी परिवार से मॉडल कॉलोनी निवासी महेंद्र कुमार मनचंदा ने बताया कि वह 40 वर्षों रावण का पुतला बनाते आ रहे हैं। उनके चाचा विश्वनाथ पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में पुतले बनाने का ही कार्य करते थे। उनको यह कला विरासत में मिली। अब वे स्वयं, उनके बेटे पंकज मनचंदा और भतीजा इस कला बरकरार रखने का प्रयास कर रहे हैं। यह उनकी तीसरी पीढ़ी है, जो लगातार विजयदशमी के अवसर पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बना रही है। महेंद्र कुमार मनचंदा ने बताया कि वर्ष-2006 में विजयदशमी पर विदेशी पर्यटक भी उनकी इस कलाकृति को देखने के लिए आए थे। तब विदेशी पर्यटकों ने उनकी कला को सराहा और पुतलाें को बनाने की विधि को जाना। आज भी उनको हर वर्ष आसपास के जिलों से सहित दूसरे प्रदेशाें से भी पुतले बनाने की पेशकश आती है, लेकिन वे भारी-भरकम पेशकश से समझौता कभी नहीं करेंगे। उनकी केवल यही ख्वाहिश है कि इस कला को जीवित रख अगली पीढ़ी को इसे सुरक्षित सौंप दिया जाए।
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