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Yamuna Nagar News: सत्संग में समझाया मानव जीवन में कृपा का महत्व
Mon, 27 Oct 2025 12:56 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 27 Oct 2025 12:56 AM IST
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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में सत्संग सुनते श्रद्धालु। आयोजक
- फोटो : mathura
संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में साप्ताहिक सत्संग हुआ। साध्वी सिद्धेश्वरी भारती ने प्रमानव जीवन में कृपा का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मानव जीवन परमात्मा की कृपा का साक्षात प्रमाण है। प्रत्येक जीवात्मा को मानव तन की प्राप्ति नहीं होती। मानव तन की प्राप्ति होना जीवात्मा के कल्याण का प्रथम चरण है।
उन्होंने कहा कि पूर्ण गुरु की शरण में जाकर उनसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर लेना जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए दूसरा चरण है। किंतु पूर्ण कल्याण हेतु तीसरे चरण के लिए जीवात्मा को स्वयं पर कृपा करनी पड़ती है। जब तक जीव स्वयं पर कृपा न करे तब तक गुरु की कृपा भी जीवन का कल्याण करने में असमर्थ होती है, चूंकि मानव तन प्राप्त करके भी मनुष्य क्षुद्र वासनाओं , नश्वर संसार की आसक्ति और जीवन में दुखद परिस्थितियों से जूझता रहता है।
दुर्गति जीवन की नियति है किंतु गुरु अपनी कृपा से जीव की सद्गति करने में समर्थ होते हैं। किंतु जब शिष्य पुरुषार्थ करता है तभी वह गुरु की कृपा प्राप्त कर पाता है। गुरु अपनी कृपा से जीवात्मा के पुण्य पुंज के फल स्वरूप उसे ब्रह्मज्ञान देकर जीवन के परम लक्ष्य के बारे में बताते हैं, लेकिन जीवात्मा जन्म मरण के चक्रव्यूह से तभी मुक्त हो सकती है।
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उन्होंने बताया कि जब वह पूर्ण निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास से भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपने मन वचन कर्म को गुरु के महान एवं दिव्य आदर्शों में ढाले और साधना के द्वारा अपने सभी कलुषित विचारों एवं मन के विकारों का त्याग कर दें। अन्यथा मानव तन और पूर्ण गुरू जीवन में होने पर भी हमारा कल्याण नहीं हो सकता। परंतु जब अंतरात्मा में ब्रह्म ज्ञान की ज्योति प्रकट होती है तब सब कुछ साफ़ एवं स्पष्ट दिखाई देता है। जिससे भ्रम नहीं उपजता और बुद्धि सही निर्णय ले पाती है।
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जगाधरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में साप्ताहिक सत्संग हुआ। साध्वी सिद्धेश्वरी भारती ने प्रमानव जीवन में कृपा का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मानव जीवन परमात्मा की कृपा का साक्षात प्रमाण है। प्रत्येक जीवात्मा को मानव तन की प्राप्ति नहीं होती। मानव तन की प्राप्ति होना जीवात्मा के कल्याण का प्रथम चरण है।
उन्होंने कहा कि पूर्ण गुरु की शरण में जाकर उनसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर लेना जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए दूसरा चरण है। किंतु पूर्ण कल्याण हेतु तीसरे चरण के लिए जीवात्मा को स्वयं पर कृपा करनी पड़ती है। जब तक जीव स्वयं पर कृपा न करे तब तक गुरु की कृपा भी जीवन का कल्याण करने में असमर्थ होती है, चूंकि मानव तन प्राप्त करके भी मनुष्य क्षुद्र वासनाओं , नश्वर संसार की आसक्ति और जीवन में दुखद परिस्थितियों से जूझता रहता है।
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दुर्गति जीवन की नियति है किंतु गुरु अपनी कृपा से जीव की सद्गति करने में समर्थ होते हैं। किंतु जब शिष्य पुरुषार्थ करता है तभी वह गुरु की कृपा प्राप्त कर पाता है। गुरु अपनी कृपा से जीवात्मा के पुण्य पुंज के फल स्वरूप उसे ब्रह्मज्ञान देकर जीवन के परम लक्ष्य के बारे में बताते हैं, लेकिन जीवात्मा जन्म मरण के चक्रव्यूह से तभी मुक्त हो सकती है।
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उन्होंने बताया कि जब वह पूर्ण निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास से भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ते हुए अपने मन वचन कर्म को गुरु के महान एवं दिव्य आदर्शों में ढाले और साधना के द्वारा अपने सभी कलुषित विचारों एवं मन के विकारों का त्याग कर दें। अन्यथा मानव तन और पूर्ण गुरू जीवन में होने पर भी हमारा कल्याण नहीं हो सकता। परंतु जब अंतरात्मा में ब्रह्म ज्ञान की ज्योति प्रकट होती है तब सब कुछ साफ़ एवं स्पष्ट दिखाई देता है। जिससे भ्रम नहीं उपजता और बुद्धि सही निर्णय ले पाती है।

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में सत्संग सुनते श्रद्धालु। आयोजक- फोटो : mathura