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Yamuna Nagar News: श्रद्धालुओं को बताया गुरु की सेवा के महत्व
Mon, 08 Dec 2025 01:03 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 08 Dec 2025 01:03 AM IST
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साप्ताहिक सत्संग के दौरान उपस्थित महिला श्रद्धालु। आयोजक
संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में साध्वी नीलम भारती ने एक शिष्य के जीवन में गुरु की सेवा के महत्व को समझाते हुए कहा कि जब एक साधारण सा दिखने वाला मनुष्य गुरु की शरणागति होकर शिष्य की उपाधि को प्राप्त करता है तो वह साधारण नहीं रहता। संपूर्ण प्रकृति उसके चरणों में नतमस्तक होती है जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड के विधाता के चरणों में नतमस्तक हो जाता है। जो शिष्य निरंतर गुरु आज्ञा में चलते हुए अपने आपको गुरु की अभिव्यक्ति बना लेता है वह देवतुल्य होकर इस धरा पर विचरण करता है।
साध्वी ने कहा कि जब शिष्य ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करके ध्यान साधना के द्वारा अपने आपको तप, त्याग और तितिक्षा की अग्नि में तपाकर कुंदन बना लेता है तब वह जन्म मरण के चक्रव्यूह से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। आगे साध्वी जी ने विस्तारपूर्वक समझाते हुए कहा कि सत्संग शिष्य को भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करता है, सुमिरन उसे सदा अपने शिष्यत्व की याद दिलाते रहने के लिए आवश्यक है लेकिन गुरुसेवा वह अचूक विधि है जो कम समय में शिष्य को अधिक आध्यात्मिक लाभ प्रदान करती है क्योंकि गुरु सेवा सबसे पहले हमें अहंकार मुक्त कर हृदय में नम्रता और व्यवहार में भरती है। गुरु सेवा कोई व्यक्ति विशेष की सेवा नहीं है।
साध्वी ने कहा कि आत्मिक उत्थान और सामाजिक कल्याण हेतु किया गया पुरुषार्थ ही सच्ची गुरुसेवा है। निस्वार्थ भाव से जनकल्याण एवं धर्म के प्रचार प्रसार हेतु किया गया पुरुषार्थ शिष्य को पूर्वजन्म के कर्म संस्कारों से मुक्त करता है। जिन कार्यों को करने में हमारे पास बंधन हो उसे कर्म नहीं कहा जाता ,वे तो हमारे कर्तव्य हैं किंतु जहाँ बंधन नहीं होता वह हमारा कर्म है।
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जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में साध्वी नीलम भारती ने एक शिष्य के जीवन में गुरु की सेवा के महत्व को समझाते हुए कहा कि जब एक साधारण सा दिखने वाला मनुष्य गुरु की शरणागति होकर शिष्य की उपाधि को प्राप्त करता है तो वह साधारण नहीं रहता। संपूर्ण प्रकृति उसके चरणों में नतमस्तक होती है जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड के विधाता के चरणों में नतमस्तक हो जाता है। जो शिष्य निरंतर गुरु आज्ञा में चलते हुए अपने आपको गुरु की अभिव्यक्ति बना लेता है वह देवतुल्य होकर इस धरा पर विचरण करता है।
साध्वी ने कहा कि जब शिष्य ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करके ध्यान साधना के द्वारा अपने आपको तप, त्याग और तितिक्षा की अग्नि में तपाकर कुंदन बना लेता है तब वह जन्म मरण के चक्रव्यूह से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। आगे साध्वी जी ने विस्तारपूर्वक समझाते हुए कहा कि सत्संग शिष्य को भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करता है, सुमिरन उसे सदा अपने शिष्यत्व की याद दिलाते रहने के लिए आवश्यक है लेकिन गुरुसेवा वह अचूक विधि है जो कम समय में शिष्य को अधिक आध्यात्मिक लाभ प्रदान करती है क्योंकि गुरु सेवा सबसे पहले हमें अहंकार मुक्त कर हृदय में नम्रता और व्यवहार में भरती है। गुरु सेवा कोई व्यक्ति विशेष की सेवा नहीं है।
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साध्वी ने कहा कि आत्मिक उत्थान और सामाजिक कल्याण हेतु किया गया पुरुषार्थ ही सच्ची गुरुसेवा है। निस्वार्थ भाव से जनकल्याण एवं धर्म के प्रचार प्रसार हेतु किया गया पुरुषार्थ शिष्य को पूर्वजन्म के कर्म संस्कारों से मुक्त करता है। जिन कार्यों को करने में हमारे पास बंधन हो उसे कर्म नहीं कहा जाता ,वे तो हमारे कर्तव्य हैं किंतु जहाँ बंधन नहीं होता वह हमारा कर्म है।

साप्ताहिक सत्संग के दौरान उपस्थित महिला श्रद्धालु। आयोजक
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