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निशक्तता को पीछे छोड़ नरेंद्र ने मजबूत इरादों से पाया मुकाम

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 18 Jul 2022 01:54 AM IST
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Narendra achieved the position with strong intentions leaving behind the disability
Narendra achieved the position with strong intentions leaving behind the disability - फोटो : Yamuna Nagar
यमुनानगर। पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है....इन पंक्तियां को गांव खेड़ीलक्खा सिंह के 32 वर्षीय नरेंद्र अरोड़ा सच कर रहे हैं। दोनों पैर बचपन से बेजान हैं, बावजूद इसके नरेंद्र हौसलों के पंखों पर एक के बाद एक अपने सपनों की उड़ान भर रहे हैं।
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शत-प्रतिशत दिव्यांग होकर भी न सिर्फ खुद बीए, एमए, जेबीटी की पढ़ाई की बल्कि सरकारी टीचर बनकर पिछले पांच वर्षों से बच्चों को भी पढ़ा रहे हैं। इस मुकाम पर पहुंचने पर भी नरेंद्र बीएड कर शिक्षा विभाग में अधिकारी लगने का सपना संजो रहे हैं। शारीरिक अक्षमता के बाद भी नरेंद्र का जज्बा देख न सिर्फ परिवार बल्कि दोस्त व गांव के लोग मिसाल बता रहे हैं।
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स्कूल में बच्चों ने मुझे खुद से अलग समझा, पर मैंने नहीं
नरेंद्र ने बताया कि एक साल का था तो पोलियो का टीका लगा। बुखार हुआ तो परिवार के लोग घबरा गए और निजी अस्पताल ले गए। जहां स्टाफ ने कोई टीका लगाया। तब से दोनों टांगे व पैरे बेजान पड़ गए। चलफिर नहीं सकता था, इसलिए पढ़ाई देरी से शुरू हुई। आठ वर्ष की उम्र में गांव हड़तान के राजकीय प्राथमिक स्कूल में दाखिला मिला। जहां माता या पिता उसे दीवार के सहारे बैठा आते थे फिर वापस ले जाते थे। यहां से 5वीं कर अंटावा के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई हुई। स्कूल में दूसरे बच्चों ने उसे अपने से अलग जरूर समझा, पर उसने कभी खुद को सामान्य बच्चों से अलग नहीं माना।
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पढ़ाई में गैप आया तो कंप्यूूटर सिखा पढ़ाया फिर बना जेबीटी
कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से वर्ष-2004 तक डिस्टेंस से बीए की। आगे पढ़ाई का मन नहीं हुआ, जिससे बीच के गैप में वर्ष-2007 में पहले कंप्यूटर कोर्स किया फिर गांव के कंप्यूटर सेंटर पर पढ़ाने लगा। वर्ष-2009 में एंट्रेंस एग्जाम क्वालीफाई कर वर्ष-2011 तक हाफिजपुर के कॉलेज में जेबीटी की। साथ ही वर्ष-2011 में एचटेट भी क्वालीफाई किया। वर्ष-2012 में शिक्षा विभाग में 9890 जेबीटी पदों पर भर्ती निकली। इसमें आवेदन कर टेस्ट दिया और क्वालीफाई लिस्ट में नाम आ गया। वर्ष-2017 में सागड़ी के राजकीय प्राथमिक स्कूल में जेबीटी लगा। जहां पांच वर्षों से पढ़ा रहा हूं। इसके साथ बीएड व आगे पढ़ाई जारी रख शिक्षा विभाग में ही बड़े अफसर बनने का सपना है।

परिवार से लेकर दोस्त व स्कूली बच्चों का मिला सहयोग
नरेंद्र ने बताया कि पिता अशोक कुमार ने साइकिल पर घर-घर सामान बेच उसे पढ़ाया। माता वीना ने भी घर के कामकाज के बीच उसके घर व स्कूल के कामों पर पूरा ध्यान दिया। भाई दीपक, संदीप व बहन सुमन ने कभी उसे अपने से अलग नहीं समझा और पढ़ाई से लेकर खेल में साथ रखा। उसे हासिल मुकाम में परिवार के साथ-साथ जेबीटी करने वाले दोस्त जसमेर सिंह का बड़ा सहयोग रहा। नरेंद्र ने बताया कि सागड़ी स्कूल एक किमी. दूर है, जहां वे स्कूटी पर जाते हैं। स्कूल में व्हीलचेयर हैं, जिसे स्कूल पहुंचते ही बच्चे ले आते हैं। छुट्टी होने पर भी बच्चे स्कूटी तक व्हीलचेयर पर छोड़ आते हैं। ब्लैक बोर्ड पर लिखने से लेकर स्कूल के अन्य कामों में बच्चे मदद करते हैं। अब जल्द निशुल्क कंप्यूटर शिक्षा भी शुरू करने वाले हैं।
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