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Yamuna Nagar News: 15 साल की खींचतान के बाद विधवा को न्याय, एचएसवीपी को एनओसी व मुआवजा देने के आदेश

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 08 Apr 2026 02:03 AM IST
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Justice for Widow After 15 Years of Struggle: Court Orders HSVLP to Issue NOC and Pay Compensation
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग यमुनानगर। आर्काइव - फोटो : संगठन
यमुनानगर। करीब 15 साल तक प्रशासनिक उलझनों और मानसिक उत्पीड़न झेलने के बाद आखिरकार 72 वर्षीय विधवा किरण शर्मा को न्याय मिल गया। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) को कड़ी फटकार लगाते हुए सेवा में घोर लापरवाही का दोषी ठहराया है और पीड़िता को राहत देने के आदेश जारी किए हैं। आयोग ने एचएसवीपी को निर्देश दिए हैं कि वह 45 दिनों के भीतर सेक्टर-18 जगाधरी स्थित प्लॉट नंबर 172 के संबंध में एनओसी जारी करे साथ ही 22 हजार रुपये मुआवजा भी अदा किया जाए, जो मानसिक उत्पीड़न और मुकदमेबाजी के खर्च को ध्यान में रखकर तय किया गया है। समय सीमा में भुगतान न करने पर नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
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मामले के अनुसार, किरण शर्मा के पति स्वर्गीय डाॅ. सत्यवीर मलिक को वर्ष 1996 में उक्त प्लॉट आवंटित हुआ था। वर्ष 2000 में उनके निधन के बाद यह प्लॉट 2001 में विधिवत रूप से उनकी पत्नी के नाम ट्रांसफर कर दिया गया। वर्षों तक सब कुछ सामान्य रहा लेकिन वर्ष 2015 में एचएसवीपी ने अचानक कारण बताओ नोटिस जारी किया तो उनकी मुश्किलें बढ़नी शुरू हो गई। विभाग ने आरोप लगाया कि डाॅ. सत्यवीर मलिक ने करनाल और हिसार में भी प्लॉट लिए थे, जो नियमों का उल्लंघन है। इसी आधार पर प्लॉट की आईडी ब्लॉक कर दी गई और एनओसी जारी करने से इनकार कर दिया गया। इतना ही नहीं, बिना पर्याप्त जांच के मृतक के खिलाफ केस भी दर्ज करा दिया गया।
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सुनवाई के दौरान आयोग के सामने यह तथ्य सामने आया कि विभाग के आरोप पूरी तरह गलत थे। करनाल में जिस प्लॉट का जिक्र किया गया, वह किसी अन्य व्यक्ति के नाम था, जबकि हिसार में प्लॉट का आवंटन वर्ष 2009 में हुआ था, उस समय तक डाॅ. मलिक का निधन हो चुका था। आयोग के सहायक रजिस्ट्रार नीरज वालिया ने कहा कि एचएसवीपी ने अपनी ही 2016 की जांच में गलती स्वीकार कर ली थी, फिर भी शिकायतकर्ता को राहत नहीं दी गई। आयोग ने इसे गैर-जिम्मेदाराना और उत्पीड़नपूर्ण रवैया करार दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि सरकारी विभागों को किसी भी कार्रवाई से पहले तथ्यों की गहन जांच करनी चाहिए। इस फैसले को उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में अहम माना जा रहा है।
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