शहरीकरण और आतिशबाजी से शहर से गायब हो रही गौरया
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जगाधरी के विशाल नगर निवासी मोहम्मद नईम के घर में 1992 से गौरया मौजूद हैं। इनके आंगन में लगी बेल में गौरया दिन भर चहचहाती रहती हैं। इन गौरया को नईम प्रतिदिन बाजरा व रोटी खिलाते हैं। मोहम्मद नईम ने बताया कि वर्ष 1994 से वह प्रतिदिन अपने आंगन में गौरया के लिए दाना और पानी रख रहे हैं। जब वह घर में नहीं होते हैं तो परिवार के अन्य सदस्य यह जिम्मेदारी उठाते हैं।
नईम प्रतिदिन तीन वक्त गौरया को दाना डालतेे हैं। नईम बताते है कि अल सुबह ही गौरया उनके आंगन में चहचहाना शुरू कर देती हैं। ऐसा लगता है कि मानो वे दाना मांग रही हो। सुबह खा-पीकर गौरया चली जाती है और दोपहर को बेल पर आकर बैठ जाती है। नईम के आंगन में दाना डालते ही गौरया नीचे उतरकर दाना चुगने लगती हैं। इसी प्रकार शाम को नईम फिर दाना डालते हैं। नईम के घर के नजदीक बंद पड़े पुराने कच्चे मकान में गौरया ने अपने घोंसले बनाए हैं।
बैंगन बलिया की बेल काफी घनी और कंटीली होती हैं, जिसमें नन्ही गौरया शिकारी पक्षियों से पूरी तरह महफूज रहती है। नईम ने वर्ष 1992 में अपने घर में बैंगन बलिया की बेल लगाई थी। इसके दो साल बाद ही बेल पर 15-20 गौरया आकर बैठने लगी। नईम ने पूरे आंगन में बेल लगा दी, ताकि और अधिक गौरया यहां आए। कुछ महीनों में ही बेल बढ़ी और साथ ही साथ चिड़ियों की संख्या भी बढ़ने लगी। दो-तीन सालों में ही गौरया की संख्या 250 तक पहुंच गई।
कंक्रीट के मकानों ने छीना गौरया का आशियाना
आतिशबाजी की तेज आवाज से गौरया हार्ट अटैक से मरने लगती हैं या फिर घबराकर घोंसले से उड़ जाती है। अंधेरा होने के कारण वे बिजली की तारों से टकराकर मर जाती हैं या शिकारी पक्षी उन्हें दबोच लेते हैं। पहले सिर्फ दीवाली पर आतिशबाजी चलती थी, लेकिन अब शादी और अन्य त्योहारों पर भी आतिशबाजी चलाई जाती है, जो गौरया के लिए जानलेवा साबित हो रही है।
दुर्लभ प्रजाति में शामिल हो गई है गौरया : प्रो. सोढ़ी
गुरुनानक खालसा कॉलेज के बोटनी के पूर्व विभागाध्यक्ष जगतार सिंह सोढ़ी का कहना है कि गौरया अब दुर्लभ प्रजाति में शामिल हो गई है। यदि इन्हें बचाने का जल्द प्रयास न किया गया तो इनका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। फसलों में कीटनाशक का इस्तेमाल बढ़ने से भी गौरया खत्म हो रही हैं। गौरया फसलों के कीटनाशक खाती है, जिससे उनकी मौत हो जाती है।