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रोजाना क्षमता से कई गुणा ज्यादा सुन रहे शोर, बहरेपन का बढ़ा खतरा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 16 Apr 2022 01:09 AM IST
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Hearing noise many times more than daily capacity, increased risk of deafness
यमुनानगर। आपके कानों को रोजाना क्षमता से ज्यादा तेज आवाज का शोर सहना पड़ रहा है। आए दिन होने वाले आयोजनों, उत्सवों, शादी-विवाह में बजने वाले डीजे और बम-पटाखों की आवाज कान के पर्दे फाड़ सकती है। कान-नाक-गला (ईएनटी) विशेषज्ञ मानते हैं कि रोजाना आठ घंटे अगर 80-90 डेसीबल की आवाज कोई व्यक्ति पांच साल तक लगातार सुनता है तो वह बहरा हो सकता है।
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ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करना आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती है। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. विक्रम भारती का कहना है कि तेज आवाज से केवल बहरापन ही नहीं होता बल्कि इससे चिड़चिड़ापन, असहनशीलता, मांसपेशियों में संकुचन, तनाव और नींद न आने की समस्या पैदा होती है। उक्त रोगों से संबंधित काफी मरीज उनके पास पहुंच रहे हैं। कुछ सालों में ऐसे मरीजों की संख्या में काफी वृद्घि हुई है। इसके लिए जरूरी है बाइक सवार हेलमेट का इस्तेमाल करें। कार चालक शीशे चढ़ाकर ड्राइविंग करें।
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पुलिस व प्रशासन को नहीं सुनाई देता प्रेशर हॉर्न का शोर
ध्वनि प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऊंची आवाज में बजने वाले प्रेशर हार्न पर पाबंदी के बावजूद दोपहिया व चौपहिया वाहन चालक सारा दिन सड़कों पर हॉर्न बजाते रहते हैं। यहां तक कि हरियाणा रोडवेज की बसों, सहकारी समिति की बसों व ट्रकों पर प्रेशर हॉर्न लगे हैं। मगर ट्रैफिक पुलिस व जिला प्रशासन के कानों तक इस उंची आवाज में बजने वाले प्रेशर हार्न का शोर नहीं पहुंच रहा। प्रशासन की ढुलमुल रवैये के चलते वाहनों पर लगे प्रेशर हॉर्न के शोर से निजात नहीं मिल रही। सबसे ज्यादा प्रेशर हार्न का शोर बस स्टैंड रोड पर सुनने को मिलता है। बस चालक सवारी उठाने के चक्कर में और एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगातार प्रेशर हार्न बजाते रहते हैं। अस्पतालों के सामने भी तेज आवाज में हॉर्न बजाकर मरीजों को परेशान किया जाता है। पुलिस सीट बेल्ट, इंश्योरेंस, रेड लाइट जंप का तो चालान काटती है, लेकिन वाहन पर लगे प्रेशर हॉर्न पर किसी का ध्यान नहीं जाता। आजकल तो बुलेट से पटाखे बजाने वालों ने भी लोगों में दहशत फैला रखी है।
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गंभीर बीमारियों का रहता है खतरा: डॉ. अशोक
ईएनटी स्पेशलिस्ट डॉ. अशोक गर्ग के मुताबिक हॉर्न का सेफ लेवल 90 डेसीबल है। 125 डेसीबल से ज्यादा उंची आवाज से कान बहरे भी हो सकते हैं। इसके अलावा हमारी सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। जैसे स्वभाव में चिड़चिड़ापन आना, ऊंचा सुनाई देना, कार्यक्षमता कम होना, सोचने की क्षमता प्रभावित होना, ब्लड प्रेशर बढ़ना व नींद में कमी होने के साथ और भी कई गंभीर बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। नवजात बच्चों और गर्भस्थ शिशुओं के विकास को ध्वनि प्रदूषण बुरी तरह प्रभावित करती है।
कहां, कितना डेसीबल-
सामान्य बातचीत- 40-45 डेसीबल।
भीड़ में बातचीत- 60-70 डेसीबल तक।
कार, बाइक- 80-90 डेसीबल तक।
फ्लाइट की आवाज- 100-120 डेसीबल तक।
पटाखा- 100-120 डेसीबल तक।
ढोल, डीजे, डिस्को- 100-110 डेसीबल तक।
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