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800 साल पहले जो पहचान हो गई थी गुम, उसे फिर जिंदा करने की कोशिश, स्थापित होगा बौद्ध मठ
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यमुनानगर। बिलासपुर आदिबद्री के गांव गेंदा रामपुरा में अब फिर से इतिहास दोहराया जाएगा। 800 साल पहले विदेशी आक्रमणकारियों ने यहां के बौद्ध स्थलों को तहस नहस कर दिया था। अब एकबार फिर यहां बौद्ध मठ की स्थापना की जाएगी। गांव में 13 एकड़ जमीन पर बनने वाले अजान चाह बौद्ध वनविहार का भूमिपूजन रविवार को किया जाएगा। भूमिपूजन के लिए थाइलैंड के वरिष्ठ भिक्षु लूंगपोर जुंडी और अजान केवली विशेष तौर पर आ रहे हैं। यह जानकारी अरण्य विहार ट्रस्ट के महासचिव अनीष गोयल ने दी।
उन्होंने बताया कि देशभर में आश्रम के लिए जमीन तलाशी गई, इसके बाद आदिबद्री को चुना गया है। चूंकि यहां एक समय में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृतांत में इलाके में दस स्तूपों का जिक्र किया था।
आदिबद्री में जब पुरातत्व विभाग ने खुदाई की तो यहां एक किलोमीटर के क्षेत्र में कई स्तूपों के अवशेष मिले थे। एक बौद्ध विहार की तो खुदाई भी की जा चुकी है। उन्होंने बताया कि चनेटी में स्तूप, सुध में बौद्ध मठ व वनविहार के अवशेष हैं। इसके साथ ही टोपरा में भी अशोक स्तंभ इस बात की पुष्टि करता है कि यह जमीन बौद्ध धर्म के लिए काफी अहम है। उन्होंने बताया कि 2019 में यहां थाईलैंड से भिक्षु अजान केवली भ्रमण के लिए आए थे। तब तय किया गया था कि यहां अजान चाह बौद्ध वनविहार स्थापित किया जाएगा। बता दें यमुनानगर में दो हजार साल पहले के बौद्ध मठ हैं।
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इसलिए खास है यह वनविहार
वनविहार परंपरा के पीछे मान्यता यह है कि भगवान बुद्ध वन में पैदा हुए थे। वन में ही उन्होंने अपनी शिक्षाएं ली। यहां तक की उन्होंने वन में ही महा परिनिर्वाण प्राप्त किया था। इसलिए बौद्ध धर्म में अजान चाह वनविहार का बड़ा महत्व है। बता दें आदिबद्री में पवित्र सरस्वती नदी भी है। इसके अलावा अब यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का मठ बनने से विदेशी पर्यटकों का यहां रुझान बढ़ेगा, जिससे सरस्वती नदी और आदिबद्री को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी।
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वर्जन
अजान चाह वनविहार की स्थापना होना निश्चित ही ऐतिहासिक पल है। इससे इलाके की जो पहचान गुम सी हो गई थी, वह वापस मिलेगी। वन विहार स्थापित करने में स्थानीय स्तर पर फोरम सहयोग कर रहा है।
-सिद्धार्थ गौर, अध्यक्ष, द बुद्धिस्ट फोरम।
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उन्होंने बताया कि देशभर में आश्रम के लिए जमीन तलाशी गई, इसके बाद आदिबद्री को चुना गया है। चूंकि यहां एक समय में बौद्ध धर्म अपने चरम पर था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृतांत में इलाके में दस स्तूपों का जिक्र किया था।
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आदिबद्री में जब पुरातत्व विभाग ने खुदाई की तो यहां एक किलोमीटर के क्षेत्र में कई स्तूपों के अवशेष मिले थे। एक बौद्ध विहार की तो खुदाई भी की जा चुकी है। उन्होंने बताया कि चनेटी में स्तूप, सुध में बौद्ध मठ व वनविहार के अवशेष हैं। इसके साथ ही टोपरा में भी अशोक स्तंभ इस बात की पुष्टि करता है कि यह जमीन बौद्ध धर्म के लिए काफी अहम है। उन्होंने बताया कि 2019 में यहां थाईलैंड से भिक्षु अजान केवली भ्रमण के लिए आए थे। तब तय किया गया था कि यहां अजान चाह बौद्ध वनविहार स्थापित किया जाएगा। बता दें यमुनानगर में दो हजार साल पहले के बौद्ध मठ हैं।
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इसलिए खास है यह वनविहार
वनविहार परंपरा के पीछे मान्यता यह है कि भगवान बुद्ध वन में पैदा हुए थे। वन में ही उन्होंने अपनी शिक्षाएं ली। यहां तक की उन्होंने वन में ही महा परिनिर्वाण प्राप्त किया था। इसलिए बौद्ध धर्म में अजान चाह वनविहार का बड़ा महत्व है। बता दें आदिबद्री में पवित्र सरस्वती नदी भी है। इसके अलावा अब यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का मठ बनने से विदेशी पर्यटकों का यहां रुझान बढ़ेगा, जिससे सरस्वती नदी और आदिबद्री को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी।
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वर्जन
अजान चाह वनविहार की स्थापना होना निश्चित ही ऐतिहासिक पल है। इससे इलाके की जो पहचान गुम सी हो गई थी, वह वापस मिलेगी। वन विहार स्थापित करने में स्थानीय स्तर पर फोरम सहयोग कर रहा है।
-सिद्धार्थ गौर, अध्यक्ष, द बुद्धिस्ट फोरम।