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छह मिनट में बदली योगी के गांव भैंसवाल कलां की फिजा
Sonipat
Updated Mon, 22 Aug 2016 12:36 AM IST
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खेल शुरू होने से पूर्व भगवान का पाठ करती योगेश्वर की मां। मैच में हार से निराश योगी की मां को समझाते परिवार के सदस्य व ग्रामीण।
- फोटो : amar ujala
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फ्री स्टाइल कुश्ती के पहलवान योगेश्वर के गांव भैंसवाल में सुबह होते ही योगेश्वर के स्वर्ण पदक की आस को लेकर ग्रामीणों में उत्साह शुरू हो गया था। ग्रामीणों ने रविवार सुबह बलराज अखाड़े में हवन का आयोजन किया गया। योगेश्वर के मैचों के उत्साह से दूर-दराज के रिश्तेदार भी गांव पहुंचे। गांव के प्रत्येक ग्रामीण में योगेश्वर की जीत को लेकर काफी आस बनी हुई थी। योगेश्वर के मैच देखने के लिए उसके घर में दो बड़ी एलईडी तथा ग्राम पंचायत द्वारा प्रोजेक्टर लगाया गया था। शाम करीब 4:45 मिनट पर योगेश्वर दत्त की कुश्ती मंगोलिया के खिलाड़ी के साथ हुई। छह मिनट के खेल में ही उसने योगेश्वर के सभी दांव और उसके सपने पर पानी फेर दिया। इससे परिवार व गांव ही नहीं, बल्कि पूरे देश में मायूसी सी छा गई। जिस योगी से देश स्वर्ण पदक की आस लगाए बैठा था, अब वह खाली हाथ घर लौटेगा।
दो नवंबर 1982 को योगेश्वर दत्त का जन्म गांव भैंसवाल के एक साधारण से परिवार में हुआ था। उसके पिता मा. रामेहर सिंह व माता सुशीला देवी जेबीटी अध्यापक थे। योगेश्वर अपनी तीन बहन कविता, सीमा व रेणु से छोटा है। योगेश्वर का सबसे छोटा भाई मुकेश है। योगेश्वर दत्त ने आठ साल की उम्र में गांव के ही बलराज अखाड़े में कुश्ती करना शुरू किया था। यह अखाड़ा अंतरराष्ट्रीय पहलवान और हिंद केसरी बलराज का अखाड़ा था। उनका स्वर्गवास के बाद इसके संचालक हरियाणवी लोक कलाकार मास्टर सतबीर सिंह बने।
योगेश्वर ने गांव में ही पांचवीं कक्षा के दौरान कुश्ती करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया था। पहला इनाम एक घड़ी मिली थी। 8वीं कक्षा योगेश्वर ने अपने मामा के गांव मुबारकपुर में पास की। वहां से वापस आकर योगेश्वर ने नौवीं कक्षा में अखाड़े में ही कुश्ती करते हुए नेशनल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। 1999 में 12वीं कक्षा के बाद योगेश्वर दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में कुश्ती करने चले गए। पोलैंड में उसने अंडर-17 जूनियर वर्ग में भाग लेते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया। तीन दिसंबर 2006 में योगेश्वर के पिता मास्टर रामेहर सिंह का स्वर्गवास हो गया। बताया जा रहा है कि योगेश्वर दत्त पिता का संस्कार करते ही दोहा में एशियन गेमों में खेलने के लिए गए थे। जहां उन्होंने कांस्य पदक जीता था। योगेश्वर ने बीए की परीक्षा रोहतक के गौड़ कॉलेज से पास की। 2012 में लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीता। इसके बाद हरियाणा सरकार ने उसे डीएसपी के पद पर नियुक्त किया था।
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अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां
1999- विश्व कैडेट चैंपियनशिप, पोलैंड-स्वर्ण पदक
2002- नूरी कप, ईरान,-स्वर्ण पदक
2003- राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप, लंदन-स्वर्ण पदक
2004- एथेंस ओलंपिक-देश का प्रतिनिधित्व
2005- राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप, केपटाउन -स्वर्ण पदक
2006- दोहा एशियाई खेल-कांस्य पदक
2007-राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप, लंदन-स्वर्ण पदक
2008- एशियाई सीनियर कुश्ती चैंपियनशिप-स्वर्ण पदक
2008- बीजिंग ओलंपिक-देश का प्रतिनिधित्व
2010- राष्ट्रमंडल खेल, नई दिल्ली-स्वर्ण पदक
2012- एशियाई सीनियर कुश्ती चैंपियनशिप-स्वर्ण पदक
2012- लंदन ओलंपिक-कांस्य पदक
2013- इटली गोल्डन ग्रांड प्रिक्स-स्वर्ण पदक
2014- कॉमनवेल्थ गेम-स्वर्ण पदक
2014- एशियन गेम इनाचियोन-स्वर्ण पदक 28 साल बाद
2016- एशियन क्वालिफेकशन टूर्नामेंट-स्वर्ण पदक
पिता और गुरु का सपना नहीं कर पाए पूरा
रिओ में जाने से पहले योगेश्वर दत्त ने कहा था कि उसके पिता मास्टर रामेहर सिंह व गुरु मास्टर सतबीर सिंह का सपना था कि वह ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल करें। लेकिन योगेश्वर दत्त पहले ही मैच में हार गए और अपने गुरु व पिता का सपना पूरा नहीं कर पाए। इससे जहां पूरे देश में मायूसी सी छाई हुई थी, वहीं परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। पदक की आस में ग्रामीण भी हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे।
मां ने नहीं देखा मैच
योगेश्वर की मां सुशीला देवी कभी भी योगेश्वर के मैच नहीं देखती, मैच शुरू होते ही सुशीला घर में बने मंदिर में पूजा के लिए बैठ जाती हैं। रविवार को भी सुशीला योगेश्वर का मैच शुरू होने से पहले मंदिर में पूजा करने के लिए बैठ गई। जैसे ही योगेश्वर का मैच शुरू हुआ, तालियों के साथ परिजनों ने उसका स्वागत किया। सुशीला देवी ने चालीस पढ़ना शुरू किया और परिजन मैच देखते रहे। जैसे ही योगेश्वर दाव लगाने की कोशिश करता परिजन मस्ती में झूम उठते। लेकिन छह मिनट में योगेश्वर का एक भी दांव सफल नहीं हो सका। इससे परजिनों का जोश मायूसी में बदल गया। हार के बाद परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। वहीं, बेटे की हार से माता का हौसला टूट गया और वह फूट-फूटकर रोने लगी।
दीवाली मनाने की थी तैयारी, रही अधूरी
योगेश्वर की जीत के बाद ग्रामीण दीवाली मनाने की तैयारी कर रहे थे। ग्रामीणों की आस थी कि योगेश्वर अपने आखिरी ओलंपिक में पूरे देश को स्वर्ण पदक जीतकर एक तोहफा प्रदान करें। लेकिन योगी की हार से ग्रामीणों के चेहरे उतरे गए।
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दो नवंबर 1982 को योगेश्वर दत्त का जन्म गांव भैंसवाल के एक साधारण से परिवार में हुआ था। उसके पिता मा. रामेहर सिंह व माता सुशीला देवी जेबीटी अध्यापक थे। योगेश्वर अपनी तीन बहन कविता, सीमा व रेणु से छोटा है। योगेश्वर का सबसे छोटा भाई मुकेश है। योगेश्वर दत्त ने आठ साल की उम्र में गांव के ही बलराज अखाड़े में कुश्ती करना शुरू किया था। यह अखाड़ा अंतरराष्ट्रीय पहलवान और हिंद केसरी बलराज का अखाड़ा था। उनका स्वर्गवास के बाद इसके संचालक हरियाणवी लोक कलाकार मास्टर सतबीर सिंह बने।
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योगेश्वर ने गांव में ही पांचवीं कक्षा के दौरान कुश्ती करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया था। पहला इनाम एक घड़ी मिली थी। 8वीं कक्षा योगेश्वर ने अपने मामा के गांव मुबारकपुर में पास की। वहां से वापस आकर योगेश्वर ने नौवीं कक्षा में अखाड़े में ही कुश्ती करते हुए नेशनल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। 1999 में 12वीं कक्षा के बाद योगेश्वर दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में कुश्ती करने चले गए। पोलैंड में उसने अंडर-17 जूनियर वर्ग में भाग लेते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया। तीन दिसंबर 2006 में योगेश्वर के पिता मास्टर रामेहर सिंह का स्वर्गवास हो गया। बताया जा रहा है कि योगेश्वर दत्त पिता का संस्कार करते ही दोहा में एशियन गेमों में खेलने के लिए गए थे। जहां उन्होंने कांस्य पदक जीता था। योगेश्वर ने बीए की परीक्षा रोहतक के गौड़ कॉलेज से पास की। 2012 में लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीता। इसके बाद हरियाणा सरकार ने उसे डीएसपी के पद पर नियुक्त किया था।
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अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां
1999- विश्व कैडेट चैंपियनशिप, पोलैंड-स्वर्ण पदक
2002- नूरी कप, ईरान,-स्वर्ण पदक
2003- राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप, लंदन-स्वर्ण पदक
2004- एथेंस ओलंपिक-देश का प्रतिनिधित्व
2005- राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप, केपटाउन -स्वर्ण पदक
2006- दोहा एशियाई खेल-कांस्य पदक
2007-राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप, लंदन-स्वर्ण पदक
2008- एशियाई सीनियर कुश्ती चैंपियनशिप-स्वर्ण पदक
2008- बीजिंग ओलंपिक-देश का प्रतिनिधित्व
2010- राष्ट्रमंडल खेल, नई दिल्ली-स्वर्ण पदक
2012- एशियाई सीनियर कुश्ती चैंपियनशिप-स्वर्ण पदक
2012- लंदन ओलंपिक-कांस्य पदक
2013- इटली गोल्डन ग्रांड प्रिक्स-स्वर्ण पदक
2014- कॉमनवेल्थ गेम-स्वर्ण पदक
2014- एशियन गेम इनाचियोन-स्वर्ण पदक 28 साल बाद
2016- एशियन क्वालिफेकशन टूर्नामेंट-स्वर्ण पदक
पिता और गुरु का सपना नहीं कर पाए पूरा
रिओ में जाने से पहले योगेश्वर दत्त ने कहा था कि उसके पिता मास्टर रामेहर सिंह व गुरु मास्टर सतबीर सिंह का सपना था कि वह ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल करें। लेकिन योगेश्वर दत्त पहले ही मैच में हार गए और अपने गुरु व पिता का सपना पूरा नहीं कर पाए। इससे जहां पूरे देश में मायूसी सी छाई हुई थी, वहीं परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। पदक की आस में ग्रामीण भी हाथ पर हाथ रखे बैठे रहे।
मां ने नहीं देखा मैच
योगेश्वर की मां सुशीला देवी कभी भी योगेश्वर के मैच नहीं देखती, मैच शुरू होते ही सुशीला घर में बने मंदिर में पूजा के लिए बैठ जाती हैं। रविवार को भी सुशीला योगेश्वर का मैच शुरू होने से पहले मंदिर में पूजा करने के लिए बैठ गई। जैसे ही योगेश्वर का मैच शुरू हुआ, तालियों के साथ परिजनों ने उसका स्वागत किया। सुशीला देवी ने चालीस पढ़ना शुरू किया और परिजन मैच देखते रहे। जैसे ही योगेश्वर दाव लगाने की कोशिश करता परिजन मस्ती में झूम उठते। लेकिन छह मिनट में योगेश्वर का एक भी दांव सफल नहीं हो सका। इससे परजिनों का जोश मायूसी में बदल गया। हार के बाद परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। वहीं, बेटे की हार से माता का हौसला टूट गया और वह फूट-फूटकर रोने लगी।
दीवाली मनाने की थी तैयारी, रही अधूरी
योगेश्वर की जीत के बाद ग्रामीण दीवाली मनाने की तैयारी कर रहे थे। ग्रामीणों की आस थी कि योगेश्वर अपने आखिरी ओलंपिक में पूरे देश को स्वर्ण पदक जीतकर एक तोहफा प्रदान करें। लेकिन योगी की हार से ग्रामीणों के चेहरे उतरे गए।