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प्रेरणा: शिष्यों का जीवन संवारने में अविवाहित रहे 3 'द्रोणाचार्य', कुश्ती की पौध तैयार करने में लगा दिया जीवन

Mon, 05 Sep 2022 02:35 AM IST
रोहतक ब्यूरो विष्णु कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत (हरियाणा)
विष्णु कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत (हरियाणा) Published by: रोहतक ब्यूरो Updated Mon, 05 Sep 2022 02:35 AM IST
सार

जिले के तीन प्रशिक्षकों ने नि:स्वार्थ भावना से कुश्ती को ही जीवन समर्पित कर दिया।  पहलवान इन्हीं प्रशिक्षकों से प्रशिक्षण प्राप्त कर आज देश के लिए सोना जीत रहे। देश को दिए रवि दहिया, नवीन फतेहपुर सरीखे पहलवान मिले हैं।
 

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The three 'Dronacharyas' of Sonipat remained unmarried in grooming the lives of their disciples
गांव जुआं स्टेडियम के अखाड़े में कुश्ती के गुर सीखते बच्चे। संवाद - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

दमखम के खेल कुश्ती के रुतबे को देश व दुनिया में कायम रखने और अपने शिष्यों का जीवन संवारने के लिए जिले के तीन द्रोणाचार्य अविवाहित ही रहे। इनमें हरियाणा के सोनीपत के गांव नाहरी में ब्रह्मचारी अखाड़ा चलाने वाले गुरु हंसराज, गांव जुआं निवासी पहलवान संजीत व गांव फतेहपुर निवासी धर्मबीर पहलवान शामिल हैं।

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इन तीनों पर कुश्ती का जज्बा इस कदर हावी रहा कि घर-गृहस्थी न बसाकर कुश्ती को ही पूरा जीवन समर्पित कर दिया। कुश्ती की पौध तैयार करने के लिए आज तक शादी नहीं की। इन्हीं प्रशिक्षकों से प्रशिक्षण प्राप्त कर पहलवान आज देश के लिए सोना जीत रहे हैं। इन प्रशिक्षकों ने देश को रवि दहिया, नवीन फतेहपुर, नीरज जुआं, चिराग छिक्कारा, अंकित, रवनीत, ईश्वर सरीखे अनेक पहलवान दिए हैं। इन प्रशिक्षकों का कहना है कि ‘म्हारा तै सब कुछ कुश्ती सै’।

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गांव नाहरी निवासी पहलवान हंसराज, गांव जुआं निवासी संजीत पहलवान व गांव फतेहपुर निवासी पहलवान धर्मबीर ने अपनी जिद व जुनून ने कुश्ती को नए आयाम दिए हैं। यही नहीं पूरा जीवन कुश्ती को समर्पित करते हुए शादी तक नहीं की और आज भी नि:स्वार्थ भावना से कुश्ती की नई पौध तैयार कर रहे हैं।

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इन्हीं प्रशिक्षकों से प्रशिक्षण प्राप्त कर पहलवान का देश के लिए सोना जीत रहे हैं। कुश्ती के प्रति इन प्रशिक्षकों के जुनून का ही परिणाम है कि यहां के युवा विश्व पटल पर अपनी छाप छोड़ चुके हैं। ओलंपिक हो या कॉमनवेल्थ यहां के पहलवानों का ही दबदबा रहा।


नाहरी के पहलवान हंसराज ने मिट्टी के अखाड़े से पैदा कर दिए 22 पहलवान
गांव नाहरी निवासी पहलवान हंसराज ने सुविधाओं के अभाव में मिट्टी के अखाड़े से 22 पहलवान पैदा कर दिए, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर चुके हैं। टोक्यो ओलंपिक में रजत पदक और राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहलवान रवि दहिया ने कुश्ती की शुरुआत पहलवान हंसराज के अखाड़े से ही की थी। पहलवान हंसराज ने दिल्ली जल बोर्ड में सरकारी नौकरी छोड़कर वर्ष 1996 में गांव में अखाड़ा शुरू किया था। यहां से अब तक करीब 100 से अधिक पहलवान तैयार होकर निकल चुके हैं। हंसराज को पहलवानी का शुरू से ही शौक था, लेकिन उनके पिता सूबे सिंह को उनका कुश्ती लड़ना अच्छा नहीं लगता था।

 

 गांव नाहरी निवासी प्रशिक्षक हंसराज पहलवान। संवाद

गांव नाहरी निवासी प्रशिक्षक हंसराज पहलवान। संवाद

 

कुश्ती के दौरान घुटने में चोट लगने से उनके पैर का ऑपरेशन हुआ और उनकी पहलवानी छूट गई। दिल में कुश्ती का जुनून हिलोरे मारता रहा। कुश्ती में देश का नाम विश्व पटल पर चमकाने के सपने को सच करने के लिए उन्होंने कुश्ती की पौध तैयार करने की ठानी और गांव में आर्य समाज मंदिर में अखाड़ा खोलकर कुश्ती के गुर सिखाने लगे। परिवार व ग्रामीणों ने इसका विरोध किया तो उन्होंने नहर पर अखाड़ा शुरू कर दिया। सुविधाओं के अभाव के बीच पहलवान हंसराज छोटे बच्चों को अभ्यास कराते रहे।


पहलवानों की प्रतिभा पहचानकर पांच साल बाद उसे आगामी प्रशिक्षण के लिए अपने गुरु महाबली सतपाल के पास दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में छोड़ आते हैं। 26 साल में हंसराज 100 से अधिक पहलवान तैयार कर चुके हैं, जिन्होंने देश का नाम रोशन किया है। इन पहलवानों में 22 पहलवान राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और ओलंपिक तक पहुंचे हैं। यहां से प्रशिक्षण प्राप्त कर गांव नाहरी में अर्जुन अवॉर्डी महाबीर सिंह, अमित दहिया, ध्यानचंद अवॉर्डी सतबीर सिंह कुश्ती में देश का नाम रोशन कर चुके हैं। वहीं गांव हलालपुर में अर्जुन अवॉर्डी रोहतास सिंह अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। हंसराज सप्ताह में तीन दिन सुबह के समय छत्रसाल स्टेडियम में अपने पहलवानों से मिलने जाते हैं।

पहलवानों को निखारने के लिए तैयार किया देसी जिम
गांव नाहरी में नहर किनारे बनाए गए पहलवान हंसराज के अखाड़े में कोई सुविधा नहीं है। वे यहां पहलवानों को कड़ी मेहनत व अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं। पहलवानी में पारंगत करने के लिए देसी तरीके से जिम तैयार किया गया है। यहां बिजली का कनेक्शन तक नहीं है। पहलवानों के लिए नहर की पटरी को साफ कर दौड़ लगाने के लिए देसी ट्रैक बनाया गया है। चक्की के पाटों को तार के सहारे पेड़ों पर बांधकर देसी जिम बनाया गया है। पेंट के खाली डिब्बों में कंक्रीट भरकर तार की सहायता से पेड़ पर लटकाकर खींचा जाता है। अखाड़ा खोदकर व मोटे रस्से से व्यायाम किया जाता है। पहलवानों को साथ लगती नहर में तैराना सिखाया जाता है।

जुआं अखाड़े में संजीत पहलवान से कुश्ती के गुर सीख रहे 15 से अधिक गांवों के युवा
गांव जुआं के संजीत पहलवान पर कुश्ती में देश का नाम चमकाने का जुनून कुछ इस कदर हावी रहा कि उन्होंने शादी तक नहीं की। संजीत पहलवान का कहना है कि वह पहले कुश्ती देखने जाते थे। वहां से कुश्ती के प्रति लगाव हुआ कि खुद कुश्ती करनी शुरू कर दी। वर्ष 1982 से 1996 तक कुश्ती लड़ी। संजीत दो बार राष्ट्रीय व करीब 15 बार राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिताओं में भाग लेकर गांव व प्रदेश का नाम रोशन कर चुके हैं। कुश्ती के प्रति बचपन से जुनून होने के कारण संजीत पहलवान ने निर्णय लिया कि वह गांव में ही अखाड़ा बनाकर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पहलवान तैयार करेंगे।
 

गांव जुआं निवासी प्रशिक्षक संजीत पहलवान।

गांव जुआं निवासी प्रशिक्षक संजीत पहलवान।


इसी सोच के साथ उन्होंने गांव के बच्चों को कुश्ती के गुर सिखाने प्रारंभ कर दिए। वर्तमान में संजीत पहलवान के पास कुश्ती के गुर सीखने के लिए आसपास के 15 गांवों से करीब 90 बच्चे आते हैं। कुश्ती के शौक के कारण संजीत पहलवान ने शादी नहीं की। घर वाले दबाव देते रहे, लेकिन संजीत के लिए कुश्ती ही उनकी दुल्हन और कुश्ती सीखने आने वाले उसके बच्चे हैं।



संजीत पहलवान की उम्र करीब 49 वर्ष हो चुकी है। आज भी उनका जुनून कम नही हुआ है। ग्रामीणों के साथ मिलकर चंदे से खिलाड़ियों का भविष्य संवार दिया। संजीत ने गांव के बदहाल राजीव गांधी खेल स्टेडियम को जिले का आदर्श स्टेडियम बनाते हुए उसमें खिलाड़ियों के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध करा दी। चंदा जुटाकर पहले स्टेडियम में सुविधाएं बढ़ाई और अब बिना कोंचिग फीस के पहलवानों को कुश्ती के गुर सिखा रहे हैं। संजीत से प्रशिक्षण लेकर नीरज जुआं, चिराग छिक्कारा, अंकित, रवनीत, ईश्वर ने अंतरराष्ट्रीय फलक पर अपना नाम चमकाया है।

विरोध के बावजूद धर्मबीर पहलवान ने जारी रखी कुश्ती
गांव फतेहपुर निवासी धर्मबीर पहलवान राज्य स्तरीय पहलवान रह चुके हैं। धर्मबीर ने कुश्ती की शुरुआत 11वीं कक्षा से की थी। धर्मबीर की कुश्ती का घरवाले विरोध करते थे। एक दिन पहलवान धर्मबीर ने अपने गुरु रघुबीर से पूछा कि वह अखाड़े में रहना चाहते हैं तो गुरु रघुबीर ने इजाजत दे दी। धर्मबीर परिजनों से बिना बात किए अपना सामान लेकर सोनीपत गुरु रघुबीर सिंह के अखाड़े में आ पहुंचे। बाद में किसी कारण वह अखाड़ा तुड़वा दिया गया। उसी दिन धर्मबीर ने ठान लिया कि एक दिन अपना अखाड़ा बनाएंगे। कुश्ती के प्रति लगाव व अखाड़ा बनाने का ऐसा जुनून छाया कि शादी तक नहीं की और अपना जीवन कुश्ती को समर्पित कर दिया।
 

 गांव फतेहपुर निवासी प्रशिक्षक धर्मबीर पहलवान।

गांव फतेहपुर निवासी प्रशिक्षक धर्मबीर पहलवान।- फोटो 



पहलवान धर्मबीर ने वर्ष 2002 में घर वालों से पैसे लेकर हरसाना-मालचा मोड़ से आगे खरखौदा मार्ग पर 4 लाख रुपये की लागत से जमीन ली। बाद में इसी जमीन पर अखाड़ा प्रारंभ कर दिया। पहलवान धर्मबीर का बजरंग अखाड़ा बनाने में पहलवानों व कुश्ती का शौक रखने वाले ग्रामीणों ने मदद की। धर्मबीर का कहना है कि अब कुश्ती ही उनके जीवन की साथी है। धर्मबीर के बजरंग अखाड़े से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनेक पहलवान निकल चुके हैँ।

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