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सिविल अस्पताल में दर्द तक की दवा नहीं
अमर उजाला ब्यूरो सोनीपत।
Updated Tue, 21 Feb 2017 12:00 AM IST
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डिस्पेंसरी से दवा लेने के लिए लाइन में लगे हुए बुजुर्ग
- फोटो : bureau
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सिविल अस्पताल में स्वास्थ्य विभाग के डीजी ने 15 दिन पहले ही निरीक्षण किया, लेकिन उसके बाद अस्पताल के हालात सुधरने की जगह बिगड़ गए हैं। अस्पताल में मरीजों को दवाई ही नहीं मिल रही हैं और डॉक्टर पर्ची पर बाहर की दवाइयां लिख रहे हैं। इससे मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में पेट की बीमारी ठीक करने की टैबलेट से लेकर आई ड्राप्स, स्किन व टीबी तक की दवाई नहीं मिल रही हैं और मरीजों को पैसे खर्च करके बाहर से दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं। दवाओं की कमी काफी समय से चल रही है, लेकिन अस्पताल प्रशासन की ओर से इन्हें मंगवाया नहीं जा रहा है।
सिविल अस्पताल में डॉक्टर जिन दवाओं को मरीजों की पर्ची पर लिख रहे हैं, उनमें से कुछ दवाइयां अस्पताल की डिस्पेंसरी में मिल जाती हैं तो अन्य के लिए मरीजों को बाहर पैसे खर्च करने पड़ रहे है। इनमें अधिकतर ऐसी दवाइयां हैं जो सामान्य बीमारी में मरीजों को जरूरत पड़ती हैं। ऐसी दवाइयां भी अस्पताल में नहीं मिलने से मरीजों को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा और पैसे नहीं होने की स्थिति में मरीजों का मर्ज भी बढ़ रहा है।
15 दिन पहले डीजी ने किया था अस्पताल का निरीक्षण
चार फरवरी को स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए विभाग के डीजी प्रवीण गर्ग ने अस्पताल का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने डिस्पेंसरी में पहुंचकर दवाओं की जांच पड़ताल की थी और चिकित्सकों को निर्देश दिए कि मरीजों को कोई भी बाहर की दवाई न लिखें। मरीजों को सभी दवाइयां अस्पताल में ही मिलनी चाहिए। उसके बावजूद भी मरीजों को बाहर की दवाओं को खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इस तरह लगभग रोजाना 300 मरीजों को दवाई नहीं मिलने से जेब ढीली करनी पड़ रही है।
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ये दवाएं अस्पताल में नहीं मिल रही
मरीजों को पेट की बीमारी के लिए ओमेप्राजोल कैप्सूल, डाइजिन सिरप, एंटी एलर्जिक क्रीम, आई ड्राप्स, मल्टी विटामिन दवाएं, टीबी की गोलियां भी बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। यहां आए मरीजों ने बताया कि उनको इन बीमारियों की दवा अस्पताल में नहीं मिली तो पर्ची पर लिखी दवाएं बाहर से लेनी पड़ीं। वहीं, अस्पताल में छाती के दर्द के लिए सारबिट्रेट पिछले एक साल से नहीं है। उसके बावजूद डॉक्टर इन दवाओं को पर्ची पर लिख रहे हैं। वहीं, डेढ़ माह पहले खत्म हुईं बी-कॉम्पलेक्स दवाएं भी अब तक नहीं मिल रही हैं।
डेढ़ माह से टीबी, कुछ दवा अस्पताल तो कुछ बाहर से
मुझे डेढ़ माह से टीबी है। सरकार एक तरफ अस्पताल में ही मरीजों को मुफ्त दवाएं देने का वादा कर रही है, लेकिन अस्पताल में दवाओं की कमी है। अस्पताल की डिस्पेंसरी से कुछ दवाएं तो मिल जाती हैं, बाकी दवाओं को बाहर से खरीदना पड़ रहा है।
-मांगेराम निवासी जीवन नगर
पेट की बीमारी है, अस्पताल में दवा ही नहीं है
पिछले कई दिनों से पेट की बीमारी है। अस्पताल में दवा लेने के लिए पहुंचा था, लेकिन डॉक्टरों ने बाहर की दवाएं लिख दीं। डिस्पेंसरी में दवा उपलब्ध तक नहीं है। बाहर से दवा लेनी पड़ रही है।
छबीलदास निवासी ब्रह्म कॉलोनी
नहीं मिली छाती में दर्द की दवा
छाती का दर्द दिखाने के लिए गांव से सिविल अस्पताल में पहुंचा, लेकिन जो दवाएं डॉक्टर ने दर्द दूर करने के लिए लिखी है, उसमें से कुछ दवाएं डिस्पेंसरी से मुफ्त में मिल गई तो कुछ दवाएं बाहर की लिख दी हैं।
आनंद कुमार निवासी गांव चटिया औलिया
खिड़की पर कोई मिला ही नहीं
पेट व लीवर पर ज्यादा प्रॉब्लम होने से सूजन आ चुकी है। अस्पताल प्रशासन ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए दवा लेने के लिए आरक्षित खिड़की खोल रखी है, लेकिन वह खिड़की खाली पड़ी हुई है।
विनोद शर्मा, स्थानीय निवासी
मरीजों को समय पर दवाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं ताकि मरीजों को परेशानी का सामना न करना पड़े। अगर डिस्पेंसरी में दवाओं का संकट बना हुआ है तो जल्द ही डिस्पेंसरी का निरीक्षण कर मरीजों की समस्याओं को दूर कर लिया जाएगा।
-डॉ. सुखबीर सिंह, चिकित्सा अधीक्षक
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सिविल अस्पताल में डॉक्टर जिन दवाओं को मरीजों की पर्ची पर लिख रहे हैं, उनमें से कुछ दवाइयां अस्पताल की डिस्पेंसरी में मिल जाती हैं तो अन्य के लिए मरीजों को बाहर पैसे खर्च करने पड़ रहे है। इनमें अधिकतर ऐसी दवाइयां हैं जो सामान्य बीमारी में मरीजों को जरूरत पड़ती हैं। ऐसी दवाइयां भी अस्पताल में नहीं मिलने से मरीजों को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा और पैसे नहीं होने की स्थिति में मरीजों का मर्ज भी बढ़ रहा है।
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15 दिन पहले डीजी ने किया था अस्पताल का निरीक्षण
चार फरवरी को स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए विभाग के डीजी प्रवीण गर्ग ने अस्पताल का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने डिस्पेंसरी में पहुंचकर दवाओं की जांच पड़ताल की थी और चिकित्सकों को निर्देश दिए कि मरीजों को कोई भी बाहर की दवाई न लिखें। मरीजों को सभी दवाइयां अस्पताल में ही मिलनी चाहिए। उसके बावजूद भी मरीजों को बाहर की दवाओं को खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इस तरह लगभग रोजाना 300 मरीजों को दवाई नहीं मिलने से जेब ढीली करनी पड़ रही है।
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ये दवाएं अस्पताल में नहीं मिल रही
मरीजों को पेट की बीमारी के लिए ओमेप्राजोल कैप्सूल, डाइजिन सिरप, एंटी एलर्जिक क्रीम, आई ड्राप्स, मल्टी विटामिन दवाएं, टीबी की गोलियां भी बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। यहां आए मरीजों ने बताया कि उनको इन बीमारियों की दवा अस्पताल में नहीं मिली तो पर्ची पर लिखी दवाएं बाहर से लेनी पड़ीं। वहीं, अस्पताल में छाती के दर्द के लिए सारबिट्रेट पिछले एक साल से नहीं है। उसके बावजूद डॉक्टर इन दवाओं को पर्ची पर लिख रहे हैं। वहीं, डेढ़ माह पहले खत्म हुईं बी-कॉम्पलेक्स दवाएं भी अब तक नहीं मिल रही हैं।
डेढ़ माह से टीबी, कुछ दवा अस्पताल तो कुछ बाहर से
मुझे डेढ़ माह से टीबी है। सरकार एक तरफ अस्पताल में ही मरीजों को मुफ्त दवाएं देने का वादा कर रही है, लेकिन अस्पताल में दवाओं की कमी है। अस्पताल की डिस्पेंसरी से कुछ दवाएं तो मिल जाती हैं, बाकी दवाओं को बाहर से खरीदना पड़ रहा है।
-मांगेराम निवासी जीवन नगर
पेट की बीमारी है, अस्पताल में दवा ही नहीं है
पिछले कई दिनों से पेट की बीमारी है। अस्पताल में दवा लेने के लिए पहुंचा था, लेकिन डॉक्टरों ने बाहर की दवाएं लिख दीं। डिस्पेंसरी में दवा उपलब्ध तक नहीं है। बाहर से दवा लेनी पड़ रही है।
छबीलदास निवासी ब्रह्म कॉलोनी
नहीं मिली छाती में दर्द की दवा
छाती का दर्द दिखाने के लिए गांव से सिविल अस्पताल में पहुंचा, लेकिन जो दवाएं डॉक्टर ने दर्द दूर करने के लिए लिखी है, उसमें से कुछ दवाएं डिस्पेंसरी से मुफ्त में मिल गई तो कुछ दवाएं बाहर की लिख दी हैं।
आनंद कुमार निवासी गांव चटिया औलिया
खिड़की पर कोई मिला ही नहीं
पेट व लीवर पर ज्यादा प्रॉब्लम होने से सूजन आ चुकी है। अस्पताल प्रशासन ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए दवा लेने के लिए आरक्षित खिड़की खोल रखी है, लेकिन वह खिड़की खाली पड़ी हुई है।
विनोद शर्मा, स्थानीय निवासी
मरीजों को समय पर दवाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं ताकि मरीजों को परेशानी का सामना न करना पड़े। अगर डिस्पेंसरी में दवाओं का संकट बना हुआ है तो जल्द ही डिस्पेंसरी का निरीक्षण कर मरीजों की समस्याओं को दूर कर लिया जाएगा।
-डॉ. सुखबीर सिंह, चिकित्सा अधीक्षक