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एड्स की जंजीरों से मुक्त नहीं सोनीपत

ब्यूरो/अमर उजाला, सोनीपत Updated Mon, 01 Dec 2014 12:19 AM IST
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ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों में यदि एचआईवी और एड्स के प्रति जागरूकता आ जाए तो इस बीमारी पर आसानी से काबू पाया जा सकता है। वर्तमान में सोनीपत भी एड्स जैसी गंभीर बीमारी से अछूता नहीं है। जिले में इसके मरीजों की बात करें तो यहां भी लगभग 125 मरीज इस गंभीर बीमारी की चपेट में है।
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एचआईवी और एड्स से पीड़ित मरीजों के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा सामान्य अस्पताल में आईसीटीसी (इंट्रीग्रेटेड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर) खोले गए हैं। इस केंद्र पर प्रत्येक महीने लगभग 6 से 12 एचआईवी से पीड़ित मरीजों के केस सामने आ जा रहे हैं।

आईसीटीसी के अनुसार, किसी मरीज की एचआईवी की पुष्टि होते ही सबसे पहले उन्हें टीबी की स्क्रीनिंग के लिए भेजा जाता है। आईसीटीसी की ओर से इन मरीजों को टीबी के लिए कैट वन का कोर्स कराया जाता है। इसके बाद जब मरीजों में सुधार आना शुरू हो जाता है तो उसके बाद उसे एआरटी सेंटर रोहतक भेजा जाता है।

जहां मरीजों की सीडी फार की जांच की जाती है। यदि मरीज का सीडी फार 350 से 250 के बीच मिलता है तो पीड़ित मरीज को एआरटी की दवाई शुरू कर दी जाती है। इन मरीजों को टीबी और एआरटी की दवाई एक साथ चलती है। टीबी का कोर्स पूरा करने के बाद एआरटी की दवाई चलती रहती है तथा बाद में टीबी की दवा बंद कर दी जाती है। हर महीने एटीआर की दवा लेने जो भी मरीज आईसीटीसी पहुंचता है उन्हें बेहतर काउंसलिंग के जरिये नियमित रूप से प्रेरित किया जाता है।

साथ ही यह देखा जाता है कि पीड़ित मरीजों के वजन में कोई कमी तो नहीं आई। इसे मापने के लिए उसका वजन भी किया जाता है। काउंसलर आउटरीच एक्टिविटी के तहत एचआईवी एड्स के पीड़ितों के घर जाकर उसके रहन-सहन के बारे में जानकारी भी लेता है। जरूरत पड़ने पर पीड़ित परिवार के सदस्यों का भी काउंसलिंग की जाती है ताकि मरीज खुद को अकेला महसूस ना करें।


पाया जा सकता है बीमारी पर काबू
आईसीटीसी विभाग के अनुसार, यदि एचआईवी से पीड़ित मरीज समय से दवा की खुराक और संतुलित आहार ले तो एड्स होने का खतरा पूरी तरह नगण्य हो जाता हैं। साथ ही मरीजों के लिए जरूरी है कि वह आईसीटीसी आकर समय-समय पर खुद की काउंसलिंग भी कराते रहें।


एचआईवी से एड्स तक हैं तीन अवस्थाएं
आईसीटीसी के अनुसार, एड्स की बीमारी होने तक यह तीन अवस्था से गुजरता है। इनमें पहला एचआईवी संक्रमण, दूसरा को-इंफेक्टेड तथा तीसरी अवस्था एड्स है। को-इंफेक्टेड में वे मरीज आते हैं जिन्हें एड्स तथा टीबी दोनों होती है।

को-इंफेक्टेड मरीजों में जिन्हें टीबी की बीमारी थी उनमें 22 मरीज अब पूरी तरह ठीक हो चुके हैं। हालांकि इन मरीजों को दवा जीवनपर्यंत खानी होगी। जबकि जिले में कुल 122 मरीज एड्स के हैं जिन्हें नियमित रूप से आईसीटीसी की ओर से नियमित खुराक खिलाया जा रहा है।  


झोलाछाप से दूर रहें पीड़ित
जो मरीज एचआईवी और एड्स से पीड़ित हैं वह झोलाछाप डाक्टरों से पूरी तरह दूर रहें। उसके बहकावे ना आएं। किसी तरह की आशंका होने पर वह तुरंत सामान्य अस्पताल के आईसीटीसी विभाग में आकर अपनी जांच कराएं। जहां मरीजों की जांच पूरी तरह नि:शुल्क की जाती है। ऐसे मरीजों के नाम का खुलासा नहीं किया जाता है।


ग्रेड सी में है सोनीपत
एचआईवी एड्स के मामले में सोनीपत को ग्रेड सी की श्रेणी मेें रखा गया है। यानी एड्स से पीड़ित मरीजों की संख्या के लिहाज से सोनीपत में कम केस सामने आ रहे हैं। वहीं टेस्टिंग के मामले में सोनीपत का आईसीटीसी विभाग को बेहतर स्थान की श्रेणी में रखा गया है।


एचआईवी और एड्स में अंतर
एचआइवी एक वायरस है। इस वायरस की वजह से एड्स गंभीर बीमारी का रूप धारण कर लेती है। एड्स का निदान कुछ रक्त परीक्षणों के आधार पर किया जाता है। किसी व्यक्ति को एड्स होने पर कई तरह के दुष्प्रभाव सामने आते हैं जैसे सामान्य संक्रमण का प्रतिरोध करने की क्षमता शरीर में नहीं रहती।

पीड़ित व्यक्ति बार-बार बीमार पड़ने लगता है और निरंतर कमजोर होता जाता है। पीड़ित आसानी से संक्रमित होने लगता है। किसी भी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति में प्रतिरक्षण प्रणाली कमजोर होने की वजह संक्रमण फैलने का खतरा अधिक रहता है।

कैसे फैलता है एचआईवी
एचआईवी चार प्रमुख कारणों से फैलता है। इनमें असुरक्षित यौन संबंध, एचआईवी संक्रमित रक्त या रक्त उत्पादन चढ़वाने से, संक्रमित सुई के इस्तेमाल से और एचआईवी संक्रमित माता-पिता के शिशु को।

एड्स किस तरह नहीं फैलता
एचआईवी साधारण संपर्क से नहीं फैलता। जैसे छूने, हाथ पकड़ने, भीड़ में शरीर सटने, हाथ मिलाने, साथ खेलने या कार्य करने, एक बर्तन में खाना खाने या उनके कपड़े पहनने, या शौचालय का इस्तेमाल करने से।

पीड़ित मरीजों को ना देखें हेय दृष्टि से
यदि लोग जागरूक रहें तो एड्स जैसे गंभीर बीमारी पर आसानी से काबू पाया जा सकता है। किसी भी एड्स पीड़ित को को हेय दृष्टि से ना देखें। ऐसे मरीजों को समाज से जोड़ें ना कि नफरत करें। उनके बच्चों का पालन पोषण और शिक्षा आदि पर सरकारी और गैरसरकारी संस्थाएं दें। ऐसे मरीजों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए सभी आगे आएं ताकि उन्हें पीड़ित खुद को अकेला महसूस ना करें। पीड़ित मरीजों का बेहतर उपचार किया जाता है। मरीजों को बेहतर काउंसलिंग के जरिए सम्मान के साथ जीने के लिए प्रेरित किया जाता है।
-डॉ. राज सिंह सांगवान, आइसीटीसी, सामान्य अस्पताल

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