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कथूरा के तालाब में मिली प्राचीन दीवार, राजपूत कालीन होने का अंदेशा
ब्यूरो अमर उजाला सोनीपत
Updated Fri, 28 Apr 2017 12:18 AM IST
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खुदाई के दौरान निकली ईंट दिखाते हुए ग्रामीण।
- फोटो : amarujala beuro
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गांव कथूरा के एक तालाब की खुदाई के दौरान सैकड़ों साल पुरानी दीवार मिली है। उस दीवार में लगी ईंटों का आकार काफी बड़ा है। इतिहासकारों की मानें तो ये ईंटें राजपूत काल की हो सकती है।
राजपूत काल को इतिहास की दृष्टि से पूर्व मध्यकाल की श्रेणी में रखा गया है। गांव कथूरा के बसने की कहानी भी पूर्व मध्यकाल के आसपास ही शुरू होती है। हालांकि इसके कोई प्रमाण नहीं हैं, लेकिन प्राचीन दीवार मिलने के बाद गांव के इतिहास को प्रमाणिकता मिल रही है। लोगों का कहना है कि अगर इस तालाब की खुदाई पुरातत्व विभाग करे तो इतिहास से जुड़ी काफी बातें सामने आ सकती हैं।
घूमने गए लोगों की पड़ी नजर
ग्रामीण पालेराम व अनिल कुमार ने बताया कि कथूरा गांव के खेतों में बने ढ़ीसर नाम के तालाब को खुदाई के लिए इन दिनों खाली करवाया गया है। पानी सूखने के वजह से तालाब का तल दिखाई देने लगा था। वह दोनों घूमने गए तो उनकी नजर वहां पड़ी ईंटों पर गई। इतिहास में रुचि की वजह से अगले दिन उसकी खुदाई करने की सोची। खुदाई के बाद काफी चौड़ी दीवार दिखाई दी और इसमें लगी ईंटों के आकार को देखकर ऐसा लग रहा था कि वह काफी पुरानी हो सकती हैं।
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इतिहासकारों ने मुआयना किया
एमडीयू के इतिहास विभाग के विकास पंवार व संस्कृतिविद् रणबीर फोगाट ने तालाब का मुआयना किया। उनका कहना है कि दीवार में प्रयोग होने वाली ईंट की लंबाई लगभग 16 सेमी व चौड़ाई लगभग नौ सेमी व ऊंचाई तीन सेमी तक है। इस तरह की ईंटे राजपूत काल के आसपास प्रयोग होती थीं। खुदाई के बाद ही सही तरीके से किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
किला होने के किस्से सुने हैं : रामधन
बुजुर्ग रामधन ने बताया कि खेतों में कोई किला होने के किस्से कई बार बचपन में सुने थे। खेतों से मिट्टी उठाते वक्त कई बार इस तरह की दीवार बीच में आईं। इसके अलावा मिट्टी के टूटे हुए बर्तन भी मिलें, लेकिन लोगों ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया और वह अवशेष खुर्द-बुर्द हो गए। अगर इस तालाब की खुदाई की जाए तो ऐतिहासिक चीजें यहां से निकल सकती हैं।
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राजपूत काल को इतिहास की दृष्टि से पूर्व मध्यकाल की श्रेणी में रखा गया है। गांव कथूरा के बसने की कहानी भी पूर्व मध्यकाल के आसपास ही शुरू होती है। हालांकि इसके कोई प्रमाण नहीं हैं, लेकिन प्राचीन दीवार मिलने के बाद गांव के इतिहास को प्रमाणिकता मिल रही है। लोगों का कहना है कि अगर इस तालाब की खुदाई पुरातत्व विभाग करे तो इतिहास से जुड़ी काफी बातें सामने आ सकती हैं।
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घूमने गए लोगों की पड़ी नजर
ग्रामीण पालेराम व अनिल कुमार ने बताया कि कथूरा गांव के खेतों में बने ढ़ीसर नाम के तालाब को खुदाई के लिए इन दिनों खाली करवाया गया है। पानी सूखने के वजह से तालाब का तल दिखाई देने लगा था। वह दोनों घूमने गए तो उनकी नजर वहां पड़ी ईंटों पर गई। इतिहास में रुचि की वजह से अगले दिन उसकी खुदाई करने की सोची। खुदाई के बाद काफी चौड़ी दीवार दिखाई दी और इसमें लगी ईंटों के आकार को देखकर ऐसा लग रहा था कि वह काफी पुरानी हो सकती हैं।
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इतिहासकारों ने मुआयना किया
एमडीयू के इतिहास विभाग के विकास पंवार व संस्कृतिविद् रणबीर फोगाट ने तालाब का मुआयना किया। उनका कहना है कि दीवार में प्रयोग होने वाली ईंट की लंबाई लगभग 16 सेमी व चौड़ाई लगभग नौ सेमी व ऊंचाई तीन सेमी तक है। इस तरह की ईंटे राजपूत काल के आसपास प्रयोग होती थीं। खुदाई के बाद ही सही तरीके से किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
किला होने के किस्से सुने हैं : रामधन
बुजुर्ग रामधन ने बताया कि खेतों में कोई किला होने के किस्से कई बार बचपन में सुने थे। खेतों से मिट्टी उठाते वक्त कई बार इस तरह की दीवार बीच में आईं। इसके अलावा मिट्टी के टूटे हुए बर्तन भी मिलें, लेकिन लोगों ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया और वह अवशेष खुर्द-बुर्द हो गए। अगर इस तालाब की खुदाई की जाए तो ऐतिहासिक चीजें यहां से निकल सकती हैं।