आंदोलन को मिली संजीवनी तो किसान नेता बोले- अब सरकार से बातचीत का रास्ता खोलने की बनेगी रणनीति
गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में बवाल व लाल किला पर धार्मिक झंडा फहराए जाने के बाद टूटने लगे किसान आंदोलन को बड़ी संजीवनी मिल गई है और आंदोलन दोबारा से पहले की तरह खड़ा हो गया है।
जहां किसान नेता गणतंत्र दिवस के बाद से आंदोलन को बचाने के लिए जूझ रहे थे, वहीं अब सरकार से बातचीत का रास्ता खोलने की रणनीति बनाई जा रही है। क्योंकि किसानों व सरकार के बीच लगातार चल रहा बातचीत का सिलसिला पहली बार इतने ज्यादा दिनों तक टूटा है।
यह सिलसिला दोबारा शुरू करने के लिए किसान नेता दोबारा से आंदोलन तेज करने की रणनीति बना रहे है। हालांकि इस बार यह विशेष ध्यान रखा जाएगा कि आंदोलन में ऐसा कुछ भी न हो, जिससे किसानों पर किसी तरह का सवाल खड़ा करने का मौका सरकार को मिले।
वहीं किसान नेताओं ने यह भी साफ कर दिया है कि उनकी तरफ से बातचीत का रास्ता कभी बंद नहीं हुआ है और उनको सरकार का प्रस्ताव मिलता है तो वह बातचीत के लिए जरूर जाएंगे।
कृषि कानून रद्द कराने के लिए पिछले 65 दिनों से किसान सड़कों पर डटे हुए हैं। इस बीच किसानों व सरकार के बीच 11 दौर की बातचीत हो चुकी है। एक बार गृह मंत्री अमित शाह के साथ भी बातचीत हुई थी। किसानों व सरकार के बीच बातचीत में भले ही कोई हल नहीं निकला हो लेकिन यह जरूर है कि इनके बीच बैठक का दौर लगातार जारी था।
किसानों व सरकार के बीच आखिरी बैठक 22 जनवरी को हुई थी और पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकार व किसानों के बीच इतने दिन तक कोई बैठक नहीं हुई है। इसका एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में बवाल व लाल किला पर धार्मिक झंडा फहराने के बाद से टूटते हुए आंदोलन में किसान नेता डैमेज कंट्रोल के लिए जुटे थे और उनको आंदोलन की अगली रणनीति तक बदलनी पड़ी।
किसानों को लगता था कि डैमेज कंट्रोल से पहले कोई रणनीति बनाई गई तो उससे आंदोलन को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है और सरकार फायदा भी उठा सकती है। इसलिए ही किसानों ने भावनात्मक अपील करते हुए सबसे पहले आंदोलन में डैमेज कंट्रोल किया और अब आंदोलन को संजीवनी मिलने से वह दोबारा पहले की तरह खड़ा हो गया है। इसके बावजूद सरकार की तरफ से बातचीत का रास्ता अभी तक नहीं खुला है और किसान नेताओं की अगली रणनीति यही है कि सरकार से बातचीत का रास्ता खोला जाए। क्योंकि किसान नेता भी जानते है कि बातचीत के सहारे ही कोई हल निकल सकता है।
किसान नेताओं के अनुसार इस बातचीत को दोबारा शुरू कराने के लिए सरकार पर दबाव बनाना भी जरूरी है और इसके लिए ही जल्द आंदोलन को तेज करने के लिए रणनीति की घोषणा की जाएगी। यह जरूर है कि किसान नेताओं को अब आंदोलन को काफी संभलकर आगे बढ़ाना होगा, जिससे दोबारा गणतंत्र दिवस वाली स्थिति नहीं हो सके।
हरियाणा, यूपी और पंजाब के भाईचारे पर ज्यादा जोर
किसान आंदोलन में गणतंत्र दिवस से पहले तक जहां पंजाब का ज्यादा दबदबा दिखता था और पंजाब के किसान नेताओं के फैसले ज्यादा चलते थे। वहीं अब हालात कुछ जुदा दिखाई देते है। आंदोलन को दोबारा खड़ा करने में यूपी व हरियाणा के किसानों को अहम माना जा रहा है और इसलिए ही हरियाणा, यूपी व पंजाब के भाईचारे पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
हरियाणा व यूपी के किसान नेताओं के फैसलों को बराबर की अहमियत मिल रही है। वहीं पंजाब के किसान नेता अपने भाषणों में हरियाणा के किसानों व खापों का जिक्र जरूर करते है तो यूपी के किसानों की तारीफ भी खूब की जाती है। इस तरह से आंदोलन का पूरा माहौल बदला हुआ है।
सरकार ने जब भी बातचीत का प्रस्ताव दिया है, हम तभी बातचीत के लिए गए है। हमारी तरफ से पहले भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं था और अब भी रास्ता हमने बंद नहीं किया है। सरकार से बातचीत का प्रस्ताव मिलता है तो उसके लिए जरूर जाएंगे। यह जरूर है कि हमारी मांग कृषि कानून रद्द कराने के साथ ही एमएसपी की गारंटी को लेकर रहेगी। जिस तरह से हरियाणा, यूपी व पंजाब के किसान आ रहे है, उससे आंदोलन पहले के मुकाबले काफी बड़ा हो गया है। आंदोलन को तेज करने की रणनीति भी बनाई जा रही है। - गुरनाम सिंह चढूनी, अध्यक्ष भाकियू हरियाणा।
सरकार का ध्यान हमेशा किसानों की समस्या का समाधान करने की जगह केवल इस बात पर रहा कि आंदोलन को कैसे तोड़ा जाए। इसलिए सरकार के लोगों ने ट्रैक्टर रैली में बवाल कराया लेकिन किसान अब सरकार की चाल को समझ गए हैं और आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए रोजाना हजारों ट्रैक्टर पहुंच रहे हैं। हमारा आंदोलन शांतिपूर्ण था और आगे भी शांतिपूर्ण ही रहेगा। संयुक्त किसान मोर्चा जल्द ही आंदोलन की अगली रणनीति तय करेगा। सरकार से बातचीत का प्रस्ताव मिलेगा तो हम जरूर जाएंगे। बलबीर सिंह राजेवाल, अध्यक्ष भाकियू राजेवाल।