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Sonipat News: विद्यार्थियों से साइकिल लेकर उन्हें बैठाकर किया था अयोध्या में प्रवेश
Wed, 17 Jan 2024 11:48 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, सोनीपत
Updated Wed, 17 Jan 2024 11:48 PM IST
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गोहाना में वर्ष 1990 में अयोध्या से वापस लौटे कार सेवक सतीश गुप्ता को पटका पहनाकर सम्मानित करते
सोनीपत। वर्ष 1990 में अयोध्या में हुए आंदोलन के दौरान सोनीपत से गए बड़ी संख्या में कारसेवकों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा था। कुछ लोग रास्ते में गिरफ्तार कर लिए गए थे जो बचे वह पैदल, बैलगाड़ियों में घास-फूस के बीच और ईंटों से भरी ट्रालियों में लेटकर सरयू तक पहुंचे थे। रामलला के दर्शन की लालसा इतनी अधिक थी कि न भूख-प्यास का पता था, ना थकावट का नामो-निशान था। झंडा लहराने के संकल्प के साथ आगे बढ़े तो पुलिस की लाठियों व गोलियों का सामना करना पड़ा। ये संस्मरण गोहाना निवासी मेडिकल स्टोर संचालक सतीश गुप्ता ने साझा किए।
सतीश गुप्ता ने बताया कि अक्तूबर 1990 में गोहाना से 20 कारसेवक अयोध्या के लिए रवाना हुए थे। सभी को अपने साथ गुड़, चना, कपड़े और लोटा लेकर जाने के निर्देश दिए गए थे, ताकि पकड़े जाने या जंगल के रास्ते जाते समय भूख-प्यास से बच सकें। यह सामान छिपाकर रखने के निर्देश थे। वह सोनीपत होते हुए दिल्ली गए। जहां ट्रेन में सवार होकर अयोध्या के लिए रवाना हुए। कानपुर पहुंचने पर पुलिस की जांच का सामना करना पड़ा। कुछ साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। हम सभी वहां से बचकर निकल गए और दूसरी ट्रेन से लखनऊ पहुंचे। जहां पहले से करीब 20-25 कार्यकर्ता मौजूद थे।
बताया कि 25 अक्तूबर 1990 को रात 2:30 बजे वह लखनऊ पहुंचे थे। तय किया गया कि सुबह प्रदर्शन करते हुए सभी अपनी गिरफ्तारियां देंगे। हमें गिरफ्तारी मंजूर नहीं थी। छह सदस्यों ने निर्णय किया कि रामलला के दर्शन करने आए हैं तो दर्शन करके ही जाएंगे। इसलिए वहां से निकल गए। किसी ने बताया कि अभी वापसी जाने वाली ट्रेन आ रही है। शाहजहांपुर के पास चेन पुलिंग कर उतारना पड़ेगा। वह ट्रेन अयोध्या नहीं रुकेगी। हम उस ट्रेन में चढ़ गए और शाहजहांपुर के पास उतर गए। जहां से अयोध्या करीब 70 किलोमीटर थी। यह रास्ता पैदल तो घास-फूस लेकर जाने वाली बैलगाड़ियों व ईंटों से भरी ट्रालियों में लेटकर पूरा किया। रास्ते में जो भी गांव आता, वहां के ग्रामीण कारसेवक बताने पर पूरा सम्मान व खाना-पीना देते थे। संवाद
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सरयू के पुल पर पहुंचने पर खड़े हो गए थे रोंगटे
सतीश गुप्ता ने बताया कि सरयू के किनारे पहुंचने पर वहां का मंजर रोंगटे खड़ा करने वाला था। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। काफी कारसेवक पुल से नदी में कूद गए थे। हम भी बचते हुए आगे बढ़े। 30 अक्तूबर की दोपहर को स्कूल की छुट्टी होने पर घर जा रहे विद्यार्थियों को समझाकर उनकी साइकिल ली। उन्हें साइकिल पर बैठाकर अयोध्या में प्रवेश किया। पुलिस ने स्थानीय निवासी समझ जाने दिया। वहां से निर्माणी अखाड़ा पहुंचे, जहां भारी संख्या में कारसेवक मौजूद थे।
झंडा फहराने के संकल्प के साथ बढ़े आगे
सभी कारसेवकों को पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण क्षेत्र के अनुसार चार भागों में बांट दिया। सभी ने संकल्प लिया कि हर हाल में विवादित गुंबद पर झंडा फहराना है। सबसे आगे पंजाब, फिर हरियाणा और पीछे दिल्ली के कारसेवक थे। पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया और फिर गोलियां चलाईं। हम बचने के लिए जमीन पर लेट गए। काफी कारसेवक मारे गए थे। हालांकि बाद में मामला शांत हुआ। मारे गए कारसेवकों का अंतिम संस्कार करने के निर्देश मिले। हमने करीब 28 के अंतिम संस्कार किया। 4 नवंबर को सभी को दर्शन करवाए गए। इसके बाद कार सेवकों को वापस भेजने के लिए ट्रेनें निशुल्क करवा दीं गई थी और हम लौट आए।
गोहाना में हुआ भव्य स्वागत
सतीशा गुप्ता बताते हैं कि अयोध्या से वापस लौटने पर सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। सभी कारसेवकों का मंच पर पटका पहनाकर भव्य स्वागत किया गया। वह बताते हैं कि उन दिनों का मंजर याद कर आज भी जोश भर जाता है।
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सतीश गुप्ता ने बताया कि अक्तूबर 1990 में गोहाना से 20 कारसेवक अयोध्या के लिए रवाना हुए थे। सभी को अपने साथ गुड़, चना, कपड़े और लोटा लेकर जाने के निर्देश दिए गए थे, ताकि पकड़े जाने या जंगल के रास्ते जाते समय भूख-प्यास से बच सकें। यह सामान छिपाकर रखने के निर्देश थे। वह सोनीपत होते हुए दिल्ली गए। जहां ट्रेन में सवार होकर अयोध्या के लिए रवाना हुए। कानपुर पहुंचने पर पुलिस की जांच का सामना करना पड़ा। कुछ साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। हम सभी वहां से बचकर निकल गए और दूसरी ट्रेन से लखनऊ पहुंचे। जहां पहले से करीब 20-25 कार्यकर्ता मौजूद थे।
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बताया कि 25 अक्तूबर 1990 को रात 2:30 बजे वह लखनऊ पहुंचे थे। तय किया गया कि सुबह प्रदर्शन करते हुए सभी अपनी गिरफ्तारियां देंगे। हमें गिरफ्तारी मंजूर नहीं थी। छह सदस्यों ने निर्णय किया कि रामलला के दर्शन करने आए हैं तो दर्शन करके ही जाएंगे। इसलिए वहां से निकल गए। किसी ने बताया कि अभी वापसी जाने वाली ट्रेन आ रही है। शाहजहांपुर के पास चेन पुलिंग कर उतारना पड़ेगा। वह ट्रेन अयोध्या नहीं रुकेगी। हम उस ट्रेन में चढ़ गए और शाहजहांपुर के पास उतर गए। जहां से अयोध्या करीब 70 किलोमीटर थी। यह रास्ता पैदल तो घास-फूस लेकर जाने वाली बैलगाड़ियों व ईंटों से भरी ट्रालियों में लेटकर पूरा किया। रास्ते में जो भी गांव आता, वहां के ग्रामीण कारसेवक बताने पर पूरा सम्मान व खाना-पीना देते थे। संवाद
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सरयू के पुल पर पहुंचने पर खड़े हो गए थे रोंगटे
सतीश गुप्ता ने बताया कि सरयू के किनारे पहुंचने पर वहां का मंजर रोंगटे खड़ा करने वाला था। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। काफी कारसेवक पुल से नदी में कूद गए थे। हम भी बचते हुए आगे बढ़े। 30 अक्तूबर की दोपहर को स्कूल की छुट्टी होने पर घर जा रहे विद्यार्थियों को समझाकर उनकी साइकिल ली। उन्हें साइकिल पर बैठाकर अयोध्या में प्रवेश किया। पुलिस ने स्थानीय निवासी समझ जाने दिया। वहां से निर्माणी अखाड़ा पहुंचे, जहां भारी संख्या में कारसेवक मौजूद थे।
झंडा फहराने के संकल्प के साथ बढ़े आगे
सभी कारसेवकों को पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण क्षेत्र के अनुसार चार भागों में बांट दिया। सभी ने संकल्प लिया कि हर हाल में विवादित गुंबद पर झंडा फहराना है। सबसे आगे पंजाब, फिर हरियाणा और पीछे दिल्ली के कारसेवक थे। पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया और फिर गोलियां चलाईं। हम बचने के लिए जमीन पर लेट गए। काफी कारसेवक मारे गए थे। हालांकि बाद में मामला शांत हुआ। मारे गए कारसेवकों का अंतिम संस्कार करने के निर्देश मिले। हमने करीब 28 के अंतिम संस्कार किया। 4 नवंबर को सभी को दर्शन करवाए गए। इसके बाद कार सेवकों को वापस भेजने के लिए ट्रेनें निशुल्क करवा दीं गई थी और हम लौट आए।
गोहाना में हुआ भव्य स्वागत
सतीशा गुप्ता बताते हैं कि अयोध्या से वापस लौटने पर सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। सभी कारसेवकों का मंच पर पटका पहनाकर भव्य स्वागत किया गया। वह बताते हैं कि उन दिनों का मंजर याद कर आज भी जोश भर जाता है।