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अब किसानों के मुद्दे बढ़े, रिहाई व मुकदमे वापसी भी शामिल, बातचीत का रास्ता खुलने में बन रहे बाधा
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अंकित चौहान
सोनीपत। किसान अभी तक कृषि कानून रद्द कराने के साथ ही एमएसपी पर गारंटी के मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में बवाल के बाद किसानों के मुद्दे बढ़ गए हैं, जिनमें दिल्ली में पकड़े गए किसानों की रिहाई व मुकदमों की वापसी के मुद्दे शामिल कर लिए गए हैं। अगर सरकार से बातचीत का कोई प्रस्ताव मिलता है तो उसमें यह दोनों मुद्दे भी शामिल किए जाएंगे और इनको हर जगह उठाया जाएगा। किसान नेताओं का आरोप है कि असली आरोपियों को अभी तक नहीं पकड़ा गया है और किसानों पर मुकदमे दर्ज करके लगातार गिरफ्तारी हो रही है। इसलिए कृषि कानून व एमएसपी के साथ ही यह दोनों मुद्दे भी अहम हो गए है।
किसान आंदोलन में शुरुआत में चार मुद्दों को शामिल किया गया था, जिनमें कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ ही एमएसपी की गारंटी देने और बिजली व पराली जलाने के अधिनियम को निरस्त करना था। इनमें से सरकार ने बिजली व पराली वाले मुद्दों को मान लिया था तो कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ ही एमएसपी की गारंटी के मुद्दे पर लगातार सरकार से बातचीत हो रही थी। इस तरह किसानों के यह दो मुद्दे रह गए थे और इन पर किसी तरह से सहमति बनाने का प्रयास चल रहा था। गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में बवाल के किसानों पर कई थानों में मुकदमे दर्ज किए गए हैं और 100 से ज्यादा किसानों को अभी तक गिरफ्तार किया जा चुका है। उन मुकदमों में सभी किसान नेताओं को नामजद किया गया है तो सैकड़ों अज्ञात किसानों को सभी मुकदमों में शामिल किया गया है। अब इन मुकदमों को खत्म कराने का पूरा प्रयास किया जा रहा है, जिससे इन मुकदमों में गिरफ्तारी का डर किसानों के अंदर से खत्म किया जा सके। इसलिए ही मुकदमों को खत्म व जेल में बंद किसानों को रिहा कराने की मांग को पहले मुद्दों के साथ जोड़ दिया गया है। यह दोनों मुद्दे भी किसानों व सरकार के बीच बातचीत का रास्ता खोलने में बाधा बन सकते हैं। किसान नेताओं ने साफ कह दिया है कि इन मुद्दों को सरकार मानती है तो तभी बातचीत संभव हो सकती है। वहीं सरकार के केवल पुराने मुद्दों को लेकर ही बातचीत का रास्ता खोलने की बात कही जा रही है और इसलिए बातचीत को लेकर कोई फैसला नहीं हो सका है।
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ट्रैक्टर परेड के दौरान जिन लोगों ने बवाल किया था, उनको पुलिस नहीं पकड़ रही है और निर्दोष किसानों को परेशान किया जा रहा है। जिनका उस मामले से कोई मतलब नहीं है, उन पर मुकदमे दर्ज कर लिए गए हैं। किसानों व युवाओं को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है। ऐसे में बातचीत होना संभव नहीं है और सरकार को ऐसे सभी मुकदमे खत्म करने के साथ ही निर्दोष किसानों को रिहा करना चाहिए। सरकार बातचीत करती है तो यह मांग भी पूरी करनी होगी।
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बलबीर सिंह राजेवाल, अध्यक्ष, भाकियू राजेवाल
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किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए दिल्ली में बवाल का सरकार ने षडयंत्र रचा और अब किसानों पर मुकदमे दर्ज करके पकड़ा जा रहा है। इस तरह का उत्पीड़न सहन नहीं किया जाएगा। सरकार के इन षडयंत्र का सभी को पता लग चुका है और इसलिए ही पहले से ज्यादा किसान आंदोलन में शामिल हो रहे है। अब सरकार बातचीत करना चाहती है तो किसानों का उत्पीडन बंद करना पड़ेगा। अगर सरकार इसके लिए तैयार नहीं है तो ऐसे माहौल में बातचीत संभव नहीं है।
अभिमन्यु कोहाड़, सदस्य, संयुक्त किसान मोर्चा
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सोनीपत। किसान अभी तक कृषि कानून रद्द कराने के साथ ही एमएसपी पर गारंटी के मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में बवाल के बाद किसानों के मुद्दे बढ़ गए हैं, जिनमें दिल्ली में पकड़े गए किसानों की रिहाई व मुकदमों की वापसी के मुद्दे शामिल कर लिए गए हैं। अगर सरकार से बातचीत का कोई प्रस्ताव मिलता है तो उसमें यह दोनों मुद्दे भी शामिल किए जाएंगे और इनको हर जगह उठाया जाएगा। किसान नेताओं का आरोप है कि असली आरोपियों को अभी तक नहीं पकड़ा गया है और किसानों पर मुकदमे दर्ज करके लगातार गिरफ्तारी हो रही है। इसलिए कृषि कानून व एमएसपी के साथ ही यह दोनों मुद्दे भी अहम हो गए है।
किसान आंदोलन में शुरुआत में चार मुद्दों को शामिल किया गया था, जिनमें कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ ही एमएसपी की गारंटी देने और बिजली व पराली जलाने के अधिनियम को निरस्त करना था। इनमें से सरकार ने बिजली व पराली वाले मुद्दों को मान लिया था तो कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ ही एमएसपी की गारंटी के मुद्दे पर लगातार सरकार से बातचीत हो रही थी। इस तरह किसानों के यह दो मुद्दे रह गए थे और इन पर किसी तरह से सहमति बनाने का प्रयास चल रहा था। गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में बवाल के किसानों पर कई थानों में मुकदमे दर्ज किए गए हैं और 100 से ज्यादा किसानों को अभी तक गिरफ्तार किया जा चुका है। उन मुकदमों में सभी किसान नेताओं को नामजद किया गया है तो सैकड़ों अज्ञात किसानों को सभी मुकदमों में शामिल किया गया है। अब इन मुकदमों को खत्म कराने का पूरा प्रयास किया जा रहा है, जिससे इन मुकदमों में गिरफ्तारी का डर किसानों के अंदर से खत्म किया जा सके। इसलिए ही मुकदमों को खत्म व जेल में बंद किसानों को रिहा कराने की मांग को पहले मुद्दों के साथ जोड़ दिया गया है। यह दोनों मुद्दे भी किसानों व सरकार के बीच बातचीत का रास्ता खोलने में बाधा बन सकते हैं। किसान नेताओं ने साफ कह दिया है कि इन मुद्दों को सरकार मानती है तो तभी बातचीत संभव हो सकती है। वहीं सरकार के केवल पुराने मुद्दों को लेकर ही बातचीत का रास्ता खोलने की बात कही जा रही है और इसलिए बातचीत को लेकर कोई फैसला नहीं हो सका है।
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ट्रैक्टर परेड के दौरान जिन लोगों ने बवाल किया था, उनको पुलिस नहीं पकड़ रही है और निर्दोष किसानों को परेशान किया जा रहा है। जिनका उस मामले से कोई मतलब नहीं है, उन पर मुकदमे दर्ज कर लिए गए हैं। किसानों व युवाओं को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है। ऐसे में बातचीत होना संभव नहीं है और सरकार को ऐसे सभी मुकदमे खत्म करने के साथ ही निर्दोष किसानों को रिहा करना चाहिए। सरकार बातचीत करती है तो यह मांग भी पूरी करनी होगी।
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बलबीर सिंह राजेवाल, अध्यक्ष, भाकियू राजेवाल
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किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए दिल्ली में बवाल का सरकार ने षडयंत्र रचा और अब किसानों पर मुकदमे दर्ज करके पकड़ा जा रहा है। इस तरह का उत्पीड़न सहन नहीं किया जाएगा। सरकार के इन षडयंत्र का सभी को पता लग चुका है और इसलिए ही पहले से ज्यादा किसान आंदोलन में शामिल हो रहे है। अब सरकार बातचीत करना चाहती है तो किसानों का उत्पीडन बंद करना पड़ेगा। अगर सरकार इसके लिए तैयार नहीं है तो ऐसे माहौल में बातचीत संभव नहीं है।
अभिमन्यु कोहाड़, सदस्य, संयुक्त किसान मोर्चा