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Sonipat News: वैश्विक रैंकिंग में भारत की धाक जमाने पर मंथन, शोध की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर
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-निफ्टम कुंडली में कार्यशाला के दौरान क्यूएस इंडिया के चेयरमैन ने बताए विश्वविद्यालयों की रैंकिंग सुधारने के सूत्र- विश्वसनीय आंकड़ों और अकादमिक प्रतिष्ठा को बताया अहम
फोटो :45: सोनीपत के कुंडली स्थित निफ्टम संस्थान में वैश्विक रैंकिंग में सुधार को आयोजित कार्यशाला में उपस्थित क्यूएस इंडिया के चेयरमैन डॉ. अश्विन फर्नांडिस व निफ्टम के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय तथा अन्य। स्रोत प्रवक्ता
फोटो :46: सोनीपत के कुंडली स्थित निफ्टम संस्थान में वैश्विक रैंकिंग में सुधार को आयोजित कार्यशाला में
क्यूएस इंडिया के चेयरमैन डॉ. अश्विन फर्नांडिस का स्वागत करते निफ्टम के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय। स्रोत प्रवक्ता
संवाद न्यूज एजेंसी
सोनीपत। दुनिया के अग्रणी विश्वविद्यालयों की सूची में भारतीय शिक्षण संस्थानों की मजबूत उपस्थिति कैसे सुनिश्चित हो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान कैसे बढ़े, इसी विषय पर निफ्टम कुंडली में विशेषज्ञों ने मंथन किया। राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं प्रबंधन संस्थान (निफ्टम) में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में शोध की गुणवत्ता, अकादमिक प्रतिष्ठा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को वैश्विक रैंकिंग में बेहतर स्थान हासिल करने के प्रमुख आधार बताया गया। क्यूएस इंडिया के चेयरमैन डॉ. अश्विन फर्नांडिस ने विश्वविद्यालयों को अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग के मानदंडों और संस्थागत तैयारियों की जानकारी दी।
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बेहतर शिक्षण के साथ गुणवत्तापूर्ण शोध भी जरूरी
कार्यशाला का विषय ‘क्यूएस रैंकिंग और वैश्विक विश्वविद्यालय पहचान : रैंकिंग प्रणाली, संस्थागत तैयारियां और उत्कृष्टता की रणनीतियां’ रहा। डॉ. अश्विन फर्नांडिस ने रैंकिंग की प्रक्रिया, संस्थानों की पात्रता, पंजीकरण और आवश्यक आंकड़ों को तैयार करने व प्रस्तुत करने के तरीकों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वैश्विक पहचान के लिए केवल बेहतर शिक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि शोध की गुणवत्ता और उसके प्रभाव को भी मजबूत करना जरूरी है।
शोधपत्रों के उद्धरण और अकादमिक प्रतिष्ठा की अहम भूमिका
चर्चा में शोधपत्रों के उद्धरण, शिक्षाविदों के बीच संस्थान की प्रतिष्ठा, नियोक्ताओं के बीच साख और विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग को महत्वपूर्ण मानदंडों के रूप में रेखांकित किया गया। प्रतिभागियों ने इस बात पर भी विचार किया कि भारतीय विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति बेहतर करने के लिए किन क्षेत्रों में सुधार कर सकते हैं।
विश्वसनीय आंकड़ों और विभागीय समन्वय पर जोर
निफ्टम कुंडली के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय ने संस्थागत गुणवत्ता, शोध उत्कृष्टता, पारदर्शी मूल्यांकन और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। कार्यशाला में विश्वसनीय आंकड़ों के प्रबंधन, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने पर भी जोर दिया गया।
कार्यशाला में दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा के सरकारी एवं निजी विश्वविद्यालयों के अधिष्ठाता, कुलसचिव, निदेशक, आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के प्रमुख, संकाय सदस्य और शिक्षाविद शामिल हुए। प्रतिभागियों ने रैंकिंग से जुड़ी चुनौतियों पर विचार साझा किए और संस्थानों के प्रदर्शन में सुधार की संभावनाओं पर चर्चा की।
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फोटो :45: सोनीपत के कुंडली स्थित निफ्टम संस्थान में वैश्विक रैंकिंग में सुधार को आयोजित कार्यशाला में उपस्थित क्यूएस इंडिया के चेयरमैन डॉ. अश्विन फर्नांडिस व निफ्टम के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय तथा अन्य। स्रोत प्रवक्ता
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फोटो :46: सोनीपत के कुंडली स्थित निफ्टम संस्थान में वैश्विक रैंकिंग में सुधार को आयोजित कार्यशाला में
क्यूएस इंडिया के चेयरमैन डॉ. अश्विन फर्नांडिस का स्वागत करते निफ्टम के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय। स्रोत प्रवक्ता
संवाद न्यूज एजेंसी
सोनीपत। दुनिया के अग्रणी विश्वविद्यालयों की सूची में भारतीय शिक्षण संस्थानों की मजबूत उपस्थिति कैसे सुनिश्चित हो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान कैसे बढ़े, इसी विषय पर निफ्टम कुंडली में विशेषज्ञों ने मंथन किया। राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं प्रबंधन संस्थान (निफ्टम) में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में शोध की गुणवत्ता, अकादमिक प्रतिष्ठा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को वैश्विक रैंकिंग में बेहतर स्थान हासिल करने के प्रमुख आधार बताया गया। क्यूएस इंडिया के चेयरमैन डॉ. अश्विन फर्नांडिस ने विश्वविद्यालयों को अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग के मानदंडों और संस्थागत तैयारियों की जानकारी दी।
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बेहतर शिक्षण के साथ गुणवत्तापूर्ण शोध भी जरूरी
कार्यशाला का विषय ‘क्यूएस रैंकिंग और वैश्विक विश्वविद्यालय पहचान : रैंकिंग प्रणाली, संस्थागत तैयारियां और उत्कृष्टता की रणनीतियां’ रहा। डॉ. अश्विन फर्नांडिस ने रैंकिंग की प्रक्रिया, संस्थानों की पात्रता, पंजीकरण और आवश्यक आंकड़ों को तैयार करने व प्रस्तुत करने के तरीकों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वैश्विक पहचान के लिए केवल बेहतर शिक्षण पर्याप्त नहीं है, बल्कि शोध की गुणवत्ता और उसके प्रभाव को भी मजबूत करना जरूरी है।
शोधपत्रों के उद्धरण और अकादमिक प्रतिष्ठा की अहम भूमिका
चर्चा में शोधपत्रों के उद्धरण, शिक्षाविदों के बीच संस्थान की प्रतिष्ठा, नियोक्ताओं के बीच साख और विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग को महत्वपूर्ण मानदंडों के रूप में रेखांकित किया गया। प्रतिभागियों ने इस बात पर भी विचार किया कि भारतीय विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति बेहतर करने के लिए किन क्षेत्रों में सुधार कर सकते हैं।
विश्वसनीय आंकड़ों और विभागीय समन्वय पर जोर
निफ्टम कुंडली के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबेरॉय ने संस्थागत गुणवत्ता, शोध उत्कृष्टता, पारदर्शी मूल्यांकन और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। कार्यशाला में विश्वसनीय आंकड़ों के प्रबंधन, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने पर भी जोर दिया गया।
कार्यशाला में दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा के सरकारी एवं निजी विश्वविद्यालयों के अधिष्ठाता, कुलसचिव, निदेशक, आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के प्रमुख, संकाय सदस्य और शिक्षाविद शामिल हुए। प्रतिभागियों ने रैंकिंग से जुड़ी चुनौतियों पर विचार साझा किए और संस्थानों के प्रदर्शन में सुधार की संभावनाओं पर चर्चा की।