पेपर सॉल्वर गैंग: कंप्यूटरों को डबल स्क्रीन चलाकर हल करते थे परीक्षा पत्र, ऐसे चलता था सारा खेल
आराेपी वर्ष 2009 में दिल्ली पुलिस में भर्ती हुआ था, उसने पैसे अधिक कमाने के लिए यह रास्ता चुना।
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पेपर सॉल्वर गैंग की तकनीकी टीम बेहद शातिराना तरीके से पूरे काम को अंजाम देती थी। आरोपी लैब में कंप्यूटरों को डबल स्क्रीन चलाते थे। दूसरी स्क्रीन परीक्षार्थी की होती थी, जिसे हैक किया जाता था। यहीं से सॉल्वर टीम का काम शुरू हो जाता था। आरोपियों ने अलग-अलग राज्यों में अपनी लैब बना रखी थीं। वह कई तरह के पेपर सॉल्व कराते थे।
केंद्र व राज्य सरकारों की तरफ से ली जानी वाली परीक्षा के दौरान आवेदक को बैठे रहना होता था। बाकी काम सॉल्वर टीम करती थी। खास बात यह है कि आवेदक को बाकायदा समझाया जाता था कि यदि कोई निरीक्षण के लिए आए तो वह निर्धारित प्रश्न पर क्लिक करे।
इस संकेत के बाद प्रश्न पत्र को हल करना बंद कर दिया जाता था। यह जांच शुरुआत में 450 आवेदकों के डाटा पर की गई है, जिससे यह खुलासा हुआ है कि आवेदक महज 15 से 20 मिनट ही काम करता था, जबकि बाकी तीन घंटे वह खाली बैठता था। पूरा काम आरोपियों की टीम करती थी। लॉक्स एक्टीविटी की जांच से पता चला है कि प्रश्न नंबर 10 व प्रश्न 5 पर सबसे ज्यादा बार क्लिक हुए हैं।
अलग-अलग विभागों के पेपर कराते हैं सॉल्व
आरोपी अलग-अलग विभागों के पेपर सॉल्व कराते थे। उसके गैंग में 200 से ज्यादा गुर्गे हैं। वह एक हजार से ज्यादा युवाओं की नौकरी लगवा चुका है। वह एसएससी, एमटीएस, एचएसएल, सीजीएल, आरपीएफ, वन विभाग, यूजीसी नेट, जेईई, आरबीआई, एसबीआई, एम्स पीजी, दिल्ली फोरेस्ट गार्ड, बैंक प्रमोशन आईडीबीआई समेत अन्य विभागों के पेपर सॉल्व कराता था।
रैकेट से जुड़े आवेदक के होते थे 99 प्रतिशत से ज्यादा अंक
जांच में सामने आया कि रैकेट शुरू करने के साथ ही आरोपियों के रडार पर कोचिंग सेंटर होते थे। वह ऐसे आवेदकों को ढूंढते थे, जिनके 50 से 60 प्रतिशत तक अंक होते थे। अब मोटी रकम लेकर आरोपी उन्हें 99 प्रतिशत अंक दिलाने का भरोसा देते थे। जो आवेदक सहमत हो जाते थे, उन्हें अपने रैकेट से जोड़ लेते थे और पद के हिसाब से 2 लाख से 10 लाख रुपये वसूलते थे। रैकेट ऐसी एक हजार से अधिक नौकरियां लगवा चुका है, जिनको फर्जी तरीके से 99 प्रतिशत से ज्यादा अंक प्राप्त हुए थे। एसटीएफ ऐसे लोगों की भी सूची तैयार कर रही है, जो फर्जी तरीके से परीक्षा पास कर नौकरी लग चुके हैं।
मोहाली की लैब का देते थे साढ़े 7 लाख रुपये प्रति माह किराया
पता लगा कि आरोपियों ने मोहाली की लैब को मास्टर लैब बनाया था। एसटीएफ ने बताया कि इस लैब का किराया 7 लाख 51 हजार रुपये प्रति माह दिया जाता था। यहां सबसे ज्यादा कंप्यूटर रखे गए थे। वहीं रैकेट द्वारा किराये पर ली गई हर लैब की क्षमता 200 से 450 परीक्षार्थियों तक के लिए होती थी। एक कॉलेज में बनी लैब के रिकॉर्ड की जांच की गई तो वहां आरोपी की एंट्री 200 बार मिली है, जिससे शक पुख्ता हुआ और आरोपी तक पुलिस पहुंच गई।
इन स्थानों पर है आरोपियों की लैब
एसटीएफ ने बताया है कि 2013 में कई राज्यों में आरोपियों ने लैब स्थापित कर दी थीं। इनमें हरियाणा (सोनीपत, गोहाना, मुरथल आईआईटीएम, एसबीआईटी एसपीटी, गन्नौर, पानीपत, समालखा, कुरुक्षेत्र), मोहाली (पंजाब), देहरादून, महाराष्ट्र, जयपुर राजस्थान, उत्तर प्रदेश और कई शैक्षणिक संस्थानों में कई परीक्षा प्रयोगशालाएं हैं। उसने अपने पेपर लीक गैंग को बड़े ही सुनियोजित तरीके से ऑपरेट कर रखा था।
राजनेताओं के कार्यक्रमों में भी शामिल होता था आरोपी
आरोपी राजनीतिक रसूख भी रखता है। वह राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में भी शामिल होता था। साथ ही उसकी पहुंच कई बड़े नेताओं तक बताई गई है। इतना ही नहीं आरोपी शासन को पत्र भेजकर पेपर लीक मामले में खुद को फंसाए जाने का शक भी जता चुका है।
आरोपी ने स्क्रीन हैक करने की ली थी ट्रेनिंग
आरोपी रोबिन वर्ष 2009 में दिल्ली पुलिस में सिपाही के पद पर भर्ती हुआ था। उसके बाद से वह बतौर सिपाही कार्यरत है। एसटीएफ का कहना है कि आरोपी ने शुरुआती पूछताछ में बताया है कि उसने ज्यादा पैसा कमाने की चाहत में यह गड़बड़झाला शुरू किया था। इसके लिए उसने आईआईटी उत्तीर्ण युवकों से कंप्यूटर चलाने व स्क्रीन हैक करने की ट्रेनिंग ली थी। जिसके बाद इसमें संलिप्त हो गया था।
आरोपी ने रंगदारी मांगने का दर्ज कराया था मुकदमा
रोबिन ने 15 जनवरी को सिटी थाने में मुकदमा दर्ज कराया था कि वह वार्ड 3 से जिला पार्षद का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। उससे व्हाट्सएप कॉल कर 25 लाख रुपये रंगदारी मांगी गई है। उसे चुनाव न लड़ने की धमकी दी गई थी। साथ ही चुनाव लड़ने की सूरत में रंगदारी देने को कहा गया था। मामले में पुलिस ने प्रवीण नाम के युवक को गिरफ्तार भी किया था। करीब नौ दिन बाद रोबिन व उसके 40 साथियों पर हमला करने का मुकदमा दर्ज हुआ था। गांव शामड़ी सिसान के देवेंद्र कुमार ने आरोप लगाया था कि उसे बहाने से बुलाकर मारपीट की गई है। पुलिस ने मामले में रोबिन को गिरफ्तार किया था, जिसमें उसे जमानत मिल गई थी।
रैकेट ने बना रखी थी अलग-अलग टीमें
- प्रशासकों की टीम
- खाता/फर्म टीम
- सॉल्वर टीम
- मध्यस्थ दल
- तकनीकी विशेषज्ञ, जो कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर को हैक करते थे
- निरीक्षक दल
- स्लीपर पार्टनर