225 वर्ष पूर्व नोधा देऊ नामक व्यक्ति ने बसाया था गांव ‘मटदादू’

ब्यूरो/अमर उजाला सिरसा Updated Tue, 11 Oct 2016 12:14 AM IST
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इंडो पाक बॉर्डर पर हाईअलर्ट के चलते लोगों ने छोड़ा गांव
इंडो पाक बॉर्डर पर हाईअलर्ट के चलते लोगों ने छोड़ा गांव - फोटो : अमर उजाला

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अमर उजाला द्वारा चलाया गया गांव गाथा अभियान लोगों को काफी पसंद आ रहा है। उनका कहना है कि इससे पूर्व वे कभी भी अपने ही गांव के इतिहास से रूबरू नहीं हुए थे जो अमर उजाला करवा रहा है। इसी अभियान के तहत डबवाली उपमंडल के गांव मट्टदादू के इतिहास से रूबरू हुआ गया। 3622 की आबादी एवं 28156 कैनाल के रकबे वाले इस गांव में 2534 मतदाता हैं, जिनमें 1808 पुरुष व 1226 महिलाएं हैं। इसके अलावा गांव में 632 घर हैं जिनमें 304 घर सामान्य वर्ग, 104 घर पिछड़ा वर्ग व 224 घर अनुसूचित वर्ग के हैं। गांव के कुल 12 वार्डों में 435 पात्र पेंशन लाभार्थी हैं।
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    गांव के इतिहास के बारे मेें जब बुजुर्गों से चर्चा की गई तो पूर्व सरपंच हरदेव सिंह, हरभजन सिंह, महेंद्र सिंह, कौर सिंह सिधू, लाभ सिंह, डॉ. सोहन सिंह, गुलजार सिंह सोही आदि ने बताया कि इस गांव का इतिहास करीब 225 वर्ष पुराना है। उक्त लोगों के अनुसार 1790-91 में नोधा देऊ नामक व्यक्ति गांव कमालू से यहां गाय चराने के लिए आया करता था क्योंकि उस वक्त गांव के नाम पर सिर्फ वीरान जगह ही थी। बताया गया है कि घास-फूस ज्यादा होने के कारण नोधा को ये जगह पशु चराने के लिए भा गई। जिसके चलते नोधा देऊ ने यहां पर एक झोपड़ी बनाकर यहीं बसेरा बना लिया। नोधा देऊ को गांव का जनक माना जाता है। नोधा देऊ के बाद सरां, कड़वासरा, प्रजापति, संधू (जंबर), सोही, ढिल्लो, धालीवाल, देऊ आदि बिरादरियों के लोग आए और इस प्रकार गांव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त बिरादरियों ने अन्य बिरादरियों को भी बुला लिया। गांव के नाम बारे उक्त बुजुर्गों ने बताया कि दादू पंथ से एक श्रद्धालु यहां आया जिसने यहां आकर एक डेरा बनाया जिसके बाद गांव की छोटी सी जोहड़ी के किनारे लोगों के सहयोग से एक मठ बनाया गया। दादू पंथ के व्यक्ति द्वारा मठ बनाने उपरांत ही इस गांव को पहले मठदादू बोला गया जो बाद में मटदादू के नाम से जाना गया।
पहला सरपंच व नंबरदार
पंचायती राज लागू होने के बाद 1953 में करतार सिंह संधू गांव के पहले सरपंच नियुक्त हुए तो वहीं रणजीत सिंह संधू व अर्जुन सिंह कड़वासरा गांव के नंबरदार नियुक्त हुए। करतार सिंह के 17 वर्षों तक लगातार सरपंची करने के बाद 1971 में तोता सिंह सरां गांव के दूसरे सरपंच नियुक्त हुए जिन्होंने अनपढ़ होते हुए भी गांव में खूब विकास करवाया जिसमें उन्होंने मुख्यत: प्राइमरी स्कूल व पेयजल हेतू व्यवस्था स्थापित की। जिसके बाद जसपाल सिंह, दलीप सिंह, हरदेव सिंह, जसवंत कौर व बलकरण सिंह गांव के सरपंच रहे जिन्होंने गांव में समय के अनुसार विकास करवाया। लेकिन सरपंच हरदेव सिंह संधू ने अपने कार्यकाल में ग्रामीणों के सहयोग से भाखड़ा से मटदादू तक कच्ची नाली खुदवाई जिसे बाद मेें पक्का करवाकर गांव की मुख्य पेयजल समस्या को हल करवाया। मौजूदा समय में पृथ्वी सिंह सिला गांव के सरपंच हैं जो विकास को गति दे रहे हैं।

शिक्षा का स्तर :
गांव में शिक्षा की बात करें तो वर्ष 1935 में गांव के गुरुद्वारा में एक  मदरसा शुरु कर कक्षा चौथी तक की पढ़ाई शुरु करवाई गई। इस मदरसा के मूलचंद पहले शिक्षक नियुक्त हुए जो बच्चों को उर्दू भाषा सिखाते थे। मूलचंद के बाद पक्का शहीदां के मुकंद सिंह व यूपी के श्रीराम शर्मा शिक्षक नियुक्त हुए। जिसके बाद 1954 में सरपंच करतार सिंह ने शिक्षा स्तर में सुधार करवाते हुए स्कूल के लिए सरकारी बिल्डिंग का निर्माण करवाया। 1979 में स्कूल को मिडिल का दर्जा मिला तो जुलाई 1985 में इसे हाई स्कूल का दर्जा प्राप्त हुआ। शिक्षा क्षेत्र में गांव के ही मास्टर बालूराम पेंसिया का काफी सहयोग रहा, क्योंकि उन्होंने करीब 20 वर्षों तक यहां अपनी सेवाएं दी। गांव के स्कूल की मुख्य बात ये रही है कि यहां पर लड़कियों की संख्या लड़कों के अपेक्षा ज्यादा रही है। गांव के हाई स्कूल को सौंदर्यीकरण में वर्ष 2007-08 में 11 हजार रुपये व वर्ष 2015-16 में 50 हजार की प्रशंसा राशि भी मिल चुकी है।

गांव की बेटियां हैं शिक्षा व खेलों में आगे :
गांव का मौजूदा लिंगानुपात एक हजार लड़कों के  मुकाबले 703 हैं। ये आंकड़ा भले ही थोड़ा कम है लेकिन यहां की बेटियों ने उच्च शिक्षा व खेलों में गांव का नाम प्रदेश स्तर पर रोशन किया है। गांव की 16 बेटियां उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं तथा तीन बेटियों कर्मजीत कौर, संदीप कौर व अमनदीप कौर ने फुटबाल प्रतियोगिता में नेशनल गेमा में भाग लेकर प्रदेश स्तर पर गांव का नाम रोशन किया है। तो वहीं गांव के एक अनेक युवा विदेशों में कार्यरत हैं। मौजूदा सरपंच पृथ्वी सिंह का कहना है कि वे सरकार द्वारा चलाए गए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान पर तन मन धन से कोशिश कर रहे हैं ताकि कोई भी बेटी न ही तो गर्भ में मरे न ही शिक्षा से वंचित रहे।

ये रहे हैं समाज व देश सेवक :
इस गांव के  दो लोगों ने देश सेवा में भी योगदान निभाया था। जिसमें सरदार करनैल सिंह कड़वासरा व रजवंत सिंह धालीवाल ने फौज में भर्ती होकर देश के लिए लड़ाइयां लड़ी थी, जिसमें सरकार ने उनकी बहादुरी पर करनैल सिंह को तीन मेडलों से व रजवंत सिंह को तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी गिरी ने नायब सूबेदार की उपाधि से सम्मानित किया। अपने दादा की बहादुरी के चर्चे सुनकर उनका पोत्र गुरमीत सिंह भी सेना में भर्ती होकर देश सेवा में योगदान निभा रहा है। इसके अलावा गांव में डॉ. सोहन सिंह धालीवाल पैरा लीगल वालंटियर है जो लोगों को नि:शुल्क कानूनी जानकारी मुहैया करवा कर समाज सेवा कर रहे हैं जिसके चलते उन्हें अनेक संस्थाएं, पंचायतें व स्कूल सम्मानित कर चुके हैं। वहीं गांव का एकता क्लब भी समय-समय पर समाजसेवी कार्यों में हिस्सेदारी निभा रहा है।

धार्मिक आस्था :
गांव मटदादू धार्मिक आस्था से ओत-प्रोत है। वैसे तो यहां पर अनेक धार्मिक स्थल हैं लेकिन दादू दयाल जी का मंदिर अति प्राचीनतम है। इसके बारे में बुजुर्गों का कहना है कि ये मंदिर गांव बसने से पूर्व का है। पूर्व में मठ की ऊपरी सात मंजिल थी। 1857 की लड़ाई में अंग्रेजों ने मठ की ऊपरी चार मंजिलों को अपनी सुरक्षा के लिहाज से गिरवा दिया था, जिसके बाद ग्रामीणों ने इसका नए सिरे से विस्तार किया है।
ये हैं सुविधाएं
गांव में पक्की गलियां, पशु अस्पताल, धर्मशाला, जलघर, आंगनबाड़ी केंद्र, पंचायत घर, बस सुविधा, पटवार भवन, हाई व प्राइमरी स्कूल तथा एक निजी स्कूल, उप स्वास्थ्य केंद्र सहित अनेक सुविधाएं हैं। गांव में करीब सौ लोग सरकारी नौकरियों में कार्यरत है।
येे है समस्याएं :
गांव में सबसे बड़ी समस्या कृषि सिंचाई पानी की है। हालांकि गांव का रकबा तीन माइनरों के  नीचे पड़ता है लेकिन टेल होने के कारण लोगों को पर्याप्त मात्रा में सिंचाई पानी नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा गांव में जलघर होते हुए भी पेयजल की समस्या है जिस कारण लोगों को टैंकरों से पानी डलवाना पड़ता है। गांव में अस्वच्छता, सहकारी समिति न होना, बैंक न होना, बस सुविधा कम होना, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का न होना, बिजली पर्याप्त मात्रा में न होना सहित अन्य समस्याएं हैं जिनसे लोग हर रोज दो चार हो रहे हैं।
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