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गांव में पन्नी ज्यादा था तो गांव का पड़ गया मोटा पन्नीवाला
ब्यूरो/अमर उजाला, सिरसा
Updated Sat, 17 Sep 2016 12:02 AM IST
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गांव गाथा अभियान में अमर उजाला की टीम ओढां खंड में स्थित पूर्व सिंचाई मंत्री चौधरी जगदीश नेहरा के ससुराल गांव मोटा पन्नीवाला के इतिहास से रूबरू हुई। जिला एवं तहसील मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर रानियां विधानसभा हल्का में पड़ने वाले इस गांव की आबादी करीब 12 हजार, रकबा 7500 बीघा व करीब 5500 मतदाता हैं जो लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी निभाते हैं। बुजुर्गों के अनुसार इस गांव का इतिहास करीब 190 साल पुराना है। इस बारे जब गांव के बड़े बुजुर्गों से इतिहास के बारे में बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि ये गांव करीब 1826 में अस्तित्व में आया था। गांव में सबसे पहले हरी राम कस्वां नामक व्यक्ति ने जमाल कुत्ताना से यहां पर मोडी जोहड़ी नामक प्रसिद्ध जगह पर आकर डेरा डाला था। जिसके बाद उनके चार पुत्रों उदाराम, मोटा राम, जालूराम, मालूराम ने गांव की उत्पत्ति में अहम योगदान निभाया। कस्वां बिरादरी के साथ-साथ यहां डूडी, राहड़ व दईया बिरादरियां भी आई। बताया जा रहा है कि राहड़ व दईया बिरादरी किसी कारण वश गांव से पलायन कर गई। जिसके बाद उनका राजस्व हिस्सा हरी राम ने ले लिया। जिसके बाद तीन हिस्से कस्वां बिरादरी व एक हिस्सा डूडी बिरादरी को आया। बुजुर्गों के अनुसार उस समय उदाराम के हाथ में ही गांव की चौधर थी लेकिन एक अंग्रेज अफसर के साथ उसकी अनबन होने के चलते अंग्रेज अफसर ने गांव का रकबा घटा दिया। जिसके बाद अंग्रेजों ने गांव की बागडोर मोटा राम को सौंप दी। तदोपरांत मोटा राम ने गांव का रकबा घुकांवाली व भागसर की ओर बढ़ाया।
यूं पड़ा गांव का नाम
गांव के नाम पर दो बातें प्रचलित हैं जिसमें बताया जा रहा है कि गांव में पन्नी (खरपतवार) बहुत ज्यादा थी इसलिए इसका नाम मोटा राम के नाम पर मोटा पन्नीवाला पड़ा। तो वहीं ये भी बताया जा रहा है कि मोटा राम की मां का नाम पन्नी था इस प्रकार ये गांव मोटा पन्नीवाला के नाम से जाना जाता है।
पहला सरपंच
गांव में 1952 में सूरजा राम भगत पहले सरपंच नियुक्त हुए जिन्होंने समय के मुताबिक विकास करवाया। जिसके बाद सूरजा राम डूडी व बेगराज कस्वां ने भी मुखिया का पद संभाला। मौजूदा समय में गांव की सरंपची युवा सतवीर कस्वां के हाथ में है जो विकास कार्यों को गति दे रहे हैं।
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शिक्षा का चरण :
सर्वप्रथम गांव में लोगों ने मिल जुलकर एक कमरा बनाते हुए शिक्षा का दीप जलाया। जिसके बाद 1952 में सरकार ने बजट पास कर चार कमरों का निर्माण करवाते हुए चौथी तक का स्कूल मंजूर किया। मौजूदा समय में गांव शिक्षा के क्षेत्र में काफी उन्नत है जहां सरकारी व निजी विद्यालयों के साथ-साथ बहु-तकनीकि कॉलेज व निजी आईटीआई भी है।
पानी की किल्लत
गांव की उत्पत्ति तो हो गई, लेकिन पेयजल किल्लत हल ना हुई। जिसके चलते बुजुर्ग ऊं टों पर जलालआना से पानी भरने जाते। जिसके बाद गांव में सभी ने मिलकर एक जोहड़ की खुदाई की, जिसमें से घुकांवाली व भागसर के लोग भी पानी भरकर ले जाते थे। उस समय गांव में ये उसूल बनाया गया था कि जिसके भी घर में लडक़ा पैदा होगा वो इस जोहड़ से 100 मण मिट्टी जूल के रूप में निकालेगा। इस प्रकार उस समय के बुुजुर्गों ने इस उसूल के चलते पानी का दायरा और बढ़ा दिया। बाद में लोगों ने गांव में कुएं का भी निर्माण करवाया जो आज भी खंडहर हालत में इतिहास समेटे हुए है। 1952 में गांव में नहर का पानी आया।
मुसलमानों को पनाह दी थी लोगों ने
1947 की लड़ाई के बाद मुसलमानों के कुछ घर यहीं रह गए, जिन्हें इन लोगों ने गांव में ही रहने की इजाजत दे दी तथा मुसलमानों ने भी अपने नाम हिंदू नामों पर रख लिए। मौजूदा समय में गांव में 40-50 घर मुस्लिम समाज के हैं और उन्होंने अपने नाम भी पुन: अपने धर्म के अनुसार रखते हुए अपना भक्ति इबादत का स्थल अलग बना रखा है। विशेष अवसर पर यहां पर क्षेत्र के अनेक मुसलमान लोग नमाज अत्ता करने आते हैं।
धार्मिक आस्था
बताया जा रहा है कि कस्वां बिरादरी के लोग मां काली के उपासक थे। जिसके चलते उन्होंने गांव में एक मंदिर का भी निर्माण करवाया जो आज भी लोगों की आस्था का केन्द्र है। इसके अलावा गांव के बाहरी छोर पर खेतों में एक अति पुराना भोमिया जी नाम से धार्मिक स्थल भी है जिसका गांव की उत्पत्ति के साथ इतिहास जुड़ा हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि यहां पर एक महात्मा व उनकी पत्नी ने भक्ति की थी। पंचायत ने उक्त भूमि आज भी उन्हीं के नाम पर छोड़ रखी है तथा लोगों ने वहां पर एक जोहड़ी की खुदाई कर रखी है जिसे मोडी जोहड़ी बोला जाता है। मौजूदा समय में गांव में और भी काफी धार्मिक स्थल हैं जहां पर सभी लोग आस्था वश जाते हैं।
आजाद हिंद फौज के सिपाही भी रहे हैं यहां के लोग
नेता जी सुभाष चंद्र बोस की फौज में भी यहां के कुछ लोग भर्ती हुए थे जिनमें जोतराम, दुल्लाराम, पदमा राम के नाम शामिल हैं। बताया जा रहा है कि किन्हीं कारणों के चलते ये लोग आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं हो पाए।
गांव में क्या-क्या हैं सुविधाएं
मौजूदा समय में गांव सुविधाओं से परिपूर्ण हैं जिसमें बहु-तकनीकि शिक्षा केन्द्र, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, पशु अस्पताल, बैंक, सहकारी समिति, पक्की गलियां, नेटवर्क एवं बस सुविधा, जलघर, गोशाला, निजी आईटीआई सहित अनेक सुविधाएं हैं। लेकिन गांव में निकासी व बिजली की सबसे बड़ी समस्या है।
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यूं पड़ा गांव का नाम
गांव के नाम पर दो बातें प्रचलित हैं जिसमें बताया जा रहा है कि गांव में पन्नी (खरपतवार) बहुत ज्यादा थी इसलिए इसका नाम मोटा राम के नाम पर मोटा पन्नीवाला पड़ा। तो वहीं ये भी बताया जा रहा है कि मोटा राम की मां का नाम पन्नी था इस प्रकार ये गांव मोटा पन्नीवाला के नाम से जाना जाता है।
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पहला सरपंच
गांव में 1952 में सूरजा राम भगत पहले सरपंच नियुक्त हुए जिन्होंने समय के मुताबिक विकास करवाया। जिसके बाद सूरजा राम डूडी व बेगराज कस्वां ने भी मुखिया का पद संभाला। मौजूदा समय में गांव की सरंपची युवा सतवीर कस्वां के हाथ में है जो विकास कार्यों को गति दे रहे हैं।
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शिक्षा का चरण :
सर्वप्रथम गांव में लोगों ने मिल जुलकर एक कमरा बनाते हुए शिक्षा का दीप जलाया। जिसके बाद 1952 में सरकार ने बजट पास कर चार कमरों का निर्माण करवाते हुए चौथी तक का स्कूल मंजूर किया। मौजूदा समय में गांव शिक्षा के क्षेत्र में काफी उन्नत है जहां सरकारी व निजी विद्यालयों के साथ-साथ बहु-तकनीकि कॉलेज व निजी आईटीआई भी है।
पानी की किल्लत
गांव की उत्पत्ति तो हो गई, लेकिन पेयजल किल्लत हल ना हुई। जिसके चलते बुजुर्ग ऊं टों पर जलालआना से पानी भरने जाते। जिसके बाद गांव में सभी ने मिलकर एक जोहड़ की खुदाई की, जिसमें से घुकांवाली व भागसर के लोग भी पानी भरकर ले जाते थे। उस समय गांव में ये उसूल बनाया गया था कि जिसके भी घर में लडक़ा पैदा होगा वो इस जोहड़ से 100 मण मिट्टी जूल के रूप में निकालेगा। इस प्रकार उस समय के बुुजुर्गों ने इस उसूल के चलते पानी का दायरा और बढ़ा दिया। बाद में लोगों ने गांव में कुएं का भी निर्माण करवाया जो आज भी खंडहर हालत में इतिहास समेटे हुए है। 1952 में गांव में नहर का पानी आया।
मुसलमानों को पनाह दी थी लोगों ने
1947 की लड़ाई के बाद मुसलमानों के कुछ घर यहीं रह गए, जिन्हें इन लोगों ने गांव में ही रहने की इजाजत दे दी तथा मुसलमानों ने भी अपने नाम हिंदू नामों पर रख लिए। मौजूदा समय में गांव में 40-50 घर मुस्लिम समाज के हैं और उन्होंने अपने नाम भी पुन: अपने धर्म के अनुसार रखते हुए अपना भक्ति इबादत का स्थल अलग बना रखा है। विशेष अवसर पर यहां पर क्षेत्र के अनेक मुसलमान लोग नमाज अत्ता करने आते हैं।
धार्मिक आस्था
बताया जा रहा है कि कस्वां बिरादरी के लोग मां काली के उपासक थे। जिसके चलते उन्होंने गांव में एक मंदिर का भी निर्माण करवाया जो आज भी लोगों की आस्था का केन्द्र है। इसके अलावा गांव के बाहरी छोर पर खेतों में एक अति पुराना भोमिया जी नाम से धार्मिक स्थल भी है जिसका गांव की उत्पत्ति के साथ इतिहास जुड़ा हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि यहां पर एक महात्मा व उनकी पत्नी ने भक्ति की थी। पंचायत ने उक्त भूमि आज भी उन्हीं के नाम पर छोड़ रखी है तथा लोगों ने वहां पर एक जोहड़ी की खुदाई कर रखी है जिसे मोडी जोहड़ी बोला जाता है। मौजूदा समय में गांव में और भी काफी धार्मिक स्थल हैं जहां पर सभी लोग आस्था वश जाते हैं।
आजाद हिंद फौज के सिपाही भी रहे हैं यहां के लोग
नेता जी सुभाष चंद्र बोस की फौज में भी यहां के कुछ लोग भर्ती हुए थे जिनमें जोतराम, दुल्लाराम, पदमा राम के नाम शामिल हैं। बताया जा रहा है कि किन्हीं कारणों के चलते ये लोग आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं हो पाए।
गांव में क्या-क्या हैं सुविधाएं
मौजूदा समय में गांव सुविधाओं से परिपूर्ण हैं जिसमें बहु-तकनीकि शिक्षा केन्द्र, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, पशु अस्पताल, बैंक, सहकारी समिति, पक्की गलियां, नेटवर्क एवं बस सुविधा, जलघर, गोशाला, निजी आईटीआई सहित अनेक सुविधाएं हैं। लेकिन गांव में निकासी व बिजली की सबसे बड़ी समस्या है।