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उद्योगों में भी पिछड़ा हुआ है सिरसा
सिरसा ब्यूरो
Updated Tue, 24 Nov 2015 01:26 AM IST
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प्रदेश सरकार को दो-दो उद्योग मंत्री देने वाला सिरसा जिला औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। यहां पर उद्योगों की इकाइयां स्थापित नहीं हो पा रही हैं। यही कारण है कि यहां के लोगों के लिए अब तक रोजगार के द्वार नहीं खुल पाए हैं। कॉटन और राइस मिलों को छोड़कर यहां पर नाममात्र के उद्योग हैं। सबसे अधिक कॉटन फैक्ट्रियों की संख्या 39 है और इसके बाद दूसरे नंबर पर राइस मिलों की संख्या भी 30 पार है। इन दोनों उद्योगों के लिए लेबर बाहरी राज्यों से आकर काम कर रही हैं। इसलिए यहां के मजदूरों को भी रोजगार नहीं मिल रहा। इसके अलावा एक पेपर मिल है जो वर्षों से सिरसा में सबसे बड़े उद्योग के रूप में स्थापित है। एक और उद्योगपति ने हौसला दिखाते हुए ग्वार गम की फैक्ट्री लगाई थी पर विभिन्न विभागों द्वारा दी गई परेशानियों के चलते उसे बंद कर दिया गया है। करीब दो साल तक चली चीनी मील को 2005 में बंद कर दिया गया जिससे सिरसा का औद्योगिक क्षेत्र में फिर से विरान हो गया।
एक यूनिट बंद होने से 500 लोग बेरोजगार
सरकारी अड़ंगों के चलते सिरसा में लगी एक ग्वार गम फैक्ट्री बंद होने से पांच सौ लोगों का रोजगार छिन गया। उद्योगपति पंकज खेमका ने हिसार रोड स्थिति दादा गणपति ग्वार प्रोजक्ट नाम से गम का पॉवडर तैयार करने की फैक्ट्री करीब तीन वर्ष पूर्व शुरू की थी। इसमें 500 लोगों को रोजगार तो मिला ही हुआ था। इससे सरकार को राजस्व भी मिल रहा था, किसानों को ग्वार के अच्छे रेट भी मिल रहे थे। अब छह माह से यह फैक्ट्री बंद पड़ी है। उद्योगपति पंकज खेमका ने बताया कि हम प्राइवेट बिजली खरीद रहे थे जो साढे़ पांच रुपये प्रति यूनिट हमें पड़ रही थी। सरकारी बिजली का साढे़ दस रुपये प्रति यूनिट पड़ती है। ऐसे में विद्युत निगम के अड़ियल रवैये ने प्राइवेट बिजली खरीदने में अड़चनें डालनी शुरू कर दी। मजबूरन फैक्ट्री बंद करनी पड़ी।
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जिले में हैं 2089 सूक्ष्म उद्योगों की इकाइयां
जिले में 2089 सूक्ष्म उद्योगों की इकाइयां हैं। इसमें 8390 लोग काम कर रहे हैं। सूक्ष्म उद्योगों की इंवेस्टमेंट पूंजी 6791.22 लाख है और इनसे अब तक 78080.80 रुपये का उत्पादन विभाग द्वारा रिकॉर्ड किया गया है। प्रदेश सरकार द्वारा नई उद्योग नीति अब तक लागू नहीं हुई है।
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हालांकि लघु उद्योगों की इकाईयां तो स्थापित होती हैं पर विभिन्न समस्याओं के चलते ये पनप नहीं पाती। यही बजह है कि लघु उद्योगों की संख्या बढने का नाम नहीं ले रही हैं। जिले में 63 लघु उद्योगों में 1507 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इन 63 इकाईयों पर इंवेस्टमेंट राशि 12627 लाख रुपये लोगों द्वारा की गई है जबकि इन इकाईयों से 53240 लाख रुपये का उत्पादन हो चुका है।
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जिले में मध्यम उद्योगों मात्र चार
जिले में मध्यम उद्योगों की संख्या पर नजर डालें तो इससे साफ जाहिर हो जाता है कि यहां पर उद्योगों को लेकर लोग कितने उदासीन हैं। चार उद्योगों पर 4125 लाख की इंवेस्टमेंट है और उनमें से 9550 लाख का उत्पादन उद्योग विभाग द्वारा रिकॉर्ड किया गया है। इन उद्योगों में मात्र 280 लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
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जिले में 39 कॉटन उद्योग हैं। सभी कॉटन उद्योगों को मार्केट फीस, ग्रामीण विकास फंड, वैट आदि का मार झेलनी पड़ रही है। इसके अलावा इस धंधे में टैक्स व वैट की जटिलता उद्योगपतियों को आड़े आ रही है। कॉटन एसोसिशन के सदस्यों ने कई बार सरकार से मांग भी की है कि उनके उद्योगों पर लगने वाले खर्च कम किए जाएं और बिजली के रेट कम किए जाएं। बिजली की आपूर्ति भी लगातार दी जाए। जिले में 39 कॉटन उद्योगों से सरकार को हर वर्ष करोड़ों में राजस्व मिलता है। इन उद्योगों में विभिन्न राज्यों से आए करीब पांच हजार मजदूरों को रोजगार मिला हुआ है।
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क्या हैं समस्याएं
महंगी बिजली की मार में उद्योग
टॉफी उद्योग के मालिक अशवनी बठला ने कहा कि दिल्ली में फूड प्रोजक्ट पर टैक्स कम होने के कारण हम उनसे कंपीटिशन में नहीं रह सकते। यहां टैक्स 14 प्रतिशत है साथ में सबसे अधिक बिजली की मार है। बिलजी इतनी महंगी हो गई है कि हमें अब यह काम फायदे वाला नहीं लग रहा। कभी माल की इतनी खपत थी कि पूरे प्रदेश में माल भेजते थे पर अब वो बात नहीं रही। टैक्स और बिजली ने उद्योगों की कमर तोड़ कर रख दी है।
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लेबर की कमी
कृषि के क्षेत्र में सिरसा जिले का नाम प्रदेश में पहले स्थान पर है। स्वाभाविक है कि यहां पर कृषि में लेबर की ज्यादा जरूरत पड़ती है। ऐसे में सूक्ष्म उद्योगों को चलाने के लिए सबसे बड़ी समस्या लेबर की आ रही है। हालांकि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की लेबर से काम चलाया जा रहा है पर हर उद्योग को लेबर की कमी खल रही है।
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रेलवे की पुअर कनेक्टिविटी
उद्योगों को बढ़ावा देने में रेलवे की कनेक्टीविटी का बहुत बड़ा योगदान होता है। सिरसा में सबसे बड़ी कमी रेलवे कनेक्टीविटी की है। अंग्रेजों के जमाने में बने रेलवे स्टेशन पर अब तक एक ही प्लेट फार्म है। आल का आना और जाना रेलवे पर काफी निर्भर करता जिससे सिरसा अब तक लगभग वंचित सा प्रतीत होता है।
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मार्केटिंग की परेशानी
व्यापार मंडल के प्रधान हीरालाल शर्मा ने कहा कि लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बैंक लोन के अलावा कच्चे माल की उपलब्धता व तैयार माल की मार्केटिंग की व्यवस्था सरकार द्वारा की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि इसके अलावा टैक्सों में कमी और टैक्स प्रक्रिया में सरलीकरण होना चाहिए। नीति व्यापारियों को परेशान करने वाली न हो तभी लघु उद्योग पनप सकते हैं।
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एक यूनिट बंद होने से 500 लोग बेरोजगार
सरकारी अड़ंगों के चलते सिरसा में लगी एक ग्वार गम फैक्ट्री बंद होने से पांच सौ लोगों का रोजगार छिन गया। उद्योगपति पंकज खेमका ने हिसार रोड स्थिति दादा गणपति ग्वार प्रोजक्ट नाम से गम का पॉवडर तैयार करने की फैक्ट्री करीब तीन वर्ष पूर्व शुरू की थी। इसमें 500 लोगों को रोजगार तो मिला ही हुआ था। इससे सरकार को राजस्व भी मिल रहा था, किसानों को ग्वार के अच्छे रेट भी मिल रहे थे। अब छह माह से यह फैक्ट्री बंद पड़ी है। उद्योगपति पंकज खेमका ने बताया कि हम प्राइवेट बिजली खरीद रहे थे जो साढे़ पांच रुपये प्रति यूनिट हमें पड़ रही थी। सरकारी बिजली का साढे़ दस रुपये प्रति यूनिट पड़ती है। ऐसे में विद्युत निगम के अड़ियल रवैये ने प्राइवेट बिजली खरीदने में अड़चनें डालनी शुरू कर दी। मजबूरन फैक्ट्री बंद करनी पड़ी।
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जिले में हैं 2089 सूक्ष्म उद्योगों की इकाइयां
जिले में 2089 सूक्ष्म उद्योगों की इकाइयां हैं। इसमें 8390 लोग काम कर रहे हैं। सूक्ष्म उद्योगों की इंवेस्टमेंट पूंजी 6791.22 लाख है और इनसे अब तक 78080.80 रुपये का उत्पादन विभाग द्वारा रिकॉर्ड किया गया है। प्रदेश सरकार द्वारा नई उद्योग नीति अब तक लागू नहीं हुई है।
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हालांकि लघु उद्योगों की इकाईयां तो स्थापित होती हैं पर विभिन्न समस्याओं के चलते ये पनप नहीं पाती। यही बजह है कि लघु उद्योगों की संख्या बढने का नाम नहीं ले रही हैं। जिले में 63 लघु उद्योगों में 1507 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इन 63 इकाईयों पर इंवेस्टमेंट राशि 12627 लाख रुपये लोगों द्वारा की गई है जबकि इन इकाईयों से 53240 लाख रुपये का उत्पादन हो चुका है।
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जिले में मध्यम उद्योगों मात्र चार
जिले में मध्यम उद्योगों की संख्या पर नजर डालें तो इससे साफ जाहिर हो जाता है कि यहां पर उद्योगों को लेकर लोग कितने उदासीन हैं। चार उद्योगों पर 4125 लाख की इंवेस्टमेंट है और उनमें से 9550 लाख का उत्पादन उद्योग विभाग द्वारा रिकॉर्ड किया गया है। इन उद्योगों में मात्र 280 लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
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जिले में 39 कॉटन उद्योग हैं। सभी कॉटन उद्योगों को मार्केट फीस, ग्रामीण विकास फंड, वैट आदि का मार झेलनी पड़ रही है। इसके अलावा इस धंधे में टैक्स व वैट की जटिलता उद्योगपतियों को आड़े आ रही है। कॉटन एसोसिशन के सदस्यों ने कई बार सरकार से मांग भी की है कि उनके उद्योगों पर लगने वाले खर्च कम किए जाएं और बिजली के रेट कम किए जाएं। बिजली की आपूर्ति भी लगातार दी जाए। जिले में 39 कॉटन उद्योगों से सरकार को हर वर्ष करोड़ों में राजस्व मिलता है। इन उद्योगों में विभिन्न राज्यों से आए करीब पांच हजार मजदूरों को रोजगार मिला हुआ है।
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क्या हैं समस्याएं
महंगी बिजली की मार में उद्योग
टॉफी उद्योग के मालिक अशवनी बठला ने कहा कि दिल्ली में फूड प्रोजक्ट पर टैक्स कम होने के कारण हम उनसे कंपीटिशन में नहीं रह सकते। यहां टैक्स 14 प्रतिशत है साथ में सबसे अधिक बिजली की मार है। बिलजी इतनी महंगी हो गई है कि हमें अब यह काम फायदे वाला नहीं लग रहा। कभी माल की इतनी खपत थी कि पूरे प्रदेश में माल भेजते थे पर अब वो बात नहीं रही। टैक्स और बिजली ने उद्योगों की कमर तोड़ कर रख दी है।
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लेबर की कमी
कृषि के क्षेत्र में सिरसा जिले का नाम प्रदेश में पहले स्थान पर है। स्वाभाविक है कि यहां पर कृषि में लेबर की ज्यादा जरूरत पड़ती है। ऐसे में सूक्ष्म उद्योगों को चलाने के लिए सबसे बड़ी समस्या लेबर की आ रही है। हालांकि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की लेबर से काम चलाया जा रहा है पर हर उद्योग को लेबर की कमी खल रही है।
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रेलवे की पुअर कनेक्टिविटी
उद्योगों को बढ़ावा देने में रेलवे की कनेक्टीविटी का बहुत बड़ा योगदान होता है। सिरसा में सबसे बड़ी कमी रेलवे कनेक्टीविटी की है। अंग्रेजों के जमाने में बने रेलवे स्टेशन पर अब तक एक ही प्लेट फार्म है। आल का आना और जाना रेलवे पर काफी निर्भर करता जिससे सिरसा अब तक लगभग वंचित सा प्रतीत होता है।
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मार्केटिंग की परेशानी
व्यापार मंडल के प्रधान हीरालाल शर्मा ने कहा कि लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए बैंक लोन के अलावा कच्चे माल की उपलब्धता व तैयार माल की मार्केटिंग की व्यवस्था सरकार द्वारा की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि इसके अलावा टैक्सों में कमी और टैक्स प्रक्रिया में सरलीकरण होना चाहिए। नीति व्यापारियों को परेशान करने वाली न हो तभी लघु उद्योग पनप सकते हैं।