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Sirsa News: पूसा और एमडी बायोकोल्स अब पराली प्रबंधन की नई तकनीक पर करेंगे काम

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 04 Jul 2025 11:28 PM IST
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Pusa and MD Biocols will now work on new technology for stubble management
सिरसा। पराली प्रबंधन के लिए सरकार की ओर से भी किसानों के लिए अनेक योजनाएं चलाई गई हैं। वहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान (पूसा) सिरसा में एमडी बायोकोल्स के साथ मिलकर पराली प्रबंधन के लिए नई तकनीक पर काम करेंगे। इसी कड़ी में एक नया केमिकल तैयार किया गया है, जोकि पराली को बहुत कम समय में गलाकर खाद में परिवर्तित करेगा।
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इससे किसानों की पराली प्रबंधन की समस्या समाप्त हो जाएगी। यह जानकारी प्रधान वैज्ञानिक डाॅ. लिवलीन शुक्ला ने सिरसा में आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करते हुए मीडिया से बातचीत करते हुए दी। डाॅ. शुक्ला ने बताया कि सर्वप्रथम यह दवा हरियाणा व पंजाब के एक-एक हजार किसानों को दी जाएगी।
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इसके लिए उन्हें ऑनलाइन एमडी बायोकोल्स की साइट पर पंजीकरण करवाना होगा। यह डी-कंपोजर का छोटा पैक धान की पराली और अन्य जैविक अवशेषों के तीव्र अपघटन में अत्यधिक प्रभावशाली है। इसके प्रयोग से पराली जलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे वायु प्रदूषण में कमी आएगी और मृदा की उर्वरता तथा जैविक गुण बेहतर होंगे।
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डाॅ. शुक्ला ने बताया कि यह उत्पाद बहुत कम मात्रा में उपयोग के बावजूद अधिक प्रभावशाली है। उन्होंने बताया कि यह कदम सतत कृषि, खेतों में जैविक अवशेष प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसमें कोई ऐसा केमिकल नहीं है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़े।

उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे एक बार इस उत्पाद को अपनाएं। जिससे कि उनकी समस्या का समाधान हो जाए। इस मौके पर एमडी बायोकोल्स के डायरेक्टर राजेश सचदेवा ने बताया कि एमडी बायोकोल्स पूर्व में भी किसानों की समस्याओं के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। खेती की लागत कम कर अधिक मुनाफा कमाने के कारगर उपाय तलाशे जा रहे हैं।


उन्होंने बताया कि शुरू में कैप्सूल तैयार किए गए थे, जोकि पानी में मिक्स कर छिड़काव करना पड़ता था। इसके बाद एक पाउडर तैयार किया गया। इसका भूमि में छिड़काव करना पड़ता था, लेकिन उसमें समय अधिक लगता था, लेकिन उपाय कारगर था। नवनिर्मित केमिकल की 250 ग्राम दवा से एक एकड़ भूमि की पराली को गलाया जा सकता है। इससे किसानों की आर्थिक नुकसान भी कम होगा और उनकी भूमि की उर्वरा शक्ति भी नहीं कम होगी। पर्यावरण के लिए भी यह अधिक कारगर है।
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