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बड़ी उम्र में गर्भधारण नवजात के दिल पर भारी, छेद जैसी समस्याएं आ रहीं सामने
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नागरिक अस्पताल में बना डीईआईसी सेंटर।
- फोटो : Sirsa
सिरसा। आज की जो जीवनशैली में युवा पहले पढ़ाई और कॅरिअर को बढ़ावा दे रहे हैं। उसके बाद वो शादी करने जैसा फैसला ले रहे हैं। ऐसे में जब तक उनकी शादी होती है तब तक वो उम्र का एक पड़ाव पार कर चुके होते हैं। उसके बाद भी दंपती थोड़ा देरी से बच्चे का प्लान करते हैं। ऐसे में पहले बड़ी उम्र में शादी, फिर उसके कई वर्षों बाद गर्भ धारण करना आने वाले शिशु के स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा है। बड़ी उम्र में बच्चे तो पैदा हो जाते है लेकिन उनके साथ-साथ कई तरह की गंभीर बीमारियां भी साथ आ जाती हैं। बड़ी उम्र में पैदा होने वाले बच्चे हाथ-पांव टेढे़ होने, आंखों में भैंगापन, दिमाग कमजोर होने और सबसे बड़ा असर दिल में छेद होने जैसे गंभीर रोग होते है। इस समय जिले में दिल के छेद होने की बीमारी सबसे अधिक नवजात बच्चों में पाई जा रही है।
इसी तरह के बच्चों का चयन कर उनका इलाज करवाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से नागरिक अस्पताल में डीईआईसी सेंटर (जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र) का संचालन किया गया है। सेंटर की ओर से अभियान चलाकर इस तरह के शिशुओं की पहचान की जाती है। इसके बाद उनके सभी प्रकार के टेस्ट और जांच करवाई जाती है। ऐसे में अगर बच्चे का इलाज होने के बाद वह स्वास्थ्य हो सकता है तो सेंटर की ओर से ही उसका निशुल्क इलाज करवाया जाता हैं। सेंटर की ओर से इस वर्ष दिल में छेद वाले जैसे करीब 30 बच्चों का इलाज करवाया गया है। इसके अलावा अन्य 29 बच्चों का चयन किया गया है और उनकी मॉनीटरिंग की जा रही है। वहीं हाथ, पांव, आंख और अन्य कई तरह के रोगों से पीड़ित बच्चों का भी दूसरे राज्यों के अस्पतालों से इलाज करवाया जाता है। ताकि वह पूरी तरह से स्वस्थ हो सके।
वर्ष में मिले 59 शिशु दिल में छेद से पीड़ित
डीईआईसी सेंटर की टीमें एनएमएम और आंगनबाड़ी वर्कर्स को लेकर अभियान चलाती है। शिशु के जन्म के बाद उनके परिजन उनकी जांच करवाने के लिए केंद्रों पर पहुंचते है। इस दौरान अगर किसी शिशु में इस तरह की बीमारियों के लक्षण पाए जाते है तो सेंटर की ओर से उसकी अलग से जांच करवाई जाती है। वर्ष 2021 से 22 तक डीईआईसी सेंटर की ओर से 59 बच्चों के दिल में छेद होने पर चयन किया गया था। जिसमें अब तक 30 बच्चों का इलाज करवाया जा चुका है और 29 बच्चों की जांच प्रक्रिया जारी है।
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0 से 18 वर्ष तक के बच्चों की होती है स्क्रीनिंग
बच्चों के स्वास्थ्य की जांच करने के लिए विभाग की ओर से 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों की स्क्रीनिंग की जाती है। हालांकि इस तरह की बीमारियों में अधिक बच्चों की आयु 6 से 18 वर्ष तक की होती है। वहीं नागरिक अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भी बने सेंटर में इस तरह के बच्चों की ओपीडी की जाती है। सेंटर में बच्चों के हाथ, पांव टेढे़ होने, दिमागी तौर पर कमजोर, आंखों में भैंगापन, रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन सहित 29 तरह की बीमारियों से पीड़ित बच्चों का इलाज किया जाता है। इसके लिए अलग-अलग डॉक्टर की ड्यूटी लगाई गई है। जो बच्चों की जांच करने बाद उन्हें दवाई देते हैं।
शिशु को बीमारी लगने का यह रहता है मुख्य कारण
शिशु में इस तरह की बीमारियां लगने का सबसे बड़ा कारण पहले बड़ी उम्र में शादी करना फिर उसके बाद और ज्यादा रुकते हुए गर्भाधारण करना है। मां का किसी तरह के इलाज के दौरान उसकी लंबी दवाइयां चलना, गुर्दों में पानी की कमी, मां शुगर बीमारी से ग्रस्त होना, आयरन की कमी होने सहित अन्य तरह की बीमारियां होने से बच्चों का स्वास्थ्य भी खराब होता है।
अधिक उम्र में शिशु को पैदा करने और मां की अधिक समय तक दवाई चलने व अन्य कई कारणों से शिशुओं के दिल में छेद होने व हाथ पांव टेढ़े होने के मामले सामने आते हैं। सबसे अधिक शिशु दिल में छेद होने वाले पाए जा रहे हैं। इन बच्चों का चयन कर डीईआईसी सेंटर की ओर से उनका इलाज करवाया जाता है। इस वर्ष 59 बच्चे दिल में छेद होने से पीड़ित पाए गए है। इनमें से कई बच्चों का इलाज करवाया जा चुके हैै। गर्भावस्था में शिशु होने पर निरंतर इसकी जांच करनी चाहिए।
-डॉ. भारत भूषण, नोडल अधिकारी, डीईआईसी सेंटर सिरसा
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इसी तरह के बच्चों का चयन कर उनका इलाज करवाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से नागरिक अस्पताल में डीईआईसी सेंटर (जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र) का संचालन किया गया है। सेंटर की ओर से अभियान चलाकर इस तरह के शिशुओं की पहचान की जाती है। इसके बाद उनके सभी प्रकार के टेस्ट और जांच करवाई जाती है। ऐसे में अगर बच्चे का इलाज होने के बाद वह स्वास्थ्य हो सकता है तो सेंटर की ओर से ही उसका निशुल्क इलाज करवाया जाता हैं। सेंटर की ओर से इस वर्ष दिल में छेद वाले जैसे करीब 30 बच्चों का इलाज करवाया गया है। इसके अलावा अन्य 29 बच्चों का चयन किया गया है और उनकी मॉनीटरिंग की जा रही है। वहीं हाथ, पांव, आंख और अन्य कई तरह के रोगों से पीड़ित बच्चों का भी दूसरे राज्यों के अस्पतालों से इलाज करवाया जाता है। ताकि वह पूरी तरह से स्वस्थ हो सके।
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वर्ष में मिले 59 शिशु दिल में छेद से पीड़ित
डीईआईसी सेंटर की टीमें एनएमएम और आंगनबाड़ी वर्कर्स को लेकर अभियान चलाती है। शिशु के जन्म के बाद उनके परिजन उनकी जांच करवाने के लिए केंद्रों पर पहुंचते है। इस दौरान अगर किसी शिशु में इस तरह की बीमारियों के लक्षण पाए जाते है तो सेंटर की ओर से उसकी अलग से जांच करवाई जाती है। वर्ष 2021 से 22 तक डीईआईसी सेंटर की ओर से 59 बच्चों के दिल में छेद होने पर चयन किया गया था। जिसमें अब तक 30 बच्चों का इलाज करवाया जा चुका है और 29 बच्चों की जांच प्रक्रिया जारी है।
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0 से 18 वर्ष तक के बच्चों की होती है स्क्रीनिंग
बच्चों के स्वास्थ्य की जांच करने के लिए विभाग की ओर से 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों की स्क्रीनिंग की जाती है। हालांकि इस तरह की बीमारियों में अधिक बच्चों की आयु 6 से 18 वर्ष तक की होती है। वहीं नागरिक अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भी बने सेंटर में इस तरह के बच्चों की ओपीडी की जाती है। सेंटर में बच्चों के हाथ, पांव टेढे़ होने, दिमागी तौर पर कमजोर, आंखों में भैंगापन, रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन सहित 29 तरह की बीमारियों से पीड़ित बच्चों का इलाज किया जाता है। इसके लिए अलग-अलग डॉक्टर की ड्यूटी लगाई गई है। जो बच्चों की जांच करने बाद उन्हें दवाई देते हैं।
शिशु को बीमारी लगने का यह रहता है मुख्य कारण
शिशु में इस तरह की बीमारियां लगने का सबसे बड़ा कारण पहले बड़ी उम्र में शादी करना फिर उसके बाद और ज्यादा रुकते हुए गर्भाधारण करना है। मां का किसी तरह के इलाज के दौरान उसकी लंबी दवाइयां चलना, गुर्दों में पानी की कमी, मां शुगर बीमारी से ग्रस्त होना, आयरन की कमी होने सहित अन्य तरह की बीमारियां होने से बच्चों का स्वास्थ्य भी खराब होता है।
अधिक उम्र में शिशु को पैदा करने और मां की अधिक समय तक दवाई चलने व अन्य कई कारणों से शिशुओं के दिल में छेद होने व हाथ पांव टेढ़े होने के मामले सामने आते हैं। सबसे अधिक शिशु दिल में छेद होने वाले पाए जा रहे हैं। इन बच्चों का चयन कर डीईआईसी सेंटर की ओर से उनका इलाज करवाया जाता है। इस वर्ष 59 बच्चे दिल में छेद होने से पीड़ित पाए गए है। इनमें से कई बच्चों का इलाज करवाया जा चुके हैै। गर्भावस्था में शिशु होने पर निरंतर इसकी जांच करनी चाहिए।
-डॉ. भारत भूषण, नोडल अधिकारी, डीईआईसी सेंटर सिरसा