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Sirsa News: स्कूल से निर्धारित दुकानों पर ही लेनी हैं किताबें, अभिभावक ढीली कर रहे जेबें
Fri, 10 Apr 2026 12:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
संवाद न्यूज एजेंसी, सिरसा
Updated Fri, 10 Apr 2026 12:19 AM IST
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स्कूल की ओर से फिक्स दुकान से किताबें खरीदते हुए अभिभावक। संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
सिरसा। जिले में निजी स्कूलों की मनमानी जारी है। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होते ही अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ने लगा है। कई निजी स्कूलों ने किताबें, यूनिफॉर्म और स्टेशनरी खरीदने के लिए अपनी-अपनी दुकानें तय कर रखी हैं। वहां से ही अभिभावकों को सामान खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।
स्कूल प्रशासन अभिभावकों को निर्देशित करता है कि निर्धारित दुकान से ही पूरा सामान खरीदा जाए। यदि कोई अभिभावक बाजार से सस्ता सामान खरीदने की कोशिश करता है तो उसे मना कर दिया जाता है या बच्चों को अप्रत्यक्ष रूप से परेशान किया जाता है।
खास बात यह है कि जिन दुकानों को स्कूल ने तय किया है वहां वही सामान बाजार की तुलना में अधिक कीमत पर बेचा जा रहा है। स्कूलों की ओर से तैयार किए गए पैकेज में 12 सेट सिंगल लाइन रजिस्टर, नोटबुक, स्क्रैप बुक, ड्राइंग बुक, कलर ब्रश और नोटबुक कवर जैसे सामान शामिल होते हैं।
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इन सभी वस्तुओं को एक साथ पैकेज के रूप में बेचा जाता है। इससे अभिभावकों को अनावश्यक रूप से अधिक खर्च करना पड़ता है। बाजार में यही सामान अलग-अलग दुकानों पर काफी कम कीमत में उपलब्ध है लेकिन स्कूल के दबाव के कारण अभिभावक मजबूर हैं।
स्कूल नाम की कॉपियां कर देते हैं अनिवार्य : इसके अलावा, कई स्कूलों में स्कूल के नाम वाली कॉपियां अनिवार्य कर दी गई हैं। इससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता और उन्हें तय दुकान से ही खरीदारी करनी पड़ती है। स्कूल संचालकों और दुकानदारों के बीच कमीशन का खेल चल रहा है।
एक दुकान ऐसी जो सिर्फ खुलती है दाखिले के समय : हर के एक नेता के स्कूल के अंदर ही दुकान को संचालित किया जाता है। यह दुकान साल में सिर्फ एक महीने ही खुलती है। यह दुकान सिर्फ दाखिले के समय दुकान संचालक की ओर से खोली जाती है। स्कूल की ओर से इसी दुकान से अभिभावकों को पुस्तकें, ड्रेस, स्टेशनरी लेने के लिए कहा जाता है।
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सिरसा। जिले में निजी स्कूलों की मनमानी जारी है। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होते ही अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ने लगा है। कई निजी स्कूलों ने किताबें, यूनिफॉर्म और स्टेशनरी खरीदने के लिए अपनी-अपनी दुकानें तय कर रखी हैं। वहां से ही अभिभावकों को सामान खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।
स्कूल प्रशासन अभिभावकों को निर्देशित करता है कि निर्धारित दुकान से ही पूरा सामान खरीदा जाए। यदि कोई अभिभावक बाजार से सस्ता सामान खरीदने की कोशिश करता है तो उसे मना कर दिया जाता है या बच्चों को अप्रत्यक्ष रूप से परेशान किया जाता है।
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खास बात यह है कि जिन दुकानों को स्कूल ने तय किया है वहां वही सामान बाजार की तुलना में अधिक कीमत पर बेचा जा रहा है। स्कूलों की ओर से तैयार किए गए पैकेज में 12 सेट सिंगल लाइन रजिस्टर, नोटबुक, स्क्रैप बुक, ड्राइंग बुक, कलर ब्रश और नोटबुक कवर जैसे सामान शामिल होते हैं।
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इन सभी वस्तुओं को एक साथ पैकेज के रूप में बेचा जाता है। इससे अभिभावकों को अनावश्यक रूप से अधिक खर्च करना पड़ता है। बाजार में यही सामान अलग-अलग दुकानों पर काफी कम कीमत में उपलब्ध है लेकिन स्कूल के दबाव के कारण अभिभावक मजबूर हैं।
स्कूल नाम की कॉपियां कर देते हैं अनिवार्य : इसके अलावा, कई स्कूलों में स्कूल के नाम वाली कॉपियां अनिवार्य कर दी गई हैं। इससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता और उन्हें तय दुकान से ही खरीदारी करनी पड़ती है। स्कूल संचालकों और दुकानदारों के बीच कमीशन का खेल चल रहा है।
एक दुकान ऐसी जो सिर्फ खुलती है दाखिले के समय : हर के एक नेता के स्कूल के अंदर ही दुकान को संचालित किया जाता है। यह दुकान साल में सिर्फ एक महीने ही खुलती है। यह दुकान सिर्फ दाखिले के समय दुकान संचालक की ओर से खोली जाती है। स्कूल की ओर से इसी दुकान से अभिभावकों को पुस्तकें, ड्रेस, स्टेशनरी लेने के लिए कहा जाता है।