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Sirsa News: राष्ट्र के विकास के लिए राजा का संवेदनशील होना आवश्यक
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सिरसा।चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में मौजूद मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए
सिरसा। चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय में शुक्रवार को टैगोर लेक्चर थिएटर में सीडीएलयू और भारतीय शिक्षण मंडल के संयुक्त तत्वावधान में सात दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम ‘उन्मेष (अनफोल्डिंग फ्रॉम शिक्षक टू गुरु) आनंदशाला का शुभारंभ हुआ। मुख्य वक्ता भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय संगठन मंत्री बीआर शंकरानंद ने कहा कि मूल्य के आधार पर जीवन होना चाहिए हमें पुरातन को स्वीकार करते हुए नवीनता की और अग्रसर होना चाहिए।
भारतीय जलवायु एवं भारतीय संस्कृति के अनुरूप नए मॉडल विकसित करना समय की मांग है। शिक्षक परिवर्तन के पुरोधा होते हैं। राष्ट्र के विकास के लिए राजा का संवेदनशील होना व प्रजा का सक्रिय होना अत्यंत आवश्यक है। गुरु त्यागी होने के साथ-साथ कभी न थकने वाला, कभी न झुकने वाला होना चाहिए।
बीआर शंकरानंद ने भारतीय शिक्षा परंपरा के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की शिक्षा महर्षि परंपरा पर आधारित है, जिसमें पारिवारिक भाव, सहयोग, त्याग, अनुशासन और आध्यात्मिकता निहित है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का संस्कार करना है।
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शिक्षक पढ़ाता है, लेकिन गुरु दिशा दिखाता है, और यही ‘गुरुत्व’ भारतीय संस्कृति की शक्ति है। कार्यक्रम में विश्वकर्मा स्किल यूनिवर्सिटी के कुलगुरु प्रो. दिनेश कुमार ने कौशल-आधारित शिक्षा, नवाचार और भारतीय ज्ञान परंपरा की उपयोगिता पर जोर दिया। सीडीएलयू के कुलपति प्रो. विजय कुमार ने कहा कि शिक्षा को जीवन जीने की कला से जोड़ने की आवश्यकता है और उन्मेष आनंदशाला व एफडीपी इसी उद्देश्य को साकार करते हैं।
मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सुहास पेडनेकर ने अनुसंधान उत्कृष्टता और भारतीय दृष्टिकोण आधारित शिक्षा की वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम शिक्षा को केवल सूचना तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे जीवन निर्माण, संस्कार, संवेदना और चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया में रूपांतरित करता है।
इस अवसर पर नारायण प्रसाद व संत कुमार की ओर से लिखित नॉलेज जनरेशन इन द वेस्ट एंड भारत नामक पुस्तक का विमोचन भी किया गया। इस प्रोग्राम के समन्वयक प्रो. सुरेंद्र सिंह, सह समन्वयक प्रो. पंकज शर्मा, कुलसचिव डॉ. सुनील कुमार, डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. सुरेश गहलावत, डीन यूएसजीएस प्रो. सुशील कुमार, डीन कॉलेजिज प्रो. राम मेहर, प्रो. अशोक शर्मा, प्रो. राजकुमार सहित विश्वविद्यालय व देशभर से शिक्षाविद उपस्थित रहे।
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भारतीय जलवायु एवं भारतीय संस्कृति के अनुरूप नए मॉडल विकसित करना समय की मांग है। शिक्षक परिवर्तन के पुरोधा होते हैं। राष्ट्र के विकास के लिए राजा का संवेदनशील होना व प्रजा का सक्रिय होना अत्यंत आवश्यक है। गुरु त्यागी होने के साथ-साथ कभी न थकने वाला, कभी न झुकने वाला होना चाहिए।
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बीआर शंकरानंद ने भारतीय शिक्षा परंपरा के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की शिक्षा महर्षि परंपरा पर आधारित है, जिसमें पारिवारिक भाव, सहयोग, त्याग, अनुशासन और आध्यात्मिकता निहित है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों का संस्कार करना है।
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शिक्षक पढ़ाता है, लेकिन गुरु दिशा दिखाता है, और यही ‘गुरुत्व’ भारतीय संस्कृति की शक्ति है। कार्यक्रम में विश्वकर्मा स्किल यूनिवर्सिटी के कुलगुरु प्रो. दिनेश कुमार ने कौशल-आधारित शिक्षा, नवाचार और भारतीय ज्ञान परंपरा की उपयोगिता पर जोर दिया। सीडीएलयू के कुलपति प्रो. विजय कुमार ने कहा कि शिक्षा को जीवन जीने की कला से जोड़ने की आवश्यकता है और उन्मेष आनंदशाला व एफडीपी इसी उद्देश्य को साकार करते हैं।
मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सुहास पेडनेकर ने अनुसंधान उत्कृष्टता और भारतीय दृष्टिकोण आधारित शिक्षा की वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम शिक्षा को केवल सूचना तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे जीवन निर्माण, संस्कार, संवेदना और चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया में रूपांतरित करता है।
इस अवसर पर नारायण प्रसाद व संत कुमार की ओर से लिखित नॉलेज जनरेशन इन द वेस्ट एंड भारत नामक पुस्तक का विमोचन भी किया गया। इस प्रोग्राम के समन्वयक प्रो. सुरेंद्र सिंह, सह समन्वयक प्रो. पंकज शर्मा, कुलसचिव डॉ. सुनील कुमार, डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. सुरेश गहलावत, डीन यूएसजीएस प्रो. सुशील कुमार, डीन कॉलेजिज प्रो. राम मेहर, प्रो. अशोक शर्मा, प्रो. राजकुमार सहित विश्वविद्यालय व देशभर से शिक्षाविद उपस्थित रहे।