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अर्जुनों की तलाश में द्रोणाचार्य
अमर उजाला सिरसा/ब्यूरो
Updated Mon, 16 Nov 2015 01:32 AM IST
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भले ही तीरंदाजी रामायण और महाभारत के समय से हमारी संस्कृति में विराजमान है पर अब प्रदेश में सरकार इसको बढ़ावा देने में कुछ प्रयास करती नहीं दिख रही।
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ऐसे में एक व्यक्ति है जो हमेशा तीरंदाजी को बढ़ावा देने में लगा रहता है। हम बात कर रहे हैं आरएस नेहरा की। नेहरा ने अपना पूरा जीवन तीरंदाजी को उठाने में गुजार दिया है।
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हर दिन सुबह-शाम के समय छोटे-छोटे बच्चों को तीरंदाजी सिखाना उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य बना हुआ है। सरकारी सुविधाओं के अभाव के चलने के बावजूद इसके परिणाम भी सुखद आ रहे हैं।
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वे हमेशा छोटे-छोटे बच्चों में अर्जुन तलाशते रहते हैं। नेहरा की तीरंदाजी की पौध की संख्या अब हजारों में पहुंच गई है।
प्रदेश भर में तीरंदाजी का सिर्फ एक कोच है। इस खेल को बढ़ावा देने के लिए सरकारी ग्रांट के नाम पर कोई ग्रांट भी नहीं है। फिर भी नेहरा द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ियों ने अब तक राष्ट्रीय स्तर पर 180 मेडल हासिल किए हैं।
इस द्रोण ने निशुल्क ट्रेनिंग देकर हजारों अर्जुन तराशे हैं। पिछले 13 वर्षों के दौरान यह द्रोण तैयार कर चुका है पांच हजार धनुर्धर। उनके द्वारा तैयार किए गए धनुर्धरों ने अब तक राष्ट्रीय स्तर पर 60 स्वर्ण, 40 रजत व 80 कांस्य पदक जीते हैं।
हजारों को धनुष विद्या सिखा चुके आरएस नेहरा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। खेल विभाग से उप निदेशक के पद से वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त होने के बाद नेहरा ने सिरसा में चौधरी देवीलाल तीरंदाजी का गठन किया और जुट गए अर्जुनों की तलाश में।
बच्चों को नि:शुल्क प्रशिक्षण देकर वे इस विद्या को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं पर सरकारी स्तर पर तीरंदाजी को बढ़ावा देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।
वे प्रत्येक रोज सुबह और सायं बच्चों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। ऐसे में सरकार की और से न तो उनकी अकादमी को और न ही तीरंदाजी के खिलाड़ियों को सुविधा प्रदान की गई है।
प्रदेश सरकार की सुविधाओं पर नजर डालें तो पिछले कई वर्षों से तीरंदाजी के लिए कोई ग्रांट नहीं जारी की गई। प्रदेश भर में पिछले 27 वर्षों से एक ही तीरंदाजी कोच है।
सुविधाओं के अभाव में नेहरा ने हौसला नहीं छोड़ा और खुद ही बना ली तीरंदाजी अकादमी। इसके अलावा सैकड़ों धनुर्धर राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं। राज्य स्तर पर तो मेडल की संख्या की गिनती एक हजार से पार कर गई है।
आरएस नेहरा ने बताया कि वह एथलेटिक्स को कोच थे, लेकिन तीरंदाजी को बढ़ावा देने के लिए महाभारत की युद्ध स्थली कुरुक्षेत्र में 17 मई 1975 को तीरंदाजी संघ का गठन किया और वर्ष 1981 में सिंगापुर से तीरंदाजी का विशेष प्रशिक्षण लेकर आए।
इसके बाद खेल विभाग में रहते हुए वर्ष 2002 तक इस विद्या को बढ़ावा देने के लिए प्रशंसनीय कार्य किया जिसके आधार पर हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल ने वर्ष 1983, 1985 व 1989 में उन्हें सम्मानित किया तथा इसके अलावा प्रशासन द्वारा भी तीन बार उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। नेहरा के तीरंदाजी के प्रति समर्पित भाव के कारण ही वे 1975 से अब तक तीरंदाजी संघ के प्रदेश सचिव हैं।
उनका कहना है कि तीरंदाजी हमारी प्राचीन विद्या है इसे जीवित रखना हम सबका धर्म है, क्योंकि तीरंदाजी हमारी संस्कृति का शृंगार है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक रोज सुबह-सायं वे दर्जनों बच्चों को तीरंदाजी के गुर सिखाते हैं जिसके बदले में किसी प्रकार की फीस नहीं लेते।
उन्होंने बताया कि तीरंदाजी को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने पत्र लिख कर कई बार प्रदेश के मुख्यमंत्री से सुविधाओं की मांग की पर कोई सुविधा नहीं मिल रही।
उन्होंने बताया कि तीरंदाजी प्रतिस्पर्धाओं में जब बच्चे प्रदेश व देश के विभिन्न शहरों में जाते हैं तो वे स्वयं उनके साथ जाते हैं।
इतना ही नहीं आरएस नेहरा का पुत्र यतिंद्र नेहरा भी उनके पदचिह्नों पर चलते हुए स्कूली बच्चों को तीरंदाजी के गुर सिखा रहे हैं।