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चोटी काटने की बढ़ती घटनाओं से दहशत में महिलाएं

Thu, 03 Aug 2017 12:34 AM IST
Updated Thu, 03 Aug 2017 12:34 AM IST
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चोटी काटने की बढ़ती घटनाओं से दहशत में महिलाएं
24 घंटे में चार महिलाओं की कटी चोटी, एक बच्ची की मौत की फैली अफवाह
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चोटी काटने की बढ़ती घटनाओं से दहशत में महिलाएं
पुलिस बोली, पोस्टमार्टम के बाद साफ होगा मौत का कारण
अमर उजाला ब्यूरो
सिरसा।
जिले में रोज किसी न किसी गांव में चोटी कटने की घटनाएं देखने को मिल रही हैं। 24 घंटों में जिले के पांच गांवों में चोटी काटे जाने की घटनाएं सामने आईं हैं। गांव ढूकड़ा में एक आठ वर्षीय बच्ची की मौत हुई तो हर तरफ बात फैल गई की चोटी काटे जाने से बच्ची की मौत हुई है। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल में पहुंचाया। पुलिस ने मामले को बिल्कुल अफवाह बताते हुए बाल काटने के संबंध में किसी भी तरह की घटना होने से इंकार किया है।
बुधवार सुबह 11 बजे गांव ढूकड़ा निवासी राय सिंह की आठ माह की पुत्री संतोष और उसकी मां घर में थीं। राय सिंह की पत्नी सुमन के मुताबिक सुबह करीब साढ़े 10 बजे बच्ची संतोष को दूध पिलाकर आंगन में सुलाया था और बर्तन साफ करने लगी। तभी अचानक बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी। सुमन दौड़कर बच्ची के पास पहुंची तो वह मृत मिली। उसके सिर के बाल कटे हुए थे, यह देखकर सुमन ने शोर मचाना शुरू कर दिया। शोर सुनकर ग्रामीण एकत्रित हो गए। घटना की सूचना चोपटा थाना पुलिस को दी गई। पुलिस ने शव कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवाया। दोपहर बाद शव का पोस्टमार्टम करके परिजनों को सौंप दिया गया।
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चोपटा थाना प्रभारी ओमप्रकाश का कहना है कि पुलिस मामले की जांच कर रही है। बाल काटने के संबंध में जो भ्रांति फैलाई जा रही है उसमें किसी प्रकार की कोई सच्चाई नजर नहीं आ रही है। बच्ची से पूर्व भी उसके सात भाई बहनों की मौत एक वर्ष से कम उम्र में होने की बात सामने आई है, जिससे आशंका है कि इस बच्ची की मौत भी उसी तरह से हुई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत के असल कारण का पता चल जाएगा।
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सात बच्चों की पहले भी हो चुकी है मौत
ढूकड़ा निवासी राय सिंह और सुमन की शादी 15 साल पहले हुई थी तब से अब तक इनको 9 संतान हुईं, जिसमें सात बच्चों की मौत हो चुकी है, जिनकी उम्र एक वर्ष से कम थी। वहीं, मामले में अब इस बच्ची की मौत को भी आस-पास के लोग कोई दैवीय दोष मान रहे हैं। चोटी काटने से हुई मौत की अफवाह भी पूरे क्षेत्र में फैली हुई है।

बनसुधार में दो तो चकसाहिबा में एक युवती के कटे बाल
मंगलवार रात को गांव चक साहिबा और वन सुधार में दो युवतियों व एक महिला के बाल कटने की घटना सामने आई। वनसुधार निवासी युवती कोमल और सुनाक्षी रात को रोजाना की भांति अपने घर में खाना खाने के बाद सो गईं। सुबह उठी तो दोनों के बिस्तर पर बाल कटे पड़े थे, जिन्हें देखकर दोनों ने शोर मचाया। परिजन व आसपास के लोग मौके पर पहुंचे। वहीं, परमजीत कौर पुत्री बलदेव सिंह निवासी चकसाहिबा ने घटना के बारे में बताया।

डिंग में दो महिलाओं की कटी चोटी
गांव मौजूखेड़ा निवासी महेंद्र की पत्नी सुबह नौ बजे घर का काम कर रही थी कि अचानक शरीर एक तरफ सुन्न होने लगा। तभी कुछ देर पश्चात उसके बाल की चोटी कट गई। जैसे ही बाल काटने की बात मोहल्ले में पता चली, तो चर्चा इलाके में आग की तरह फैल गई। वहीं, गांव नरेल खेड़ा में डॉ. सुदेश ने बताया कि रात को 11 बजे टीवी देख रहे थे और उसकी पत्नी सोई हुई थी। तभी उसकी छाती पर काली बिल्ली दिखाई दी। जब वह उठी तो चोटी कटी हुई थी। बाल काटने को लेकर अजीबोगरीब हैरान कर देने वाली घटनाओं से महिलाओं में खौफ है। डिंग थाना प्रभारी जगीर सिंह कहना है कुछ शरारती किस्म के लोग ऐसी घटना को अंजाम दे रहे हैं। अगर कोई ऐसी घटना से संबंधित पकड़ा गया तो उसको बख्शा नहीं जाएगा।

मनोरागी बनने का खतरा बढ़ा
सिविल अस्पताल में कार्यरत मनोरोग चिकित्सक डॉ. पंकज शर्मा ने लोगों से अपील की है कि इस प्रकार की घटनाओं को लेकर बेशक लोगों में भय की स्थिति है, लेकिन ये घटनाएं सत्य नहीं है। उन्होंने कहा कि रोजाना हो रही घटनाओं को लेकर लोगों का मानसिक संतुलन गड़बड़ा गया है। अफवाहों को लोग सच समझने लगे हैं। जिससे उनके मनोरोगी बनने का खतरा बढ़ रहा है। इसलिए लोग जल्द सिविल अस्पताल आकर अपना प्राथमिक उपचार करवाएं।


मॉस हिस्टीरिया
प्रदेशभर में महिलाओं की चोटी कटने की घटना वास्तव में मनोवैज्ञानिक रोग मॉस हिस्टीरिया का एक उदाहरण है। जिन लोगों में सुझाव ग्रहण शीलता का गुण अधिक होता है, वे लोग दूसरों की बातों में जल्दी आते हैं और इस रोग से पीड़ित हो जाते हैं। ज्यादातर यह रोग महिलाओं को होता है। इस रोग के चलते बहुत सारे लोग एक जैसे व्यवहार या लक्षणों को ग्रहण कर लेते हैं। इससे बचने का सबसे अच्छा उपाय इस पर बातचीत न करना ही होता है। कुछ समय के बाद यह रोग स्वयं ही समाप्त हो जाता है। सरकार, मीडिया और लोग इसे एक सच्ची घटना के रूप में नहीं, एक रोग के रूप में समझें।
-प्रो. रविंद्र पुरी, मनोवैज्ञानिक।
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