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युवा नजरिया: चुनावी बॉन्ड योजना रद्द होने से राजनीतिक व्यवस्था होगी पारदर्शी...

Thu, 29 Feb 2024 02:27 AM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा)
अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Thu, 29 Feb 2024 02:27 AM IST
सार

चुनाव में चंदे को लेकर पारदर्शिता और काले धन पर अंकुश लगाने में चुनावी बाॅन्ड योजना का रद्द होना सराहनीय कदम है। यह योजना पारदर्शी नहीं है। यह विचार है एमडीयू के छात्र पंकज नरबाण के।

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Yuva Najariya Cancellation of electoral bond scheme will make the political system transparent
पंकज नरबाण। राजनीतिक विज्ञान एमडीयू अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र शर्मा। - फोटो : संवाद

विस्तार

पंकज नरबाण के अनुसार चुनाव में चंदे को लेकर पारदर्शिता और काले धन पर अंकुश लगाने में चुनावी बाॅन्ड योजना का रद्द होना सराहनीय कदम है। यह योजना पारदर्शी नहीं है। इसके तहत कौन चंदा दे रहा है, क्यों दे रहा है, यह सवाल उठना स्वाभाविक है। इससे कॉर्पोरेट घरानों का चंदा देकर निजी लाभ उठाने का अंदेशा रहता है। ऐसे में इस योजना को रद्द कर दिया गया। योजना का रद्द होना राहत देने के साथ बेहतर परिणाम देने वाला फैसला साबित होगा।

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शीर्ष न्यायालय ने चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता और काले धन पर अंकुश लगाने के दावे के लिए वर्ष 2018 में शुरू की गई चुनावी बाॅन्ड योजना को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि यह योजना सूचना के अधिकार, भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19 (1) (P)) के अधिकार का उल्लंघन करती है।
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यह योजना तत्कालीन वित्तमंत्री की ओर से छह वर्ष पहले शुरू की गई थी। इसके तहत कोई भी व्यक्ति या कंपनी राष्ट्रीयकृत बैंक की निर्दिष्ट शाखाओं से एक हजार रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक के चुनावी बाॅन्ड खरीदकर किसी भी पार्टी से दे सकता था। योजना के अनुसार इसकी जानकारी गुप्त रखी जाती थी।
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इस पर सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भी लागू नहीं होता था। इसकी जानकारी सिर्फ संबंधित बैंक व सरकार के पास रहती थी। इसी कारण शुरुआत से ही इस योजना पर सवाल उठाए जा रहे थे। निर्वाचन आयोग के साथ-साथ भारतीय रिजर्व बैंक ने भी इस योजना की आलोचना की थी, क्योंकि इससे बड़ी संख्या में काला धन पार्टियों को चंदे के रूप में मिला है।

इस योजना से बड़े को कॉर्पोरेट घराने व कंपनियां सरकार से अपने हित में अनुचित लाभ लेते हैं। राजनीतिक दल इस धन का प्रयोग रैलियां, रोड शो, नेताओं की खरीद-फरोख्त जैसे अनुचित कार्यों में करते हैं। यह लोकतंत्र के लिए घातक साबित होता है। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। यहां राजनीतिक समानता की गारंटी व हर वोट का समान मूल्य है।

वहां मतदाताओं को जानकारी होनी चाहिए कि वे जिस पार्टी को वोट दे रहे हैं, उसे कितना और कहां से चंदा मिला, क्योंकि निष्पक्ष चुनाव व लोकतंत्र में जानने का अधिकार सर्वोपरि है। शीर्ष अदालत का फैसला चुनावों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को सुदृढ़ करने के साथ राजनीतिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाने में मददगार साबित होगा। यह ऐतिहासिक फैसला लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।


एक्सपर्ट की राय
लेख का विषय बेहद अहम है। चुनाव में बॉन्ड योजना के जरिए चंदा देने की शुरुआत हुई। यह पारदर्शी नहीं है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने की पक्षधर स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसको लेकर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी कि यह पारदर्शी व्यवस्था नहीं है। इन बातों को प्रतिभागी ने छुआ है। लेख में हर पहलू को प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। -प्रो. राजेंद्र शर्मा, अध्यक्ष, राजनीतिक विज्ञान, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय।

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